भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

सूतजी कहते हैं कि जो नित्य निरन्तर निर्गुण निराकार ब्रह्म में डूबे अपने आप को ऐसे प्रकाशित कर रहे हैं जैसे दीपक-दीपक की प्रकाशिक स्थिति में एक रहता है। ६२ गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामो हि लभ्यते। अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ॥६३॥ इसलिए ऋषियों जो आत्माराम है, अर्थात जो आनन्द में ब्रह्ममयस्वरूप का अनुभव कर आनन्दित हो रहे हैं तो भी गुरु की कृपा के ही कारण से प्रकाशित हैं, गुरुदेव के बताए हुए अनेक मार्गों के सहारे अपने को आत्मज्ञान स्वरूपमय कर लेते हैं। ६३ आब्रह्मस्तंबपर्यंतं परमात्मस्वरूपकं। स्थावरं जंगमं चैव प्रणमामि जगन्मयं ॥६४॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ब्रह्मा की बनाई हुई सृष्टि के प्रत्येक जीवरूप में (स्थावरजड़, जंगम-चलता-फिरता) गुरुदेव की पावन छवि निहारता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता हूं। ६४ परात्परतरं ध्येयं नित्यमानंदकारकं। हृदयाकाशमध्यस्थं शुद्धस्फटिकसंनिभं ॥६५॥ कहने का भाव यह है कि हम प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करने वाले शिवस्वरूप का हम ध्यान करते हैं जो जीव के हृदयमध्य भाग में शुद्ध विशुद्ध स्फटिक मणि की भांति प्रकाशित हो रहे हैं अर्थात चैतन्य स्वरूप ३५

हैं और छोटे-बड़े जीव सबमें वही है, चींटी से लेकर हाथी तक के हृदय मध्य में वही है। ६५ अगोचरं तथा गम्यं रूपनामादिवर्जितं। निःशब्दं तु विजानीयात्स्वभावं ब्रह्म पार्वति ॥६६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों इस प्रकार गुरु महिमा का विशद उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जो गुरुस्वरूप परब्रह्म है यद्यपि अगोचर है, निर्गुण, निराकार शब्दों में नहीं कहा जा सकता है, जिसकी ये सारी गुणवत्ता है, ऐसा निर्गुण परमब्रह्म गुरु स्वाभाव कारण से अनुभवित किया जा सकता है। ६६ अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति यो भावः शृणु तं कथयाम्यहं ॥६७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो, शिवजी कहते है देवि ! जो जीवात्मा हृदय में प्रविष्ट सत स्वरूप गुरु का जो कि अंगुष्ठभाव रूप में है उनका जो भी ध्यान करता है उसको जो आनन्द सुख मिलता है उसे सुनो। ६७ स्वयं सर्वमयो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित्। कीटभ्रमरवत्तत्र ध्यानं भवति तादृशम् ॥६८॥ जो इस प्रकार अंगुष्ठ स्वरूप सततत्व का ध्यान करता है वह स्वयं सर्वरूप हो जाता है उसे इस बात का बोध हो जाता है कि जो तत्व मुझको प्रकाशित है वही प्रत्येक जड़ चेतन रूप में है। ६८

