श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वन्दात्मक स्थिति में जीव को भटकाते रहते हैं और जब जीव गुरुदेव के चरण-शरण में हो जाता है तो मुक्त हो जाता है। ५१ नित्यं शुद्धनिराभासं निराकारं निरंजनं। नित्यबोधचिदानंदं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहं ॥५२॥ सूतजी कहते हैं हम गुरुदेव की वन्दना करते हैं जो नित्य, शुद्ध, विशुद्ध, निराकार, निरंजन स्वरूप में भी हमेशा सत चित आनन्द में रमण करते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। ५२ हृदंबुजे कर्णिकमध्यसंस्थं सिद्धासने संस्थितदिव्यमूर्तिः। ध्यायेद्गुरुं चंद्रकलाप्रकाशं सच्चित्सुखाभीष्टवरप्रदानं ॥५३॥ इस प्रकार समझाते हुए कहते हैं कि हम उन गुरुदेव का ध्यान करते हैं जो कमल के मध्य भाग मे स्थित कमलासन पर विराजमान दिव्यमूर्ति, जो अपने तपोबल के प्रभाव से संसार को चन्द्रमा जैसी पावन प्रकाश से प्रकाशित करते हैं और अभीष्ट फल प्रदान करते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। ५३ आनंदमानंदकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधरूपं। योगींद्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद्गुरुं नित्यमहं नमामि ॥५४॥ सूतजी कहते हैं महर्षियों - जो अपने आत्मस्वरूप को जगाकर ज्ञानस्वरूप को जगाकर ज्ञान स्वरूप करके, प्रसन्नता के साथ परमानन्द में डूबे रहते हैं और जो योगियों के भी संसार रूपी रोग को समाप्त कर मुक्त कर देते हैं उनके श्री चरण में मेरा नित्य प्रणाम। ५४ (३२)