श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धि को प्राप्त होती हैं इस गुरुगीता के जप के प्रभाव से सबको अपने वश मे किया जाता है। ७९ कुशैर्वा दूर्वया देवि आसने शुभ्रकंबले। उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ॥८०॥ सूतजी महर्षियों से कहते हैं कि शिवजी पार्वती से कहे कि देवि ! कुशा और दूर्ब के आसन पर बैठकर जो भक्तिभाव के साथ श्रद्धा युक्त होकर भजता है, उसको सब कुछ प्राप्त होता है। ८०
शुक्लासने वैः शान्त्यर्थं वश्ये रक्तासनं प्रिये। अभिचारे कृष्णवर्णं पीतवर्णं धनागमे ॥८१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो इस गुरुगीता का पाठ जो शुक्लासन पर बैठ कर करता है उसे शान्ति मिलती है, रक्तासन पर बैठकर जो करता है उसे सारा संसार पूजता है, अर्थात सब उसी के वश में हो जाते हैं कृष्णासन से अभिचार, पीतासन से धनागम की प्राप्ति होती है। ८१
उत्तरे शांतिजाप्यं स्यात् वश्ये पूर्व मुखोदितं। दक्षिणे मारणं प्रोक्तं स्तंभने पश्चिम मुखं ॥८२॥ अब कहने का भाव ये है कि शांति की प्राप्ति के लिये शुक्लासन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, सबको अपने अनुकूल करने के लिये रक्तासन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, शत्रु को मारने के लिये दक्षिण की ओर मुख करके, और स्तम्भन प्रधान के लिये पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए, ऐसा कहा गया है। ८२
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