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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

यस्य स्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयं । स एव सर्वसंपत्तिः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३८॥ इसलिए महर्षियों जिनके नाम स्मरण मात्र से ही ज्ञान अपने आप में ही (हृदय) में प्रकाशित हो उठता है और जिनकी कृपा से भारी सम्पत्ति जीव को प्राप्त हो जाती है ऐसे गुरुदेव के श्री चरण में मेरा प्रणाम है। ३८ चैतन्यं शाश्वतं शांतं व्योमातीतं निरंजनं । बिंदुनादकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३९॥ अतः ऋषियों जो गुरुदेव साक्षात चैतन्य हैं शाश्वत हैं नित्य हैं और अपने ही आत्म स्वरूप में डूबे निर्गुण निराकार हैं ऐसे बिन्दुनाद की कला से परे गुरु के चरण मे मैं बारम्बार प्रणाम करता हूं। ३९ स्थावरं जंगमं चैव तथा चैव चराचरम् । व्याप्तं येन जगत् सर्वं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४०॥ सूतजी कहते हैं कि इस चराचर संसार में जो भी स्थावर और जंगम जीव हैं (स्थावर जड़) जंगम (चलते-फिरते) हर जीव में हम गुरु स्वरूप का दर्शन करते हुए हम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। ४० ज्ञानशक्तिसमारूढं तत्वमालाविभूषितं । भुक्तिमुक्तिप्रदातारं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४१॥ सूतजी कहते हैं कि वही गुरुदेव ही, ज्ञान शक्ति से युक्त तत्व की अलौकिक माला से विभूषित और भोग मोक्ष के दाता हैं ऐसे समर्थवान गुरु के श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ४१ ( 28 )

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अनेकजन्मसंप्राप्तं कर्म बंधविदाहनं । स्वात्मज्ञानप्रभावेन तस्मै 'श्रीगुरवे नमः ॥४२॥ कहने का भाव यह है कि जो गुरुदेव अपने ज्ञान उपदेश के माध्यम से जीवात्माओं के अनेक जन्मों के पाप को नष्ट करते हुए उसे कर्म बन्धन से मुक्त कर देते है उन्हें मैं प्रणाम करता हूं। ४२ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मुद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । सर्वात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ॥४३॥ सूतजी कहते हैं कि मेरे गुरु ही जगतनाथ हैं वही जगतगुरु हैं और वही सबकी आत्मा हैं ऐसे सर्वभूत सर्वात्मा श्री शिवस्वरूप गुरु के चरण मे प्रणाम करता हूं। ४३ ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोःपदं । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥४४॥ इसलिए अगर ध्यान मुद्रा में हो तो गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करो, पूजा करने की इच्छा है तो गुरु के चरण की पूजा करो, मंत्र जाप करने की इच्छा है तो उनके वाक्यों को भरिए और इस प्रकार उन्हीं की कृपा के सहारे संसार से मुक्त हो जाइए। ४४ सप्तसागरपर्यंतं तीर्थस्नानादिजं फलं । गुरोरंघ्रिपयो बिंदुसहस्रांशे न दुर्लभम् ॥४५॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों सात समुद्र की यात्रा तथा समस्त तीर्थस्थलों ( 29 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

पर पहुंच कर स्नान करने से जो फल प्राप्त होता हैं उसका १००० गुना फल केवल गुरु को दूध पिलाने से ही प्राप्त होता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ४५ ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभतेः गुरुभक्तितः । गुरोः समानता नास्ति श्रेयोऽसौ गुरुमार्गिणां ॥४६॥ महर्षियो - जीवात्माएँ संसार सागर से अपने आप को मोक्षपद की प्राप्ति तभी करा सकती हैं जब ज्ञान की प्राप्ति होगी और ये दिव्य ज्ञान की प्राप्ति तभी होगी जब गुरु के प्रति प्रीति विश्वास भक्ति का भाव होगा, इसलिए गुरु से बढ़कर उनके समान कोई और नहीं, अतः गुरु के ही अधीन होना चाहिए। ४६ यस्मात्परतरं नास्ति नेतिनेति च वै श्रुतिः । मनसा वचसा चैव सर्वदाऽऽराधयेद्गुरूम् ॥४७॥ सूतजी कहते हैं कि इसलिए श्रुतियां बार-बार गाती हैं, समझाती हैं कि गुरु से बढ़कर कोई और नहीं, इसलिए मन से, वाणी से सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करना चाहिए और उन्हीं का गुणगान करना चाहिए। ४७ मदाहंकारगर्वेण विद्या तपबलान्वितः । संसारकुहरावर्ते घटीयंत्रं यथा पुनः ॥४८॥ अब सूतजी कहते हैं कि महर्षियों चाहे जैसा उच्चकोटि का विद्वान हो, चाहे जितना बड़ा तपस्वी हो, बलवान हो, लेकिन अगर इन सारी गुणवत्ता के साथ वह गुरु के चरण-शरण में न होकर अभिमान करता है

तो उसका सब कुछ तप, बल, धन पौरुष क्षणभाव में ऐसे क्षीण हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश कुहरा भेद देता है, ऐसे ही जीव का अभिमान उसको खा लेता है। ४८ न मुक्ता देवगंधर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ॥४९॥ चाहे देवता हो, गन्धर्वा हो, पितरगण, यक्ष, किन्नर, ऋषि हों, ये सब गुरुदेव भगवान के ही सहारे सिद्धि पद को प्राप्त होते हैं बिना गुरु के कुछ भी सम्भव नहीं है। ४९ ध्यानं शृणु महादेवि सर्वानंदप्रदायकं । सर्वसौख्यकरं चैव भुक्तिमुक्तिविशारदं ॥५०॥ इसलिए ऋषियों शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती ! ध्यान से सुनो, संसार का सारा सुख, सारा वैभव, आनन्द की प्राप्ति, भोग और मोक्ष ये सब गुरुदेव से ही प्राप्त किया जा सकता है इसलिए उनके आश्रय में जीना चाहिए। ५० ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्दातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यं॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं। भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूंतं नमामि ॥५१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव ही जो ज्ञानमूर्ति हैं वही हमेशा ब्रह्म के आनन्द में डूबकर सुख प्राप्त करते हैं और जीव रूप संसार में प्रकट होकर ( 31 )

द्वन्दात्मक स्थिति में जीव को भटकाते रहते हैं और जब जीव गुरुदेव के चरण-शरण में हो जाता है तो मुक्त हो जाता है। ५१ नित्यं शुद्धनिराभासं निराकारं निरंजनं। नित्यबोधचिदानंदं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहं ॥५२॥ सूतजी कहते हैं हम गुरुदेव की वन्दना करते हैं जो नित्य, शुद्ध, विशुद्ध, निराकार, निरंजन स्वरूप में भी हमेशा सत चित आनन्द में रमण करते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। ५२ हृदंबुजे कर्णिकमध्यसंस्थं सिद्धासने संस्थितदिव्यमूर्तिः। ध्यायेद्गुरुं चंद्रकलाप्रकाशं सच्चित्सुखाभीष्टवरप्रदानं ॥५३॥ इस प्रकार समझाते हुए कहते हैं कि हम उन गुरुदेव का ध्यान करते हैं जो कमल के मध्य भाग मे स्थित कमलासन पर विराजमान दिव्यमूर्ति, जो अपने तपोबल के प्रभाव से संसार को चन्द्रमा जैसी पावन प्रकाश से प्रकाशित करते हैं और अभीष्ट फल प्रदान करते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं। ५३ आनंदमानंदकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधरूपं। योगींद्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद्गुरुं नित्यमहं नमामि ॥५४॥ सूतजी कहते हैं महर्षियों - जो अपने आत्मस्वरूप को जगाकर ज्ञानस्वरूप को जगाकर ज्ञान स्वरूप करके, प्रसन्नता के साथ परमानन्द में डूबे रहते हैं और जो योगियों के भी संसार रूपी रोग को समाप्त कर मुक्त कर देते हैं उनके श्री चरण में मेरा नित्य प्रणाम। ५४ (३२)

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकः न गुरोरधिकः। शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥५५॥ इसलिए हे महर्षियों - गुरुदेव से बढ़कर कोई नहीं गुरुदेव के अतिरिक्त किसी को जानते हीं नही क्यों उनसे बढ़कर कोई दूसरा नहीं इसलिए शिव स्वरूप गुरु के श्री चरण में मैं प्रणाम करता हूं। ५५ एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिंदां करोति यः। स याति नरकं घोरं यावच्चंद्रदिवाकरौ ॥५६॥ सूतजी कहतें हैं कि भगवान भोलेनाथ से ये अनुपम रहस्य जानने के पश्चात माता पार्वती कहती हैं कि जो गुरुदेव की निन्दा करता है, वह घोर नरक की अधोगति प्राप्त करता है। ५६ यो वै हुंकृत्य हुंकृत्य गुरुं निर्जित्य वादतः। अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥५७॥ इस प्रकार मईया कहती है कि जो गुरु की आज्ञा का पालन न करके वाद-विवाद कुतर्क करता है वह जंगल में निर्जल प्रदेश में ब्रह्मराक्षस रूप धारण करता है। ५७ मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैर्वा शापितो यदि। कालमृत्युभयाद्वापि गुरु रक्षति पार्वती ॥५८॥ सूतजी कहते हैं महर्षियों भगवान शिव कहते हैं कि प्रिये मुनिजन, पन्नग, देवता किसी को श्रापित भी किए हों तो वह (जीवात्मा) काल के मुख ( ३३ ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

से भी गुरु कृपा के सहारे बचाया जा सकता है। ५८ अशक्ता हि सुराः सर्वेः ह्यशक्ता मुनयस्तथा। गुरुशापाहताः क्षीणा क्षयं यांति न संशयः ॥५९॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों देवताओं के द्वारा श्रापित और मुनियों के द्वारा श्रापित जीव बच सकता है, पुष्टि प्राप्ति कर सकता है किन्तु गुरुदेव के द्वारा श्रापित व्यक्ति बच नहीं सकता। ५९ मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयं। श्रुतिवेदांतवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदं ॥६०॥ इसलिए अब शिवजी कहते हैं कि पार्वती दो अक्षर से बना शब्द जो गुरु है यही मन्त्रों का राजा है, श्रुतियां वेद कहते हैं गुरु साक्षात परमपद है कोई सामान्य पद नहीं है। ६० श्रुतिस्मृतिमविज्ञाय केवलं गुरुसेवकाः। ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ॥६१॥ सूतजी कहते हैं जो सन्यासी महात्मा महापुरुष है वो भी यही कहते हैं कि श्रुतियाँ, स्मृतियां विज्ञाय भी सही सुझाव देते हैं कि केवल गुरुदेव की ही सेवा करनी चाहिए। ६१ नित्यं ब्रह्मनिराकारं निर्गुणं बोधयेत्परं। पूर्णब्रह्म निराभासं दीपो दीपांतरं यथा ॥६२॥

सूतजी कहते हैं कि जो नित्य निरन्तर निर्गुण निराकार ब्रह्म में डूबे अपने आप को ऐसे प्रकाशित कर रहे हैं जैसे दीपक-दीपक की प्रकाशिक स्थिति में एक रहता है। ६२ गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामो हि लभ्यते। अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ॥६३॥ इसलिए ऋषियों जो आत्माराम है, अर्थात जो आनन्द में ब्रह्ममयस्वरूप का अनुभव कर आनन्दित हो रहे हैं तो भी गुरु की कृपा के ही कारण से प्रकाशित हैं, गुरुदेव के बताए हुए अनेक मार्गों के सहारे अपने को आत्मज्ञान स्वरूपमय कर लेते हैं। ६३ आब्रह्मस्तंबपर्यंतं परमात्मस्वरूपकं। स्थावरं जंगमं चैव प्रणमामि जगन्मयं ॥६४॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ब्रह्मा की बनाई हुई सृष्टि के प्रत्येक जीवरूप में (स्थावरजड़, जंगम-चलता-फिरता) गुरुदेव की पावन छवि निहारता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता हूं। ६४ परात्परतरं ध्येयं नित्यमानंदकारकं। हृदयाकाशमध्यस्थं शुद्धस्फटिकसंनिभं ॥६५॥ कहने का भाव यह है कि हम प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करने वाले शिवस्वरूप का हम ध्यान करते हैं जो जीव के हृदयमध्य भाग में शुद्ध विशुद्ध स्फटिक मणि की भांति प्रकाशित हो रहे हैं अर्थात चैतन्य स्वरूप ३५

हैं और छोटे-बड़े जीव सबमें वही है, चींटी से लेकर हाथी तक के हृदय मध्य में वही है। ६५ अगोचरं तथा गम्यं रूपनामादिवर्जितं। निःशब्दं तु विजानीयात्स्वभावं ब्रह्म पार्वति ॥६६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों इस प्रकार गुरु महिमा का विशद उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जो गुरुस्वरूप परब्रह्म है यद्यपि अगोचर है, निर्गुण, निराकार शब्दों में नहीं कहा जा सकता है, जिसकी ये सारी गुणवत्ता है, ऐसा निर्गुण परमब्रह्म गुरु स्वाभाव कारण से अनुभवित किया जा सकता है। ६६ अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति यो भावः शृणु तं कथयाम्यहं ॥६७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो, शिवजी कहते है देवि ! जो जीवात्मा हृदय में प्रविष्ट सत स्वरूप गुरु का जो कि अंगुष्ठभाव रूप में है उनका जो भी ध्यान करता है उसको जो आनन्द सुख मिलता है उसे सुनो। ६७ स्वयं सर्वमयो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित्। कीटभ्रमरवत्तत्र ध्यानं भवति तादृशम् ॥६८॥ जो इस प्रकार अंगुष्ठ स्वरूप सततत्व का ध्यान करता है वह स्वयं सर्वरूप हो जाता है उसे इस बात का बोध हो जाता है कि जो तत्व मुझको प्रकाशित है वही प्रत्येक जड़ चेतन रूप में है। ६८

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri यस्यावलोकनादेव सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निस्पृहः शांतः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ॥६९॥ इस प्रकार वह जीवात्मा अपने प्रकाशित परमतत्व मे डूबा रहता है न कोई उसका मित्र रह जाता है, न शत्रु, क्योंकि सृष्टि शरीर में नहीं अपितु तत्व में निर्दिष्ट हो जाती है। ६९ सर्वज्ञोऽयमिति प्राहुर्देही सर्वमयो बुधः। सदानंदः सदा शांतो रमते यत्रकुत्रचित् ॥७०॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों वह प्रकाशित जीवात्मा सर्वज्ञ हो जाता है सर्वभूतमय हो जाता है सबमे आपने आप को ही देखता हुआ आनन्दित रमण करता रहता है कोई समस्या नहीं होती। ७० उपदेशो मया देवि गुरुमार्गेण दर्शितः। गुरुभक्तिस्तथा ध्यानं सफलं तव कीर्तितं ॥७१॥ इस प्रकार महर्षियों शंकरजी ने कहा कि मेरे द्वारा दिया गया, किया गया यह पावन उपदेश गुरुमार्ग ही प्रदर्शित करता है और संसार में कीर्ति इसी की होती है जो गुरु में भक्ति का भाव रखता है और उन्ही का ध्यान करता रहता है इसलिए उनकी शरण मे ही रहना चाहिए। ७१ अनेन तु भवेत्कार्यं यद्वदामि महाशये। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥७२॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सूतजी गुरुगीता के वर्णन विस्तार क्रम में अब ये समझाने का प्रयास करते हैं कि वैसे बहुत सारे कार्य बताए गए हैं महापुरुषों के द्वारा, किन्तु वे लौकिक मार्ग लोकहित मे नहीं है अतः गुरु सानिध्य ही बड़ा सानिध्य है। ७२ लौकिकाः कर्मतो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवे। ज्ञानेन भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म सांप्रतं ॥७३॥ सूतजी कहते हैं कि ज्ञानहीन लौकिक कर्म चाहे जितने कर लो, संसार सागर से मुक्ति उनके द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते है, और जब गुरु ज्ञान से युक्त कर्म जीवात्मा करता है तो उसे हर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। ७३ इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयते यदि। लिखित्वा यत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत् ॥७४॥ और इस प्रकार गुरुगीता का मर्म प्रकाशित करते हुए बताते हैं कि हे शौनकादि ऋषियों जो भी इस गुरुगीता का पाठ श्रद्धा भक्ति के साथ करता है, सुनता है, पढ़ता है, लिखता है वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है। ७४ गुरुगीताक्षरैकं तु यंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीं ॥७५॥ इसलिए महर्षियों ! जो भी गुरुगीता के एक भी अक्षर को यंत्रराज समझकर जपता है, उसे अन्य मन्त्र इत्यादि सोलह कलाओं से भी कहीं ज्यादा लाभ एकाक्षर यंत्रराज के जप से ही प्राप्त होता है। ७५ ( 38 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गुरुगीतात्मक देवि शुद्धं तत्वं मयोदितं। भवव्याधिविनाशाथं स्वयमेव सदा जपेत् ॥७६॥ भोलेनाथ कहते हैं कि प्रिये ! गुरुगीता रूप मे यह शुद्ध विशुद्ध तत्व मेरे द्वारा ही प्रकटित हुआ है जो भी इसका जप, ध्यान, पाठ करता है उसे भवबाधा नहीं भोगनी पड़ती है। ७६ अनंतफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु। सर्वपापसमूहघ्नं सर्व दारिद्र्यनाशनं ॥७७॥ गुरुगीता के फल प्रभाव का.वर्णन करते हुए बताते हैं कि जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह अनन्त फल प्राप्त करता है, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सारे दरिद्र समाप्त हो जाते हैं अर्थात जीवन वैभवपूर्ण बन जाता है। ७७ कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनं। यक्षराक्षसभूतानां चोरव्याघ्रभयापहं ॥७८॥ इस गुरुगीता के पाठ से अकाल मृत्यु का भय, सारे संकट समाप्त हो जाते हैं यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, चोर, हिंसक पशुओं का भय भी समाप्त हो जाता है अर्थात कोई बाधा नहीं होती। ७८ महाव्याधिहरं चैवं विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेव जपेत्सदा ॥७९॥ यहाँ तक कि महाव्याधि की बाधा भी दूर हो जाती है सारी विभूतियां ( 39 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सिद्धि को प्राप्त होती हैं इस गुरुगीता के जप के प्रभाव से सबको अपने वश मे किया जाता है। ७९ कुशैर्वा दूर्वया देवि आसने शुभ्रकंबले। उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ॥८०॥ सूतजी महर्षियों से कहते हैं कि शिवजी पार्वती से कहे कि देवि ! कुशा और दूर्ब के आसन पर बैठकर जो भक्तिभाव के साथ श्रद्धा युक्त होकर भजता है, उसको सब कुछ प्राप्त होता है। ८०

शुक्लासने वैः शान्त्यर्थं वश्ये रक्तासनं प्रिये। अभिचारे कृष्णवर्णं पीतवर्णं धनागमे ॥८१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो इस गुरुगीता का पाठ जो शुक्लासन पर बैठ कर करता है उसे शान्ति मिलती है, रक्तासन पर बैठकर जो करता है उसे सारा संसार पूजता है, अर्थात सब उसी के वश में हो जाते हैं कृष्णासन से अभिचार, पीतासन से धनागम की प्राप्ति होती है। ८१

उत्तरे शांतिजाप्यं स्यात् वश्ये पूर्व मुखोदितं। दक्षिणे मारणं प्रोक्तं स्तंभने पश्चिम मुखं ॥८२॥ अब कहने का भाव ये है कि शांति की प्राप्ति के लिये शुक्लासन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, सबको अपने अनुकूल करने के लिये रक्तासन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, शत्रु को मारने के लिये दक्षिण की ओर मुख करके, और स्तम्भन प्रधान के लिये पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए, ऐसा कहा गया है। ८२

