श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri यस्यावलोकनादेव सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निस्पृहः शांतः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ॥६९॥ इस प्रकार वह जीवात्मा अपने प्रकाशित परमतत्व मे डूबा रहता है न कोई उसका मित्र रह जाता है, न शत्रु, क्योंकि सृष्टि शरीर में नहीं अपितु तत्व में निर्दिष्ट हो जाती है। ६९ सर्वज्ञोऽयमिति प्राहुर्देही सर्वमयो बुधः। सदानंदः सदा शांतो रमते यत्रकुत्रचित् ॥७०॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों वह प्रकाशित जीवात्मा सर्वज्ञ हो जाता है सर्वभूतमय हो जाता है सबमे आपने आप को ही देखता हुआ आनन्दित रमण करता रहता है कोई समस्या नहीं होती। ७० उपदेशो मया देवि गुरुमार्गेण दर्शितः। गुरुभक्तिस्तथा ध्यानं सफलं तव कीर्तितं ॥७१॥ इस प्रकार महर्षियों शंकरजी ने कहा कि मेरे द्वारा दिया गया, किया गया यह पावन उपदेश गुरुमार्ग ही प्रदर्शित करता है और संसार में कीर्ति इसी की होती है जो गुरु में भक्ति का भाव रखता है और उन्ही का ध्यान करता रहता है इसलिए उनकी शरण मे ही रहना चाहिए। ७१ अनेन तु भवेत्कार्यं यद्वदामि महाशये। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥७२॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal