श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गुरुगीतात्मक देवि शुद्धं तत्वं मयोदितं। भवव्याधिविनाशाथं स्वयमेव सदा जपेत् ॥७६॥ भोलेनाथ कहते हैं कि प्रिये ! गुरुगीता रूप मे यह शुद्ध विशुद्ध तत्व मेरे द्वारा ही प्रकटित हुआ है जो भी इसका जप, ध्यान, पाठ करता है उसे भवबाधा नहीं भोगनी पड़ती है। ७६ अनंतफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु। सर्वपापसमूहघ्नं सर्व दारिद्र्यनाशनं ॥७७॥ गुरुगीता के फल प्रभाव का.वर्णन करते हुए बताते हैं कि जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह अनन्त फल प्राप्त करता है, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सारे दरिद्र समाप्त हो जाते हैं अर्थात जीवन वैभवपूर्ण बन जाता है। ७७ कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनं। यक्षराक्षसभूतानां चोरव्याघ्रभयापहं ॥७८॥ इस गुरुगीता के पाठ से अकाल मृत्यु का भय, सारे संकट समाप्त हो जाते हैं यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, चोर, हिंसक पशुओं का भय भी समाप्त हो जाता है अर्थात कोई बाधा नहीं होती। ७८ महाव्याधिहरं चैवं विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेव जपेत्सदा ॥७९॥ यहाँ तक कि महाव्याधि की बाधा भी दूर हो जाती है सारी विभूतियां ( 39 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal