श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूतजी कहते हैं कि जो नित्य निरन्तर निर्गुण निराकार ब्रह्म में डूबे अपने आप को ऐसे प्रकाशित कर रहे हैं जैसे दीपक-दीपक की प्रकाशिक स्थिति में एक रहता है। ६२ गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामो हि लभ्यते। अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ॥६३॥ इसलिए ऋषियों जो आत्माराम है, अर्थात जो आनन्द में ब्रह्ममयस्वरूप का अनुभव कर आनन्दित हो रहे हैं तो भी गुरु की कृपा के ही कारण से प्रकाशित हैं, गुरुदेव के बताए हुए अनेक मार्गों के सहारे अपने को आत्मज्ञान स्वरूपमय कर लेते हैं। ६३ आब्रह्मस्तंबपर्यंतं परमात्मस्वरूपकं। स्थावरं जंगमं चैव प्रणमामि जगन्मयं ॥६४॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ब्रह्मा की बनाई हुई सृष्टि के प्रत्येक जीवरूप में (स्थावरजड़, जंगम-चलता-फिरता) गुरुदेव की पावन छवि निहारता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता हूं। ६४ परात्परतरं ध्येयं नित्यमानंदकारकं। हृदयाकाशमध्यस्थं शुद्धस्फटिकसंनिभं ॥६५॥ कहने का भाव यह है कि हम प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करने वाले शिवस्वरूप का हम ध्यान करते हैं जो जीव के हृदयमध्य भाग में शुद्ध विशुद्ध स्फटिक मणि की भांति प्रकाशित हो रहे हैं अर्थात चैतन्य स्वरूप ३५