भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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ब्रह्माविष्णुमहेशादिदेवर्षिपितृकिन्नराः । सिद्धचारणयक्षाश्च ऋषयो मुनयो जनाः ॥१०४॥ गुरुसेवाः परं तीर्थमन्यत्तीर्थं निरर्थकं। सर्वतीर्थाश्च ये देवि सद्गुरोश्चरणाम्बुजं ॥१०५॥ सूतजी कहते हैं महर्षियो - ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, पितृगण, किन्नर, सिद्ध चारण, यक्ष, ऋषिगण, मुनिजन ये सब चाहे जिस पवित्र तीर्थ स्थल पर जा कर तपस्या कर लें, तब तक कोई फल की प्राप्ति इन्हें नहीं मिल सकती जब तक गुरुदेव के कमलवत चरण की सेवा करके उनकी आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक उनका किया जप, तप सब व्यर्थ होता है। अतः श्री गुरु के चरण मे ही रहना चाहिए। १०४ १०५ शरीरमिन्द्रियं प्राणाश्चार्थः स्वजनबान्धवाः। माता पिता कुलं देविं गुरुरेव न संशयः ॥१०६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - चाहिए यह कि शरीर की इन्द्रियों को वश में करके अपने स्वजनों (माता, पिता, भाई, बहन) के साथ गुरु के श्री चरणों का ही ध्यान करना चाहिए। १०६ विद्यातपोबलेनैव मंदभाग्याश्च ये नराः। गुरुसेवां न कुर्वन्ति सत्यं सत्यं वरानने ॥१०७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों जो जीवात्मा (विद्या, तप, बल) से हीन मंदबुद्धि का है, सत्य कहता हूँ वह गुरु की सेवा न करने के कारण से ऐसा हो इसलिए कहा गया है कि "गुरु बिना ज्ञानं न भवति" १०७ (४७)