भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 82 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 57

वीतरागी संत है अगर उसका दर्शन मात्र साधारण लोग पा जाते हैं तो वो आवागमन से मुक्त हो जाते हैं ऐसा गुरु गीता का प्रभाव हैं। ९३ समुद्रस्य यथा तोयं क्षीरं क्षीरे जलं जले । भिन्ने कुंभे यथाकाशस्तथात्मा परमात्मनि ॥९४॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो जैसे समुद्र मे भी जल होता है अन्य सरोवर मे भी जल होता है, घड़े मे भी जल होता है, तो जैसे पात्र बदल रहे हैं (समुद्र, तालाब, सरोवर, घड़ा) किन्तु जल वही रहता है ठीक ऐसे ही गाय, भैंस, बकरी, कुत्ता बिल्ली मनुष्य हाथी पर्वत पठार नही सबसे शिव स्वरूप गुरु की ही सत्ता होती है बस जीव का स्वरूप अलग दिखता है रहता सबमें वही है। ९४ तथैव ज्ञानी जीवात्मा परब्रह्मणि लीयते । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशि ॥९५॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों साधारण जीवत्मा ये मानती है कि हम अलग हैं ब्रह्म अलग है ऐसा वास्तव मे सही नही है जो ज्ञानी है वह सर्वत्र उसी तत्व को निहारता हुआ दिन रात संसार में भ्रमण करता है उसे कोई परेशानी नहीं होती है। अतः यह गीता पाठ तत्व बोध कराने का सहज सरल साधन है। ९५ एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्तते स्वयं । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्तिभावं करोति यः ॥९६॥ इसलिए हे ऋषियों जो भी पूर्ण श्रद्धा, भक्ति विश्वास के साथ इसका पाठ करता है वह संशयहीन, बन्धनहीन होके सर्वदा विचरण करता है और सारा सुख प्राप्त करता है, इसलिए गुरुगीता के सहारे ही जीना चाहिए। ९६ ( 44 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal