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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

क्षमापन स्तोत्र का हिन्दी अनुवाद हे, माँ! मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र, अहो! मुझे स्तुतिका भी ज्ञान नहीं है। न आवाहन का पता है, न ध्यानका। स्तोत्र और कथा की भी जानकारी नहीं है। न तो तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ और न मुझे व्याकुल होकर विलाप करना ही आता है, परंतु एक बात जानता हूँ, केवल तुम्हारा अनुसरण-तुम्हारे पीछे चलना। जो कि सब क्लेशों को-समस्त दुःख विपत्तियों को हर लेनेवाला है ॥१॥ सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी माता। मैं पूजाकी विधि नहीं जानता, मेरे पास धनका भी अभाव है, मैं स्वभाव से भी आलसी हूँ तथा मुझसे ठीक-ठीक पूजा का सम्पादन हो भी नहीं सकता, इन सब कारणों से तुम्हारे चरणों की सेवा में त्रुटि हो गयी हो, उसे क्षमा करना। क्योंकि कुपुत्र का होना सम्भव है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती॥२॥ माँ! इस पृथ्वीपर तुम्हारे सीधे-सादे पुत्र तो बहुत से हैं, किंतु उन सबमें मैं ही अत्यन्त चपल तुम्हारा बालक हूँ, मेरे-जैसा चंचल कोई विरला ही होगा। शिवो मेरा जो यह त्याग हुआ है, यह तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है, क्योंकि संसार में कुपुत्र का होना सम्भव है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती॥३॥ जगदम्बा ! मात: ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा कभी नहीं की देवि। तुम्हें अधिक धन भी समर्पित नहीं किया, तथापि मुझ-जैसे अधारण को तुम अनुपम स्नेह करती हो, इसका कारण यही है कि संसार में कुपुत्र पैदा हो सकता है किन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ॥४॥ ( 65 )

गणेशजी को जन्म देने वाली माता पार्वती। (अन्य देवताओं को आराधना करते समय) मुझे नाना प्रकार की सेवाओं में लगा रहना पड़ता था, इसलिये पचासी वर्षों से अधिक अवस्था बीत जाने पर मैंने देवताओं को छोड़ दिया है। अब उनकी सेवा-पूजा मुझ से नहीं हो पाती, अतएव उनसे कुछ भी सहायता मिलने की आशा नहीं है। इस समय यदि तुम्हारी कृपा नहीं होगी तो मैं अवलम्बरहित होकर किसकी शरण में जाऊँगा ॥५॥ माता अपर्णा। तुम्हारे मन्त्र का एक अक्षर भी कान में पड़ जाये तो उसका फल यह होता है कि मूर्ख चाण्डाल भी मधुपाकं के समान्य मधुर वाणी का उच्चारण करने वाला उत्तम वक्ता हो जाता है, दीन मनुष्य भी करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से सम्पन्न हो चिरकाल तक निर्भय विहार करता रहता है। जब मंत्र के अक्षर के श्रवण का ऐसा फल है तो जो लोग विधि पूर्वक जप में लगे रहते हैं उनके जप से प्राप्त होने वालां उत्तम फल कैसा होगा। इसको कौन मनुष्य जान सकता है ॥६॥ भवानी! जो अपने अंगों में चिता की राख-भभूत लपेटे रहते हैं, जिनका विष ही भोजन है, जो दिगम्बरधारी (नग्न रहने वाले) हैं, मस्तक पर जटा और कण्ठ में नागराज वासुकिको हारके रूप में धारण करते हैं तथा जिनके हाथ में कपाल (भिक्षापात्र) शोभा पाता है, ऐसे भूतनाथ पशुपति भी जो एकमात्र 'जगदीश' की पदवी धारण करते हैं, इसका क्या कारण है ? यह महत्त्व उन्हें कैसे मिला, यह केवल तुम्हारे पाणिग्रहण की परिपाटीका फल है, तुम्हारे साथ विवाह होने से ही उनका महत्त्व बढ़ गया ॥७॥ (66) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

मुख में चन्द्रमा की शोभा धारण करने वाली माँ ! मुझे मोक्षकी इच्छा नहीं है, संसार के वैभव की अभिलाषा नहीं है, न विज्ञान की अपेक्षा है, न सुखकी आकांक्षा, अतः तुमसे मेरी यही याचना है कि मेरा जन्म ‘मृडानी, रुद्राणी, शिव, शिव, भवानी' - इन नामोंका जप करते हुए बीते ॥८॥ माँ श्यामा! नाना प्रकार की पूजन-सामग्रियों से कभी विधिपूर्वक तुम्हारी आराधना मुझसे न हो सकी। सदा कठोर भावका चिन्तन करने वाली मेरी वाणी ने कौन सा अपराध नहीं किया है। फिर भी तुम स्वयं ही प्रयत्न करके मुझ अनाथ पर जो किंचित् कृपादृष्टि रखती हो, माँ! यह तुम्हारे ही योग्य है। तुम्हारी-जैसी दयामयी माता ही मेरे जैसे कुपुत्र को भी आश्रय दे सकती है ॥९॥ माता दुर्गे ! करुणासिन्धु महेश्वरी। मैं विपत्तियों में फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हूँ (पहले कभी नहीं करता रहा) इसे मेरी शठता न मान लेना, क्योंकि भूख प्यास से पीड़ित बालक माता का ही स्मरण करता है॥१०॥ जगदम्ब ! मुझ पर जो तुम्हारी पूर्ण कृपा बनी हुई है, इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है, पुत्र अपराध पर अपराध क्यों न करता जाता हो, फिर भी माता उसकी उपेक्षा नहीं करती॥११॥ महादेवि ! मेरे समान कोई पातकी नहीं है और तुम्हारे समान दूसरी कोई पापहारिणी नहीं है, ऐसा जानकर जो उचित जान पड़े, वह करो माँ ॥१२॥ (67)

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Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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