श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सूतजी गुरुगीता के वर्णन विस्तार क्रम में अब ये समझाने का प्रयास करते हैं कि वैसे बहुत सारे कार्य बताए गए हैं महापुरुषों के द्वारा, किन्तु वे लौकिक मार्ग लोकहित मे नहीं है अतः गुरु सानिध्य ही बड़ा सानिध्य है। ७२ लौकिकाः कर्मतो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवे। ज्ञानेन भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म सांप्रतं ॥७३॥ सूतजी कहते हैं कि ज्ञानहीन लौकिक कर्म चाहे जितने कर लो, संसार सागर से मुक्ति उनके द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते है, और जब गुरु ज्ञान से युक्त कर्म जीवात्मा करता है तो उसे हर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। ७३ इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयते यदि। लिखित्वा यत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत् ॥७४॥ और इस प्रकार गुरुगीता का मर्म प्रकाशित करते हुए बताते हैं कि हे शौनकादि ऋषियों जो भी इस गुरुगीता का पाठ श्रद्धा भक्ति के साथ करता है, सुनता है, पढ़ता है, लिखता है वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है। ७४ गुरुगीताक्षरैकं तु यंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीं ॥७५॥ इसलिए महर्षियों ! जो भी गुरुगीता के एक भी अक्षर को यंत्रराज समझकर जपता है, उसे अन्य मन्त्र इत्यादि सोलह कलाओं से भी कहीं ज्यादा लाभ एकाक्षर यंत्रराज के जप से ही प्राप्त होता है। ७५ ( 38 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal