श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे भी गुरु कृपा के सहारे बचाया जा सकता है। ५८ अशक्ता हि सुराः सर्वेः ह्यशक्ता मुनयस्तथा। गुरुशापाहताः क्षीणा क्षयं यांति न संशयः ॥५९॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों देवताओं के द्वारा श्रापित और मुनियों के द्वारा श्रापित जीव बच सकता है, पुष्टि प्राप्ति कर सकता है किन्तु गुरुदेव के द्वारा श्रापित व्यक्ति बच नहीं सकता। ५९ मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयं। श्रुतिवेदांतवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदं ॥६०॥ इसलिए अब शिवजी कहते हैं कि पार्वती दो अक्षर से बना शब्द जो गुरु है यही मन्त्रों का राजा है, श्रुतियां वेद कहते हैं गुरु साक्षात परमपद है कोई सामान्य पद नहीं है। ६० श्रुतिस्मृतिमविज्ञाय केवलं गुरुसेवकाः। ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ॥६१॥ सूतजी कहते हैं जो सन्यासी महात्मा महापुरुष है वो भी यही कहते हैं कि श्रुतियाँ, स्मृतियां विज्ञाय भी सही सुझाव देते हैं कि केवल गुरुदेव की ही सेवा करनी चाहिए। ६१ नित्यं ब्रह्मनिराकारं निर्गुणं बोधयेत्परं। पूर्णब्रह्म निराभासं दीपो दीपांतरं यथा ॥६२॥