भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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जाप्यं शाक्तैश्च सौरैश्च गाणपत्यैश्च वैष्णवैः। शैवस्य सिद्धिदं देवि सत्यं न संशयः ॥९०॥ सूतजी कहते हैं जो व्यक्ति की उपासना करते हैं वो शौर्य की प्राप्ति करते हैं, जो गणेश की आराधना करते हैं उन्हें विष्णु की प्राप्ति होती है किन्तु जो शिव स्वरूप गुरु की पूजा, वन्दना, स्तवन करते है उनको सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ९० संसारमूलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये । गुरुगीता भवेत् स्नानं तत्वज्ञः कुरुते सदा ॥९१॥ इसलिए जो वास्तव में अपने को तत्वज्ञानी समझने वाले बुद्धिशील प्राणी हो, उनको हमेशा संसार की समस्त बाधाओं से निवृत्ति के लिये संसार की माया बन्धन स्थिति से मुक्ति पाने की इच्छा से प्रतिदिन स्नान, ध्यान, गुरुदेव का पूजन करके यह गीता पाठ करना चाहिए। ९१ शयनस्थो ह्वासनस्थो वा गच्छंस्तिष्ठंस्तथापि वा । अश्वारूढो गंजारूढ़ः सुप्तो वा जागृतोऽपि वा ॥९२॥ इसलिए महर्षियो ये जो दिव्य गीता पाठ है, इसका पाठ उठते, बैठते, सोते, जागते, अश्वारुढ़, गजारूढ़, चलते, बैठते, आठों याम यही पाठ करना चाहिए। ९२ शुचिमान्यः सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु । तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥९३॥ सूतजी कहते हैं जो जीवात्मा गुरु गीता पाठ के सहारे शिव स्वरूप समर्थ सर्वत्र गुरु की दीक्षा से दीक्षित जो नित्य पाठ करने वाला सन्यासी ( 43 )