भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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इदं रहस्यं नो वाच्यं तवाग्रे कथितं मया। सुगोप्यं च प्रयत्नेन येनात्मत्वं प्रयास्यसि ॥१११॥ स्वामिमुख्यगणेशादिवैष्णवानां च पार्वति। मनसापि न वक्तव्यं मम सान्निध्यकारकं ॥११२॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - शिव जगदम्बा.पार्वती को ये पावन चरित्र सुनाते हुए कह रहे हैं कि हे देवि ! आज से पूर्व कभी किसी को हमने ये गुप्त रहस्य नहीं बताया था। यहाँ तक कि जितने भी देवता हैं, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यक्ष, कुबेर, ऋषिगण, तपस्वी, मनस्वी गणेश इत्यादि हैं सब मेरी ही शरणागत होकर सर्वसिद्धि फल की प्राप्ति करते हैं। १११ ११२ अभक्तो वंचको धूर्तः पाखंडी नास्तिको नरः। मनसापि न वक्तव्या गुरुगीतां. कदाचन ॥११३॥ सूतजी का अब कहना है कि हे शौनक ! इस चराचर जगत में जो जीवात्मा भक्तिहीन, ठगधर, धूर्त, पाखण्डी, नास्तिक है, समझो निःसन्देह उसने एक भी क्षण मन से वाणी से न तो गुरुदेव का ध्यान किया है और न ही गुणगान किया है। ११३ अतीवपक्वचित्ताय श्रद्धाभक्तियुताय च। प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मासि सदाप्रिये ॥११४॥ अतः महर्षियों गुरुदेव की चरण-शरण में ही रहना श्रेयस्कर है और जो श्रद्धा भक्ति से मुक्त हो कर गुरुगीता के सहारे सिद्धान्तों पर जीता है, वह भूतभावन भोलेनाथ को प्राप्त होता है। ११४ ( 49 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal