भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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भुक्तिमुक्तिप्रदस्तेषां जिह्वाग्रे च सरस्वती । अनेन प्राणिनः सर्वे गुरुगीताजपेन च ॥९७॥ अब कहते हैं कि ऋषियों पाठ का अनुपम प्रभाव यह है कि कर्ता को भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है उसकी जिह्वा पर सरस्वती विद्यमान हो कर उसकी वाणी को अलंकृत करती है और कहाँ तक महिमा गाऊँ बहुत लोग भोग मोक्ष की प्राप्ति लाभ गीता पाठ के सहारे प्राप्त किए हैं। ९७ सर्वसिद्धिं प्राप्नुवन्ति भुक्तिमुक्ति न संशयः । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्मो मयोदितः ॥९८॥ भोलेनाथ कहते हैं हे देवि अपने-अपने धर्म आचरण के अनुसार जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह सर्वसिद्धि प्राप्त करता है। भोग मोक्ष की प्राप्ति करता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। ९८ गुरुगीता समं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने । गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरुर्निष्ठा परं तपः ॥९९॥ इसलिए महर्षियो मैं सत्य कहता हूँ सत्य कहता हूँ गुरुगीता की तुलना में कुछ और नहीं गुरुदेव ही साक्षात ईश्वर है, गुरुदेव ही धर्म है, गुरु में निष्ठा, समर्पण का भाव ही सबसे बड़ा तप है। ९९ गुरोः परतरं नास्ति नास्ति तत्वं गुरोः परं । धन्या माता पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा ॥१००॥ (45)