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मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवि भूयः प्रियकरं राजानं वश्यमानयेत् ॥८३॥ हे महर्षियों ! हे गिरिनन्दिनि ! सुनो ये गुरुगीता का पाठ प्रत्येक जीव को विमोहित करके पाठकर्ता के अनुकूल करता है और इतना ही नहीं यह मोक्ष की प्राप्ति भी करा देता है और राजाओं को भी वशीभूत कर देता है इसलिए श्रद्धायुक्त होकर पाठ करना चाहिए। ८३ मुखस्तंभकरं नृणां गुणानांच विवर्धनं। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्म सिद्धिदं भवेत् ॥८४॥ इस गुरुगीता के पाठ के प्रभाव से कर्ता के मुख पर दिव्यतेज प्राप्त होता है गुणों की वृद्धि होती है, सारे दुष्कर्म नष्ट हो जाते हैं और सत्कर्म पथ पर जीव दौड़ पड़ता है। ८४ सर्व शांतिकरं नित्यं वंध्यापुत्र फलप्रदं। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परं ॥८५॥ यह दिव्य गीता पाठ हर तरह की सुख शान्ति प्रदान करता है यहाँ तक कि बन्ध्या स्त्री को पुत्रवती करता है, और स्त्रियां अगर पाठ करती हैं कभी विधवा नहीं होती। ८५ आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रपौत्रविवर्धनं। निष्कामस्तु त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात् ॥८६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो इस गुरुगीता पाठ से जीवात्मा अपने जीवन (41)

में अखण्ड आयु, आरोग्यता, ऐश्वर्य तो प्राप्त करता है साथ ही उसका कुल, उसका परिवार, पुत्र, पौत्र, धन धान्य से पूर्ण होता है और साथ ही मोक्ष की प्राप्ति करता है। ८६ अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि। सर्वदुःखभयं विघ्नं नाशयेत तापहारकं ॥८७॥ महिमा का विशद वर्णन क्रम में अब सूतजी कहते हैं कि इस गीतापाठ से सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है, कार्य में कोई रूकावट नहीं आती है और मानो कि दूसरा जन्म मिलता भी है तो जीवन में कोई दुख नहीं होता, तीनों तापों का निवारण हो चुका रहता है। ८७ सर्वबाधाप्रशमनं धर्मार्थकाममोक्षदं। यं यं चिंतयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितं ॥८८॥ यह गुरुगीता पाठ जो करता है उसकी सारी बाधा दूर हो जाती है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ की सहजता मे प्राप्ति होती है और वह जिस जिस क्षेत्र में बढ़ता है उसे पाठ के प्रभाव से सफलता प्राप्त होती है इसलिए गुरुगीता से अधिक कुछ भी नहीं है। ८८ कामधेनुः कामितस्य कल्पितस्य च कल्पदः। चिन्तामणिश्चिंतितस्य सर्वमंगलकारकं ॥८९॥ सूतजी कहते हैं कि कामधेनुः कामना पूर्ण करती है, कल्पवृक्ष स्वर्ग सम्पत्ति देता है, चिंतामणि हर प्रकार की बाधा चिन्ता दूर करता हुआ हर प्रकार का मंगल शुभ फल प्रदान करता है। ८९ ( 42 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

३. तृतीय अध्याय: कुण्डलिनी-जागरण, मोक्ष-साधन, गुरु-सेवा एवं फलश्रुति

जाप्यं शाक्तैश्च सौरैश्च गाणपत्यैश्च वैष्णवैः। शैवस्य सिद्धिदं देवि सत्यं न संशयः ॥९०॥ सूतजी कहते हैं जो व्यक्ति की उपासना करते हैं वो शौर्य की प्राप्ति करते हैं, जो गणेश की आराधना करते हैं उन्हें विष्णु की प्राप्ति होती है किन्तु जो शिव स्वरूप गुरु की पूजा, वन्दना, स्तवन करते है उनको सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ९० संसारमूलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये । गुरुगीता भवेत् स्नानं तत्वज्ञः कुरुते सदा ॥९१॥ इसलिए जो वास्तव में अपने को तत्वज्ञानी समझने वाले बुद्धिशील प्राणी हो, उनको हमेशा संसार की समस्त बाधाओं से निवृत्ति के लिये संसार की माया बन्धन स्थिति से मुक्ति पाने की इच्छा से प्रतिदिन स्नान, ध्यान, गुरुदेव का पूजन करके यह गीता पाठ करना चाहिए। ९१ शयनस्थो ह्वासनस्थो वा गच्छंस्तिष्ठंस्तथापि वा । अश्वारूढो गंजारूढ़ः सुप्तो वा जागृतोऽपि वा ॥९२॥ इसलिए महर्षियो ये जो दिव्य गीता पाठ है, इसका पाठ उठते, बैठते, सोते, जागते, अश्वारुढ़, गजारूढ़, चलते, बैठते, आठों याम यही पाठ करना चाहिए। ९२ शुचिमान्यः सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु । तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥९३॥ सूतजी कहते हैं जो जीवात्मा गुरु गीता पाठ के सहारे शिव स्वरूप समर्थ सर्वत्र गुरु की दीक्षा से दीक्षित जो नित्य पाठ करने वाला सन्यासी ( 43 )

वीतरागी संत है अगर उसका दर्शन मात्र साधारण लोग पा जाते हैं तो वो आवागमन से मुक्त हो जाते हैं ऐसा गुरु गीता का प्रभाव हैं। ९३ समुद्रस्य यथा तोयं क्षीरं क्षीरे जलं जले । भिन्ने कुंभे यथाकाशस्तथात्मा परमात्मनि ॥९४॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो जैसे समुद्र मे भी जल होता है अन्य सरोवर मे भी जल होता है, घड़े मे भी जल होता है, तो जैसे पात्र बदल रहे हैं (समुद्र, तालाब, सरोवर, घड़ा) किन्तु जल वही रहता है ठीक ऐसे ही गाय, भैंस, बकरी, कुत्ता बिल्ली मनुष्य हाथी पर्वत पठार नही सबसे शिव स्वरूप गुरु की ही सत्ता होती है बस जीव का स्वरूप अलग दिखता है रहता सबमें वही है। ९४ तथैव ज्ञानी जीवात्मा परब्रह्मणि लीयते । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशि ॥९५॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों साधारण जीवत्मा ये मानती है कि हम अलग हैं ब्रह्म अलग है ऐसा वास्तव मे सही नही है जो ज्ञानी है वह सर्वत्र उसी तत्व को निहारता हुआ दिन रात संसार में भ्रमण करता है उसे कोई परेशानी नहीं होती है। अतः यह गीता पाठ तत्व बोध कराने का सहज सरल साधन है। ९५ एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्तते स्वयं । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्तिभावं करोति यः ॥९६॥ इसलिए हे ऋषियों जो भी पूर्ण श्रद्धा, भक्ति विश्वास के साथ इसका पाठ करता है वह संशयहीन, बन्धनहीन होके सर्वदा विचरण करता है और सारा सुख प्राप्त करता है, इसलिए गुरुगीता के सहारे ही जीना चाहिए। ९६ ( 44 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

भुक्तिमुक्तिप्रदस्तेषां जिह्वाग्रे च सरस्वती । अनेन प्राणिनः सर्वे गुरुगीताजपेन च ॥९७॥ अब कहते हैं कि ऋषियों पाठ का अनुपम प्रभाव यह है कि कर्ता को भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है उसकी जिह्वा पर सरस्वती विद्यमान हो कर उसकी वाणी को अलंकृत करती है और कहाँ तक महिमा गाऊँ बहुत लोग भोग मोक्ष की प्राप्ति लाभ गीता पाठ के सहारे प्राप्त किए हैं। ९७ सर्वसिद्धिं प्राप्नुवन्ति भुक्तिमुक्ति न संशयः । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्मो मयोदितः ॥९८॥ भोलेनाथ कहते हैं हे देवि अपने-अपने धर्म आचरण के अनुसार जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह सर्वसिद्धि प्राप्त करता है। भोग मोक्ष की प्राप्ति करता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। ९८ गुरुगीता समं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने । गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरुर्निष्ठा परं तपः ॥९९॥ इसलिए महर्षियो मैं सत्य कहता हूँ सत्य कहता हूँ गुरुगीता की तुलना में कुछ और नहीं गुरुदेव ही साक्षात ईश्वर है, गुरुदेव ही धर्म है, गुरु में निष्ठा, समर्पण का भाव ही सबसे बड़ा तप है। ९९ गुरोः परतरं नास्ति नास्ति तत्वं गुरोः परं । धन्या माता पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा ॥१००॥ (45)

