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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

भुक्तिमुक्तिप्रदस्तेषां जिह्वाग्रे च सरस्वती । अनेन प्राणिनः सर्वे गुरुगीताजपेन च ॥९७॥ अब कहते हैं कि ऋषियों पाठ का अनुपम प्रभाव यह है कि कर्ता को भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है उसकी जिह्वा पर सरस्वती विद्यमान हो कर उसकी वाणी को अलंकृत करती है और कहाँ तक महिमा गाऊँ बहुत लोग भोग मोक्ष की प्राप्ति लाभ गीता पाठ के सहारे प्राप्त किए हैं। ९७ सर्वसिद्धिं प्राप्नुवन्ति भुक्तिमुक्ति न संशयः । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्मो मयोदितः ॥९८॥ भोलेनाथ कहते हैं हे देवि अपने-अपने धर्म आचरण के अनुसार जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह सर्वसिद्धि प्राप्त करता है। भोग मोक्ष की प्राप्ति करता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। ९८ गुरुगीता समं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने । गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरुर्निष्ठा परं तपः ॥९९॥ इसलिए महर्षियो मैं सत्य कहता हूँ सत्य कहता हूँ गुरुगीता की तुलना में कुछ और नहीं गुरुदेव ही साक्षात ईश्वर है, गुरुदेव ही धर्म है, गुरु में निष्ठा, समर्पण का भाव ही सबसे बड़ा तप है। ९९ गुरोः परतरं नास्ति नास्ति तत्वं गुरोः परं । धन्या माता पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा ॥१००॥ (45)

सूतजी कहते हैं महर्षियो और क्या कहें गुरुदेव के अतिरिक्त कोई और नहीं, गुरुदेव के अलावा कोई दूसरा तत्व नहीं, वही तत्व भी हैं और जो जीवात्मा अपना समर्पण गुरु में करता है, उसके माता पिता, कुल तीनों पवित्र और धन्य-धन्य हो जाते हैं। १०० धन्या च वसुधा देवि गुरुभक्तिः सुदुर्लभा । गुरुपुत्रो वरं मूर्खो तस्य सिध्यंति नान्यथा ॥१०१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो शिवजी कहते हैं हे भवानी ! धरती का वह भूखण्ड धन्य हो जाता है जहाँ गुरुदेव की भक्ति की जाती है और इसी भक्ति भाव के सहारे कृपा की प्राप्ति कर मूर्ख भी विद्वान हो जाता है। १०१ शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षापि सिद्धिदा भवेत् । आकल्पजन्मनां कोट्या जपहोमतपः क्रियाः ॥१०२॥ सूतजी कहते हैं कि शौनकादि ऋषियों ! गुरु से दीक्षित हो जाने के बाद सारे शुभ कर्मों की सिद्धि हो जाती हैं, करोड़ो जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं भाव उनके बताए जप, तप और होम इत्यादि पूजन के सहारे ऐसे गुरु की महिमा है। १०२ तत्सर्वं सफलं देवि गुरुसंतोषकारकं ॥१०३॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु की महिमा का वर्णन करने के क्रम में अब साफ-साफ शिवजी कह रहे हैं कि हे पार्वती ! ये जो कुछ हम फल की प्राप्ति जीवन में बताए ये सब गुरु को प्रसन्न करने पर ही प्राप्त होते हैं अतः सर्व प्रयत्नेन (हर प्रकार) गुरु को खुश रखना चाहिए। १०३ ( 46 )

ब्रह्माविष्णुमहेशादिदेवर्षिपितृकिन्नराः । सिद्धचारणयक्षाश्च ऋषयो मुनयो जनाः ॥१०४॥ गुरुसेवाः परं तीर्थमन्यत्तीर्थं निरर्थकं। सर्वतीर्थाश्च ये देवि सद्गुरोश्चरणाम्बुजं ॥१०५॥ सूतजी कहते हैं महर्षियो - ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, पितृगण, किन्नर, सिद्ध चारण, यक्ष, ऋषिगण, मुनिजन ये सब चाहे जिस पवित्र तीर्थ स्थल पर जा कर तपस्या कर लें, तब तक कोई फल की प्राप्ति इन्हें नहीं मिल सकती जब तक गुरुदेव के कमलवत चरण की सेवा करके उनकी आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक उनका किया जप, तप सब व्यर्थ होता है। अतः श्री गुरु के चरण मे ही रहना चाहिए। १०४ १०५ शरीरमिन्द्रियं प्राणाश्चार्थः स्वजनबान्धवाः। माता पिता कुलं देविं गुरुरेव न संशयः ॥१०६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - चाहिए यह कि शरीर की इन्द्रियों को वश में करके अपने स्वजनों (माता, पिता, भाई, बहन) के साथ गुरु के श्री चरणों का ही ध्यान करना चाहिए। १०६ विद्यातपोबलेनैव मंदभाग्याश्च ये नराः। गुरुसेवां न कुर्वन्ति सत्यं सत्यं वरानने ॥१०७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों जो जीवात्मा (विद्या, तप, बल) से हीन मंदबुद्धि का है, सत्य कहता हूँ वह गुरु की सेवा न करने के कारण से ऐसा हो इसलिए कहा गया है कि "गुरु बिना ज्ञानं न भवति" १०७ (४७)

जपेन फलमाप्नोति चानंतं फलमाप्नुयात्। हीनकर्म त्यजन्सर्वं स्थानानि चाधमानि च ॥१०८॥ जो जीवात्मा गुरुगीता का पाठ करके जप करता है उसी जीवात्मा को गुरु की कृपा से एक पाठ, एक माला जप का एक हजार गुना फल प्राप्त होता है। १०८ उग्रध्यानं कुक्कुटस्थं हीनकर्म फलप्रदं। गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे ॥१०९॥ सूतजी कहते हैं कि हे ऋषिगणों - जो अष्टांग योग के सहारे (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) पूरे भाव मे डूब कर विकलता, व्याकुलता की पराकाष्ठा पर पहुँचकर गुरुगीता का पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है, समर भूमि में विजय प्राप्त करता है। १०९ जपते जयमाप्नोति मरणे मुक्तिदायकं। सर्वकर्म च सर्वत्र गुरुपुत्रस्य सिद्ध्यति ॥११०॥ सूतजी कहते हैं कि जीवात्मा जैसे ही गीता पाठ के सहारे अपनों को समर्पित करके गुरुमन्त्र का जप करता है, विजय को प्राप्त करता है, मरते समय जप के प्रभाव से मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति करता है, और क्या कहें जैसे गुरु पुत्र के सारे कार्य सम्पन्न होते हैं ऐसे जीवात्मा को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। ११० ( 48 )

इदं रहस्यं नो वाच्यं तवाग्रे कथितं मया। सुगोप्यं च प्रयत्नेन येनात्मत्वं प्रयास्यसि ॥१११॥ स्वामिमुख्यगणेशादिवैष्णवानां च पार्वति। मनसापि न वक्तव्यं मम सान्निध्यकारकं ॥११२॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - शिव जगदम्बा.पार्वती को ये पावन चरित्र सुनाते हुए कह रहे हैं कि हे देवि ! आज से पूर्व कभी किसी को हमने ये गुप्त रहस्य नहीं बताया था। यहाँ तक कि जितने भी देवता हैं, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यक्ष, कुबेर, ऋषिगण, तपस्वी, मनस्वी गणेश इत्यादि हैं सब मेरी ही शरणागत होकर सर्वसिद्धि फल की प्राप्ति करते हैं। १११ ११२ अभक्तो वंचको धूर्तः पाखंडी नास्तिको नरः। मनसापि न वक्तव्या गुरुगीतां. कदाचन ॥११३॥ सूतजी का अब कहना है कि हे शौनक ! इस चराचर जगत में जो जीवात्मा भक्तिहीन, ठगधर, धूर्त, पाखण्डी, नास्तिक है, समझो निःसन्देह उसने एक भी क्षण मन से वाणी से न तो गुरुदेव का ध्यान किया है और न ही गुणगान किया है। ११३ अतीवपक्वचित्ताय श्रद्धाभक्तियुताय च। प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मासि सदाप्रिये ॥११४॥ अतः महर्षियों गुरुदेव की चरण-शरण में ही रहना श्रेयस्कर है और जो श्रद्धा भक्ति से मुक्त हो कर गुरुगीता के सहारे सिद्धान्तों पर जीता है, वह भूतभावन भोलेनाथ को प्राप्त होता है। ११४ ( 49 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri संसारसागरसमुत्तरणैकमंत्रं ब्रह्मादिदेवमुनिपूजित सिद्धमंत्रम्। दारिद्र्यदुःखभयशोकविनाशमंत्रं वंदे महाभयहरं गुरुराजमंत्रम् ॥११५॥ अतः अंतिम स्थिति में सूतजी आह्लादित होकर नैमिषारण्य की धरती पर विराजमान ८८००० ऋषियों को समझाते हैं कि महर्षियो - संसार सागर से पार पाने का सहज साधन बस यही है कि "ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, इन्द्र, मुनिजन, ऋषिगण, इत्यादि के द्वारा जो पूजित गुरुराज यन्त्र है इसी को श्रद्धान्वित होकर जपता हुआ, जीवन के दारिद्र, दुःख को समाप्त कर सुख प्राप्त करे और इस भव सागर से मुक्त हो जाय। अंतः हम उन गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करते हैं जिनका सानिध्य मात्र ही संसार का भय दूर करता है। ११५ इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे ईश्वरपार्वतीसंवादे श्रीगुरुगीता समाप्ता॥ ॥ श्रीगुरवे नमः । श्रीगुरवे नमः । श्रीगुरवे नमः॥ ऐसा स्कन्द पुराण में गुरुगीता का निरुपण भोलेनाथ पार्वती के संवाद रूप में निरुपित किया गया है। ( 50 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

॥ गुरुस्तवराजः ॥ ॥ गुंगुरुभ्यो नमः ॥ श्री गणेशाय नमः। ॥ श्री गुरुस्तवराजः प्रारभ्यते सर्वाऽभीष्टसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः॥ शरदचंद्र के समान श्वेत कमल जैसे नेत्र किंचित मुस्कराते हुये, शरद के पूर्ण चन्द्रमा के समान उद्दीत्यमान मुख, दिव्य विशाल नेत्र, श्वेत वस्त्र, चंदन को धारण किये हुए, अरूण आभा, वामांग में स्वप्रकाशित मनोहर शक्ति को बिठाए हुए, बर अभय मुद्रा धारण किये, समस्त सुलक्षणों सहित ऐसे सद्गुरु को अपने सिर में सहस्रदल कमल के मध्य ध्यान करें। ब्रह्मस्थानसरोजमध्यविलसच्छीतांशु पीठस्थितम्॥ स्फूर्जत्सूर्यरुचिं वराभयकरं कर्पूरकुन्दोज्ज्वलम्॥ श्वेतस्रग्वसनानूलेपनयुतं विद्युद्रुचा कान्तया॥ संश्लिष्टार्द्धतनुं प्रसन्नवदनं वन्दे गुरुं सादरम्॥१॥ सहस्रदल कमल में स्थित चंद्रपीठ में बैठे हुए जाज्वल्य सूर्य के समान प्रकाशित वर अभय मुद्रा धारण किये हुए, कर्पूर कुन्द के समान आभा, श्वेत पुष्प माला धारण श्वेत वस्त्र और चन्दन लेपन-बिजली के समान कांति वाली मातृ शक्ति के साथ सद्गुरु की आदर सहित वन्दना करता हूँ॥१॥ मोहध्वान्तमदान्धताग्रहवतां चक्षूंषिचोन्मीलयन्॥ यश्चक्ररुचिराणि तानि दयया ज्ञानाञ्जनाभ्यञ्जनैः॥ व्याप्तं यन्महसा जगत्त्रयमिदं तत्त्वबोधोदये॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥२॥ ( 51 )

मद मोहरूप अंधकार से ग्रसित मनुष्यों के नेत्रों को अपनी इच्छा से दया करके ज्ञान अंजन से खोलकर जिसने दिव्य अन्तर्चक्षु देकर रुचिर बना दिया है उनकी तेजोमयी कान्ति प्रभा तीनों लोक (तल, अतल, तलातल) में व्याप्त हो रही है। तत्त्व का ज्ञान बोध कराने वाले, समस्त सिद्धियों के प्रदाता शिव स्वरूप अपने सद्गुरू की वंदना करता हूँ॥२॥ मातंगी भुवनेश्वरी च बगला धूमावती भैरवी॥ तारा छिन्नशिरोधरा भगवती श्यामा रमा सुन्दरी॥ दातुं न प्रभवन्ति वाञ्छितफलं यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थ सिद्धिप्रदम्॥३॥ मातंगी, भुवनेश्वरी, बगला, धूमावती, भैरवी, तारा, छिन्नमस्ता, भगवती काली, लक्ष्मी त्रिभुवन सुन्दरी, जिस गुरु के प्रसन्न हुये बिना इच्छित फल नहीं दे सकती ऐसे शिव स्वरूप सर्व सिद्धि प्रदायक अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥३॥ काशीद्वारवती प्रयाग मथुरा-ऽयोध्या गयाऽवन्तिका॥ माया पुष्कर-काञ्चिकोत्कलगिरिः श्री शैलविन्ध्यादयः॥ नैते तारयितुं भवन्ति कुशला यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥४॥ काशी, द्वारवती, प्रयाग, मथुरा, अयोध्या, गया, अवंतिका (उज्जैन), माया, पुष्कर, कांची (शिव कांची) उत्कृष्ट उड़ीसा श्रीशैल विंध्याचल ये सभी शिव समान गुरु की कृपा के बिना तरन तारण करने में समर्थ ( 52 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

नहीं है। ऐसे शिव स्वरूप सद्गुरु सर्व सिद्धि देने वाले अपने गुरु की वंदना करता हूँ॥४॥ रेवासिन्धुसरस्वती त्रिपथगाः सूर्यात्मजा कौशिकी॥ गङ्गासागरसङ्गमोऽद्रितनया लौहित्यशोणादयः॥ नालं प्रोक्तफलप्रदानविषये यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥५॥ रेवा, सिन्धु, सरस्वती, गंगा-जमुना, कौशिकी, गंगासागर, संगमोदितनया (लोहित्य) शोणभद्रादिक ये सभी जिनकी कृपा के बिना इच्छित फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं। ऐसे शिव-स्वरूप समस्त सिद्धियों के प्रदाता अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥५॥ सत्कीर्ति विमलं यशः सुकविता पाण्डित्यमारोग्यता॥ वादे वाक्पटुता कुले चतुरता गाम्भीर्यमक्षोभ्यता॥ प्रागल्भ्यं प्रभुता गुणे निपुणता यस्य प्रसादाद् भवेत्॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिपदम्॥६॥ सुन्दर कीर्ति, विमल यश, अच्छी कविता, विद्वता, निरोगता, शास्त्रार्थ में निपुणता, कुल में चतुरता, समर्थता धैर्यशीलता, गम्भीरता, तेजस्विता ऐश्वर्यवान, गुणों में निपुणता ये समस्त गुण उन गुरुवर की करुण कृपा से ही परिपूर्णता पाते हैं जो समस्त सिद्धियों को देने वाले हैं ऐसे शिव स्वरूप अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥६॥ लोकेशो हरिरम्बिका स्मरहरो मातापिताऽभ्यागता॥ आचार्य्यः कुलपूजितो यतिवरो वृद्धस्तथा भिक्षुकः॥ ( 53 )

नैते यस्य तुलां व्रजन्ति कलया कारुण्यवारांनिधेः॥ स्तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥७॥ इंद्रादिक, विष्णुदेव, महादेव, अम्बिका माता-पिता, अतिथि, अभ्यागत, आचार्य कुलगुरु, श्रेष्ठ यतीजती, विद्या वृन्द, तपोनिष्ठ भिक्षुक इन सबकी कलायें, उन सद्गुरु करुणा सागर की अनुग्रहीत किंचित कृपा की तुलना में नगण्य हैं। ऐसे शिव स्वरूप समर्थ सद्गुरु समस्त सिद्धियों के प्रदाता की वन्दना करता हूँ॥७॥ ध्यानं दैवतपूजनं गुरुतपोदानाग्निहोत्रादयः॥ पाठो होमनिषेवणं पितृमखाह्याभ्यागतार्च्चा वलिः॥ एते व्यर्थफलां भवन्ति सततं यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥८॥ ध्यान, देव पूजन, महान तप, दान, श्राद्ध, हवन आदिक कर्म व्रतोपवास पाठ अभ्यागत अतिथि का विधिवत पूजागत सत्कर्म जिनकी कृपा के बिना सुफलदायी नहीं होते ऐसे शिव स्वरूप अपने समर्थ सद्गुरु की मैं वन्दना करता हूँ॥८॥ पूर्वाशाभिमुखः कृताञ्जलिपुटः श्लोकाष्टकं यः पठेत्॥ पौरश्चर्यविधिं विनाऽपि लभते मन्त्रस्य सिद्धि पराम्॥ नो विघ्नैः परिभूयते प्रतिदिनं प्राप्नोति पूजाफलम्॥ देहान्ते परमं पदं निविशते यद्योगिनां दुर्लभम्॥९॥ पूर्व दिशा की ओर आमुख होकर प्रातः काल विनम्र श्रद्धावनत होकर युगल कर-वंदना से भाव विभोर होते हुए उपरोक्त आठों पदों (श्लोकों ( 54 )

