श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयस्य स्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयं । स एव सर्वसंपत्तिः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३८॥ इसलिए महर्षियों जिनके नाम स्मरण मात्र से ही ज्ञान अपने आप में ही (हृदय) में प्रकाशित हो उठता है और जिनकी कृपा से भारी सम्पत्ति जीव को प्राप्त हो जाती है ऐसे गुरुदेव के श्री चरण में मेरा प्रणाम है। ३८ चैतन्यं शाश्वतं शांतं व्योमातीतं निरंजनं । बिंदुनादकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३९॥ अतः ऋषियों जो गुरुदेव साक्षात चैतन्य हैं शाश्वत हैं नित्य हैं और अपने ही आत्म स्वरूप में डूबे निर्गुण निराकार हैं ऐसे बिन्दुनाद की कला से परे गुरु के चरण मे मैं बारम्बार प्रणाम करता हूं। ३९ स्थावरं जंगमं चैव तथा चैव चराचरम् । व्याप्तं येन जगत् सर्वं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४०॥ सूतजी कहते हैं कि इस चराचर संसार में जो भी स्थावर और जंगम जीव हैं (स्थावर जड़) जंगम (चलते-फिरते) हर जीव में हम गुरु स्वरूप का दर्शन करते हुए हम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। ४० ज्ञानशक्तिसमारूढं तत्वमालाविभूषितं । भुक्तिमुक्तिप्रदातारं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४१॥ सूतजी कहते हैं कि वही गुरुदेव ही, ज्ञान शक्ति से युक्त तत्व की अलौकिक माला से विभूषित और भोग मोक्ष के दाता हैं ऐसे समर्थवान गुरु के श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ४१ ( 28 )