सूतजी कहते हैं महर्षियो और क्या कहें गुरुदेव के अतिरिक्त कोई और नहीं, गुरुदेव के अलावा कोई दूसरा तत्व नहीं, वही तत्व भी हैं और जो जीवात्मा अपना समर्पण गुरु में करता है, उसके माता पिता, कुल तीनों पवित्र और धन्य-धन्य हो जाते हैं। १०० धन्या च वसुधा देवि गुरुभक्तिः सुदुर्लभा । गुरुपुत्रो वरं मूर्खो तस्य सिध्यंति नान्यथा ॥१०१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो शिवजी कहते हैं हे भवानी ! धरती का वह भूखण्ड धन्य हो जाता है जहाँ गुरुदेव की भक्ति की जाती है और इसी भक्ति भाव के सहारे कृपा की प्राप्ति कर मूर्ख भी विद्वान हो जाता है। १०१ शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षापि सिद्धिदा भवेत् । आकल्पजन्मनां कोट्या जपहोमतपः क्रियाः ॥१०२॥ सूतजी कहते हैं कि शौनकादि ऋषियों ! गुरु से दीक्षित हो जाने के बाद सारे शुभ कर्मों की सिद्धि हो जाती हैं, करोड़ो जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं भाव उनके बताए जप, तप और होम इत्यादि पूजन के सहारे ऐसे गुरु की महिमा है। १०२ तत्सर्वं सफलं देवि गुरुसंतोषकारकं ॥१०३॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु की महिमा का वर्णन करने के क्रम में अब साफ-साफ शिवजी कह रहे हैं कि हे पार्वती ! ये जो कुछ हम फल की प्राप्ति जीवन में बताए ये सब गुरु को प्रसन्न करने पर ही प्राप्त होते हैं अतः सर्व प्रयत्नेन (हर प्रकार) गुरु को खुश रखना चाहिए। १०३ ( 46 )

ब्रह्माविष्णुमहेशादिदेवर्षिपितृकिन्नराः । सिद्धचारणयक्षाश्च ऋषयो मुनयो जनाः ॥१०४॥ गुरुसेवाः परं तीर्थमन्यत्तीर्थं निरर्थकं। सर्वतीर्थाश्च ये देवि सद्गुरोश्चरणाम्बुजं ॥१०५॥ सूतजी कहते हैं महर्षियो - ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, पितृगण, किन्नर, सिद्ध चारण, यक्ष, ऋषिगण, मुनिजन ये सब चाहे जिस पवित्र तीर्थ स्थल पर जा कर तपस्या कर लें, तब तक कोई फल की प्राप्ति इन्हें नहीं मिल सकती जब तक गुरुदेव के कमलवत चरण की सेवा करके उनकी आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक उनका किया जप, तप सब व्यर्थ होता है। अतः श्री गुरु के चरण मे ही रहना चाहिए। १०४ १०५ शरीरमिन्द्रियं प्राणाश्चार्थः स्वजनबान्धवाः। माता पिता कुलं देविं गुरुरेव न संशयः ॥१०६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - चाहिए यह कि शरीर की इन्द्रियों को वश में करके अपने स्वजनों (माता, पिता, भाई, बहन) के साथ गुरु के श्री चरणों का ही ध्यान करना चाहिए। १०६ विद्यातपोबलेनैव मंदभाग्याश्च ये नराः। गुरुसेवां न कुर्वन्ति सत्यं सत्यं वरानने ॥१०७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों जो जीवात्मा (विद्या, तप, बल) से हीन मंदबुद्धि का है, सत्य कहता हूँ वह गुरु की सेवा न करने के कारण से ऐसा हो इसलिए कहा गया है कि "गुरु बिना ज्ञानं न भवति" १०७ (४७)