भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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जपेन फलमाप्नोति चानंतं फलमाप्नुयात्। हीनकर्म त्यजन्सर्वं स्थानानि चाधमानि च ॥१०८॥ जो जीवात्मा गुरुगीता का पाठ करके जप करता है उसी जीवात्मा को गुरु की कृपा से एक पाठ, एक माला जप का एक हजार गुना फल प्राप्त होता है। १०८ उग्रध्यानं कुक्कुटस्थं हीनकर्म फलप्रदं। गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे ॥१०९॥ सूतजी कहते हैं कि हे ऋषिगणों - जो अष्टांग योग के सहारे (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) पूरे भाव मे डूब कर विकलता, व्याकुलता की पराकाष्ठा पर पहुँचकर गुरुगीता का पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है, समर भूमि में विजय प्राप्त करता है। १०९ जपते जयमाप्नोति मरणे मुक्तिदायकं। सर्वकर्म च सर्वत्र गुरुपुत्रस्य सिद्ध्यति ॥११०॥ सूतजी कहते हैं कि जीवात्मा जैसे ही गीता पाठ के सहारे अपनों को समर्पित करके गुरुमन्त्र का जप करता है, विजय को प्राप्त करता है, मरते समय जप के प्रभाव से मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति करता है, और क्या कहें जैसे गुरु पुत्र के सारे कार्य सम्पन्न होते हैं ऐसे जीवात्मा को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। ११० ( 48 )