श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं और छोटे-बड़े जीव सबमें वही है, चींटी से लेकर हाथी तक के हृदय मध्य में वही है। ६५ अगोचरं तथा गम्यं रूपनामादिवर्जितं। निःशब्दं तु विजानीयात्स्वभावं ब्रह्म पार्वति ॥६६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों इस प्रकार गुरु महिमा का विशद उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जो गुरुस्वरूप परब्रह्म है यद्यपि अगोचर है, निर्गुण, निराकार शब्दों में नहीं कहा जा सकता है, जिसकी ये सारी गुणवत्ता है, ऐसा निर्गुण परमब्रह्म गुरु स्वाभाव कारण से अनुभवित किया जा सकता है। ६६ अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति यो भावः शृणु तं कथयाम्यहं ॥६७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो, शिवजी कहते है देवि ! जो जीवात्मा हृदय में प्रविष्ट सत स्वरूप गुरु का जो कि अंगुष्ठभाव रूप में है उनका जो भी ध्यान करता है उसको जो आनन्द सुख मिलता है उसे सुनो। ६७ स्वयं सर्वमयो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित्। कीटभ्रमरवत्तत्र ध्यानं भवति तादृशम् ॥६८॥ जो इस प्रकार अंगुष्ठ स्वरूप सततत्व का ध्यान करता है वह स्वयं सर्वरूप हो जाता है उसे इस बात का बोध हो जाता है कि जो तत्व मुझको प्रकाशित है वही प्रत्येक जड़ चेतन रूप में है। ६८