भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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तो उसका सब कुछ तप, बल, धन पौरुष क्षणभाव में ऐसे क्षीण हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश कुहरा भेद देता है, ऐसे ही जीव का अभिमान उसको खा लेता है। ४८ न मुक्ता देवगंधर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ॥४९॥ चाहे देवता हो, गन्धर्वा हो, पितरगण, यक्ष, किन्नर, ऋषि हों, ये सब गुरुदेव भगवान के ही सहारे सिद्धि पद को प्राप्त होते हैं बिना गुरु के कुछ भी सम्भव नहीं है। ४९ ध्यानं शृणु महादेवि सर्वानंदप्रदायकं । सर्वसौख्यकरं चैव भुक्तिमुक्तिविशारदं ॥५०॥ इसलिए ऋषियों शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती ! ध्यान से सुनो, संसार का सारा सुख, सारा वैभव, आनन्द की प्राप्ति, भोग और मोक्ष ये सब गुरुदेव से ही प्राप्त किया जा सकता है इसलिए उनके आश्रय में जीना चाहिए। ५० ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्दातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यं॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं। भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूंतं नमामि ॥५१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव ही जो ज्ञानमूर्ति हैं वही हमेशा ब्रह्म के आनन्द में डूबकर सुख प्राप्त करते हैं और जीव रूप संसार में प्रकट होकर ( 31 )

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