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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवि भूयः प्रियकरं राजानं वश्यमानयेत् ॥८३॥ हे महर्षियों ! हे गिरिनन्दिनि ! सुनो ये गुरुगीता का पाठ प्रत्येक जीव को विमोहित करके पाठकर्ता के अनुकूल करता है और इतना ही नहीं यह मोक्ष की प्राप्ति भी करा देता है और राजाओं को भी वशीभूत कर देता है इसलिए श्रद्धायुक्त होकर पाठ करना चाहिए। ८३ मुखस्तंभकरं नृणां गुणानांच विवर्धनं। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्म सिद्धिदं भवेत् ॥८४॥ इस गुरुगीता के पाठ के प्रभाव से कर्ता के मुख पर दिव्यतेज प्राप्त होता है गुणों की वृद्धि होती है, सारे दुष्कर्म नष्ट हो जाते हैं और सत्कर्म पथ पर जीव दौड़ पड़ता है। ८४ सर्व शांतिकरं नित्यं वंध्यापुत्र फलप्रदं। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परं ॥८५॥ यह दिव्य गीता पाठ हर तरह की सुख शान्ति प्रदान करता है यहाँ तक कि बन्ध्या स्त्री को पुत्रवती करता है, और स्त्रियां अगर पाठ करती हैं कभी विधवा नहीं होती। ८५ आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रपौत्रविवर्धनं। निष्कामस्तु त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात् ॥८६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो इस गुरुगीता पाठ से जीवात्मा अपने जीवन (41)