भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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सूतजी कहते हैं महर्षियो और क्या कहें गुरुदेव के अतिरिक्त कोई और नहीं, गुरुदेव के अलावा कोई दूसरा तत्व नहीं, वही तत्व भी हैं और जो जीवात्मा अपना समर्पण गुरु में करता है, उसके माता पिता, कुल तीनों पवित्र और धन्य-धन्य हो जाते हैं। १०० धन्या च वसुधा देवि गुरुभक्तिः सुदुर्लभा । गुरुपुत्रो वरं मूर्खो तस्य सिध्यंति नान्यथा ॥१०१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो शिवजी कहते हैं हे भवानी ! धरती का वह भूखण्ड धन्य हो जाता है जहाँ गुरुदेव की भक्ति की जाती है और इसी भक्ति भाव के सहारे कृपा की प्राप्ति कर मूर्ख भी विद्वान हो जाता है। १०१ शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षापि सिद्धिदा भवेत् । आकल्पजन्मनां कोट्या जपहोमतपः क्रियाः ॥१०२॥ सूतजी कहते हैं कि शौनकादि ऋषियों ! गुरु से दीक्षित हो जाने के बाद सारे शुभ कर्मों की सिद्धि हो जाती हैं, करोड़ो जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं भाव उनके बताए जप, तप और होम इत्यादि पूजन के सहारे ऐसे गुरु की महिमा है। १०२ तत्सर्वं सफलं देवि गुरुसंतोषकारकं ॥१०३॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु की महिमा का वर्णन करने के क्रम में अब साफ-साफ शिवजी कह रहे हैं कि हे पार्वती ! ये जो कुछ हम फल की प्राप्ति जीवन में बताए ये सब गुरु को प्रसन्न करने पर ही प्राप्त होते हैं अतः सर्व प्रयत्नेन (हर प्रकार) गुरु को खुश रखना चाहिए। १०३ ( 46 )