श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अनेकजन्मसंप्राप्तं कर्म बंधविदाहनं । स्वात्मज्ञानप्रभावेन तस्मै 'श्रीगुरवे नमः ॥४२॥ कहने का भाव यह है कि जो गुरुदेव अपने ज्ञान उपदेश के माध्यम से जीवात्माओं के अनेक जन्मों के पाप को नष्ट करते हुए उसे कर्म बन्धन से मुक्त कर देते है उन्हें मैं प्रणाम करता हूं। ४२ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मुद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । सर्वात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ॥४३॥ सूतजी कहते हैं कि मेरे गुरु ही जगतनाथ हैं वही जगतगुरु हैं और वही सबकी आत्मा हैं ऐसे सर्वभूत सर्वात्मा श्री शिवस्वरूप गुरु के चरण मे प्रणाम करता हूं। ४३ ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोःपदं । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥४४॥ इसलिए अगर ध्यान मुद्रा में हो तो गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करो, पूजा करने की इच्छा है तो गुरु के चरण की पूजा करो, मंत्र जाप करने की इच्छा है तो उनके वाक्यों को भरिए और इस प्रकार उन्हीं की कृपा के सहारे संसार से मुक्त हो जाइए। ४४ सप्तसागरपर्यंतं तीर्थस्नानादिजं फलं । गुरोरंघ्रिपयो बिंदुसहस्रांशे न दुर्लभम् ॥४५॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों सात समुद्र की यात्रा तथा समस्त तीर्थस्थलों ( 29 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal