श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर पहुंच कर स्नान करने से जो फल प्राप्त होता हैं उसका १००० गुना फल केवल गुरु को दूध पिलाने से ही प्राप्त होता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ४५ ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभतेः गुरुभक्तितः । गुरोः समानता नास्ति श्रेयोऽसौ गुरुमार्गिणां ॥४६॥ महर्षियो - जीवात्माएँ संसार सागर से अपने आप को मोक्षपद की प्राप्ति तभी करा सकती हैं जब ज्ञान की प्राप्ति होगी और ये दिव्य ज्ञान की प्राप्ति तभी होगी जब गुरु के प्रति प्रीति विश्वास भक्ति का भाव होगा, इसलिए गुरु से बढ़कर उनके समान कोई और नहीं, अतः गुरु के ही अधीन होना चाहिए। ४६ यस्मात्परतरं नास्ति नेतिनेति च वै श्रुतिः । मनसा वचसा चैव सर्वदाऽऽराधयेद्गुरूम् ॥४७॥ सूतजी कहते हैं कि इसलिए श्रुतियां बार-बार गाती हैं, समझाती हैं कि गुरु से बढ़कर कोई और नहीं, इसलिए मन से, वाणी से सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करना चाहिए और उन्हीं का गुणगान करना चाहिए। ४७ मदाहंकारगर्वेण विद्या तपबलान्वितः । संसारकुहरावर्ते घटीयंत्रं यथा पुनः ॥४८॥ अब सूतजी कहते हैं कि महर्षियों चाहे जैसा उच्चकोटि का विद्वान हो, चाहे जितना बड़ा तपस्वी हो, बलवान हो, लेकिन अगर इन सारी गुणवत्ता के साथ वह गुरु के चरण-शरण में न होकर अभिमान करता है