को) विह्वल होकर अन्तर तल हृदय स्थली से सस्वर मुक्त कण्ठ से गान करें तो वे सदपात्र बिना पुरूश्चरण किये ही पराम्बा की कृपा पाकर कृतकृत्य हो जाते हैं तथा निर्विघ्नता पूर्वक नित्य ही आराधना पूजा का मंगलदायी सुफल पाते हैं और अन्त समय परम पद मोक्ष को प्राप्त होते हैं जो पद योगियों के लिये भी दुर्लभ हैं॥९॥ इति श्री वामकेश्वरतन्त्रे पार्वतीशिवसंवादे श्रीगुरुस्तवराजः सम्पूर्णः। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शित येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति। द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्। भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूंतं नमामि॥ जिनकी कृपा कोर पाने से-चितचेतन होते उत्कर्ष। आरत शरणागत, चरणों में ले लो मेरे सद्गुरूदेव समर्थ॥ ( 55 )

॥ गुर्वष्टकम् ॥ गुरुवृत्य अनुरोधनं, न किंचिदपि तस्य दुर्लभम्। शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥१॥ सुरूपवान पुष्ट शरीर हो, उसी प्रकार की सुंदर स्त्री हो, वैभव हो अर्थात् विचित्र वैभव सुमेरु राशि तुल्य धन ये सब कुछ भी हो यदि श्री सद्गुरु के चरण कमल में मन नहीं लगा तो उससे आगे और है ही क्या। अर्थात् यदि गुरु कृपा है तो ये सभी सार्थक है वर्ना निरर्थक है, निरर्थक है, निरर्थक है, निरर्थक है॥१॥ कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्॥ गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं, ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥२॥ स्त्री, पुत्र, पौत्र, घर, मकान, भाई, बंधु सभी उपलब्ध हुये। ये तभी सार्थक हैं, जब गुरु चरण कमल में ध्यान लगा रहे। नहीं ये सभी निरर्थक, निरर्थक, निरर्थक, निरर्थक। अर्थात्-गुरु चरण ध्यान के अलावा कुछ है ही नहीं॥२॥ षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं, ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥३॥ छै अंगों सहित वेदाध्ययन सुख, शास्त्र विद्या, गद्य-पद्य मय कवित्व करना ये सभी गुरु चरण ध्यान के बिना निःस्सार हैं, निःस्सार हैं, निःस्सार हैं, निःस्सार हैं। अतः इन सब आडंबरों से होना जाना कुछ नहीं॥३॥ ( 56 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥४॥ विदेशों में मान्यता, अपने देश में धन्यवाद के पात्र होना, सदाचार चर्चा में प्रमत्त होना ये सब बिना गुरु चरण कमल के ध्यान के सभी निरर्थक हैं। अर्थात्। शांति दायक नहीं है। नहीं है। नहीं है। नहीं है॥४॥

क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥५॥ पृथ्वी मण्डल पर सभी राजाओं से जिनके चरण कमल सदा सुपूजित हैं ऐसे वैभव से क्या प्रयोजन है, कुछ नहीं। गुरु चरण कमल युगल में मन नहीं लगा तो उससे आगे कुछ भी नहीं। अर्थात् गुरु चरण युग्म का ध्यान सर्वोपरि है, ध्यान सर्वोपरि है, ध्यान सर्वोपरि है, ध्यान सर्वोपरि है॥५॥

यशो से गतं दिक्षु दानाप्रतापा-ज्जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥६॥ दान के प्रभाव से हमारा यश देश-विदेश में फैल गया हो तथा जिनके प्रसाद से संसार की हर वस्तु मिल गई हो, यदि गुरु चरणों में हमारा मन नहीं लगा तो सब व्यर्थ ही है। सब व्यर्थ ही है। सब व्यर्थ ही है। सब व्यर्थ ही है॥६॥

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ, न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥७॥ न भोग, न योग, न हाथी, घोड़े की सवारी न चन्द्र वदनी के मुख और धन इनमें चित्त नहीं हैं ऐसा विराग भी बेमानी है। अर्थात् बिना गुरु चरण कमलों के ध्यान के इससे परे और है ही क्या ? गुरु पद कमलों के ध्यान से ही सार्थकता है, सार्थकता है, सार्थकता है, सार्थकता है॥७॥ ( 57 )

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अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्त्तते मे त्वनर्घ्ये। गुरोरंघ्रिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥८॥ वीरान जंगल में, किंवा घर में या फिर किसी कार्य में मन नहीं लगता हो। अर्थात् अमूल्य गुरु चरण का ध्यान ही सर्वोपरि है उनके ध्यान के बिना सब व्यर्थ है, ध्यान के बिना सब व्यर्थ है, ध्यान के बिना सब व्यर्थ है। ध्यान के बिना सब व्यर्थ है। आगे और है ही क्या ॥८॥

अनर्घ्याणि रत्नानि मुक्तानि सम्यक्-समालिङ्गिता कामिनी यामिनीषु। गुरोरंधिपद्मे मनश्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम्॥९॥ अमूल्य रत्नों का उपयोग जीवन में किया। सुर सुन्दरियों में विषयासक्त हो के रात्रि बिता दी। यदि गुरु चरण कमलों में मन नहीं लगा तो ये सभी निरर्थक हुये। गुरु चरण ध्यान मनन ही सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्कृष्ट है। इसके आगे और कुछ है ही नहीं॥९॥

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही। लभेद्व वांछितार्थं पदं ब्रह्मसंज्ञं, गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥१०॥ यह जो पुण्यात्मा गुर्वष्टक मन लगा के पढ़े। चाहे वे यति हो या भूपति हो, गृहस्थ हो ब्रह्मचारी हो, वह वांछित ब्रह्मपद को पाता है, यदि वह गुरु वाक्य में विश्वास कर उनके अनुसार चलता है॥१०॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं गुरोरष्टकं सम्पूर्णम्॥

( 58 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

श्री पीताम्बरा माँ की आरती जय पीताम्बरधारिणि जय सुखदे वरदे, मातर्जय सुखदे वरदे। भक्तजनानां क्लेशं भक्तजनानां क्लेशं सततं दूर करे॥ जय देवि जय देवि ॥१॥ असुरैः पीड़ितदेवास्तव शरणं प्राप्ताः, मातस्तवशरणं प्राप्ताः। धृत्वा कौर्मशरीरं धृत्वा कौर्मशरीरं दूरीकृतदुःखम्॥ जय देवि जय देवि ॥२॥ मुनिजनवन्दितचरणे जय विमले बगले, मातर्जय विमले बगले। संसारार्णवभीतिं संसारार्णवभीतिं नित्यं शान्तकरे॥ जय देवि जय देवि ॥३॥ नारदसनकमुनीन्द्रैर्ध्यातां पदकमलं मातर्ध्यातां पदकमलं। हरिहरद्रुहिणसुरेन्द्रैः हरिहरद्रुहिणसुरेन्द्रैः सेवितपदयुगलम्॥ जय देवि जय देवि ॥४॥ काञ्चनपीठनिविष्टे मुद्गरपाशयुते, मातर्मुद्गरपाशयुते। जिह्वावज्रसुशोभित जिह्वावज्रसुशोभित पीतांशुकलसिते॥ जय देवि जय देवि ॥५॥ विन्दुत्रिकोणषडस्त्रैरष्टदलोपरिते, मातरष्टदलोपरिते। षोडशदलगत्पीठं षोडशदलगत्पीठं भूपुरवृत्तयुतम्॥ जय देवि जय देवि ॥६॥ इत्थं साधकवृन्दश्चिन्तयते रूपं मातश्चिन्तयतेरूपं। शत्रुविनाशकबीजं शत्रुविनाशकबीजं धृत्वा हृत्कमले॥ जय देवि जय देवि ॥७॥ अणिमादिकबहुसिद्धि लभते सौख्ययुतां, मातर्लभते सौख्ययुतां। भोगान्भुक्त्वा सर्वान्, भोगान्भुक्त्वा सर्वान्, गच्छतिविष्णुपदम्॥ जय देवि जय देवि ॥८॥ पूजाकाले कोऽपि आर्तिक्यं पठते, मातरार्तिक्यं पठते। धनधान्यादिसमृद्धो धनधान्यादिसमृद्धः सान्निध्यं लभते॥ जय देवि जय देवि ॥९॥ ( 59 )

४. गुरु-स्तवराज, गुरु-अष्टक एवं स्तोत्र संग्रह

पुष्पाञ्जलि एवं प्रदक्षिणादि हाथ में पुष्प लेकर निम्न मन्त्रों को पढ़ें- ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्म्माणिप्प्रथमान्यासन्। ते हनाकम्महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः। ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने। नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामान् कामकामाय मह्यं। कामेश्वरी वैश्रवणो ददातु। कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः। ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठयं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्त- पर्यायी स्यात्सार्वभौमः सार्वायुष आन्तादापरार्धात्। पृथिव्यै समुद्र- पर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतःपरिवेष्टातारो मरुत्तभ्यावसन्गृहे, आविक्षितस्य कामप्रे विश्वेदेवाः सभासद इति। ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो वाहुरुतविश्वतस्प्पात्। सम्बाहुभ्यांधमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देवएकः। ॐकुलकुमार्यै विद्महे पीताम्बरायै धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात्। नानाविधानि पुष्पाणि यथाकालोद्भव्वानि च। पुष्पांजलिं मया दत्तं गृहाण बगलामुखि। ( 60 )

पीताम्बरा माँ की आरती का हिन्दी रूपान्तर हे पीत वस्त्र धारण करने वाली माँ आपकी जय हो। हे सुखदात्री माँ हे वरदात्री माँ आपकी जय हो। माँ अपने भक्तो का दुख सदा के लिए दूर कर दो। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो।।१।। दैत्यों से पीड़ित देवतागण जब आपकी शरण स्वीकारे तो आपने ही कौर्मशरीर धारण कर उनका दुख दूर किया है। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।२।। हे विमलाभी हे बगला माँ हे मुनिगणवन्दत चरणों वाली वाली माँ संसारार्णव का भय कृपा कर शांत करो माँ। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।३।। हे माँ आपका चरण कमल सनकमुनी भी स्मरण योग्य तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र द्वारा भी सेव्य है। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।४।। माँ आप स्वर्ण सिंहासन पर विराजती है और मुद्गर पाश धारण करती है। शत्रु जिव्हा वज्र से शोभायमान पीतां शुक मुक्ता। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।५।। बिन्दु त्रिकोण स्वरूपा षड़स्त्र द्वारा संरक्षित अष्टदल से घिरी हुई षोडषदल वाले पीठ पर सुशोभित बल से युक्त माँ आपकी जय हो हे देवि आपकी जय हो ।।६।। हे माँ आपके साधकों के द्वारा इसी स्वरूप का ही चिंतन किया जाता है माँ आप शत्रु विनाशकवीज हृदय कमल में धारण करती है हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।७।। हे माँ आपकी ही कृपा से अणिमादिक अनेकों सिद्धि भी प्राप्त होती हैं और साथ में सुखशक्ति भी प्राप्त होती है और सारे सुख प्राप्त करके साधक विष्णुलोक प्राप्त करता है। अतः हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।८।। हे माँ पूजा काल में कोई भी यदि आपकी आरती का पाठ करता है तो वो धन धान्यादि से युक्त हो आपका सान्निध्य प्राप्त करता है इसलिए माँ आपकी जय हो आपकी जय हो ।।९।।

अथ देवरूपराधक्षमापनस्तोत्रम् न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥१॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥२॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूवस्तव मवा। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुपे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥ ( 62 )

परित्यक्ता देवा विविधविधमेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं तमि शरणाम् ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥ न मोक्षस्याकाङ्क्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥८॥

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रूक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥ जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं देव्यधराज्यक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम्। ( 64 )