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri यस्यावलोकनादेव सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निस्पृहः शांतः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ॥६९॥ इस प्रकार वह जीवात्मा अपने प्रकाशित परमतत्व मे डूबा रहता है न कोई उसका मित्र रह जाता है, न शत्रु, क्योंकि सृष्टि शरीर में नहीं अपितु तत्व में निर्दिष्ट हो जाती है। ६९ सर्वज्ञोऽयमिति प्राहुर्देही सर्वमयो बुधः। सदानंदः सदा शांतो रमते यत्रकुत्रचित् ॥७०॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों वह प्रकाशित जीवात्मा सर्वज्ञ हो जाता है सर्वभूतमय हो जाता है सबमे आपने आप को ही देखता हुआ आनन्दित रमण करता रहता है कोई समस्या नहीं होती। ७० उपदेशो मया देवि गुरुमार्गेण दर्शितः। गुरुभक्तिस्तथा ध्यानं सफलं तव कीर्तितं ॥७१॥ इस प्रकार महर्षियों शंकरजी ने कहा कि मेरे द्वारा दिया गया, किया गया यह पावन उपदेश गुरुमार्ग ही प्रदर्शित करता है और संसार में कीर्ति इसी की होती है जो गुरु में भक्ति का भाव रखता है और उन्ही का ध्यान करता रहता है इसलिए उनकी शरण मे ही रहना चाहिए। ७१ अनेन तु भवेत्कार्यं यद्वदामि महाशये। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥७२॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सूतजी गुरुगीता के वर्णन विस्तार क्रम में अब ये समझाने का प्रयास करते हैं कि वैसे बहुत सारे कार्य बताए गए हैं महापुरुषों के द्वारा, किन्तु वे लौकिक मार्ग लोकहित मे नहीं है अतः गुरु सानिध्य ही बड़ा सानिध्य है। ७२ लौकिकाः कर्मतो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवे। ज्ञानेन भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म सांप्रतं ॥७३॥ सूतजी कहते हैं कि ज्ञानहीन लौकिक कर्म चाहे जितने कर लो, संसार सागर से मुक्ति उनके द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते है, और जब गुरु ज्ञान से युक्त कर्म जीवात्मा करता है तो उसे हर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। ७३ इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयते यदि। लिखित्वा यत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत् ॥७४॥ और इस प्रकार गुरुगीता का मर्म प्रकाशित करते हुए बताते हैं कि हे शौनकादि ऋषियों जो भी इस गुरुगीता का पाठ श्रद्धा भक्ति के साथ करता है, सुनता है, पढ़ता है, लिखता है वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है। ७४ गुरुगीताक्षरैकं तु यंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीं ॥७५॥ इसलिए महर्षियों ! जो भी गुरुगीता के एक भी अक्षर को यंत्रराज समझकर जपता है, उसे अन्य मन्त्र इत्यादि सोलह कलाओं से भी कहीं ज्यादा लाभ एकाक्षर यंत्रराज के जप से ही प्राप्त होता है। ७५ ( 38 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गुरुगीतात्मक देवि शुद्धं तत्वं मयोदितं। भवव्याधिविनाशाथं स्वयमेव सदा जपेत् ॥७६॥ भोलेनाथ कहते हैं कि प्रिये ! गुरुगीता रूप मे यह शुद्ध विशुद्ध तत्व मेरे द्वारा ही प्रकटित हुआ है जो भी इसका जप, ध्यान, पाठ करता है उसे भवबाधा नहीं भोगनी पड़ती है। ७६ अनंतफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु। सर्वपापसमूहघ्नं सर्व दारिद्र्यनाशनं ॥७७॥ गुरुगीता के फल प्रभाव का.वर्णन करते हुए बताते हैं कि जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह अनन्त फल प्राप्त करता है, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सारे दरिद्र समाप्त हो जाते हैं अर्थात जीवन वैभवपूर्ण बन जाता है। ७७ कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनं। यक्षराक्षसभूतानां चोरव्याघ्रभयापहं ॥७८॥ इस गुरुगीता के पाठ से अकाल मृत्यु का भय, सारे संकट समाप्त हो जाते हैं यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, चोर, हिंसक पशुओं का भय भी समाप्त हो जाता है अर्थात कोई बाधा नहीं होती। ७८ महाव्याधिहरं चैवं विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेव जपेत्सदा ॥७९॥ यहाँ तक कि महाव्याधि की बाधा भी दूर हो जाती है सारी विभूतियां ( 39 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सिद्धि को प्राप्त होती हैं इस गुरुगीता के जप के प्रभाव से सबको अपने वश मे किया जाता है। ७९ कुशैर्वा दूर्वया देवि आसने शुभ्रकंबले। उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ॥८०॥ सूतजी महर्षियों से कहते हैं कि शिवजी पार्वती से कहे कि देवि ! कुशा और दूर्ब के आसन पर बैठकर जो भक्तिभाव के साथ श्रद्धा युक्त होकर भजता है, उसको सब कुछ प्राप्त होता है। ८०

शुक्लासने वैः शान्त्यर्थं वश्ये रक्तासनं प्रिये। अभिचारे कृष्णवर्णं पीतवर्णं धनागमे ॥८१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो इस गुरुगीता का पाठ जो शुक्लासन पर बैठ कर करता है उसे शान्ति मिलती है, रक्तासन पर बैठकर जो करता है उसे सारा संसार पूजता है, अर्थात सब उसी के वश में हो जाते हैं कृष्णासन से अभिचार, पीतासन से धनागम की प्राप्ति होती है। ८१

उत्तरे शांतिजाप्यं स्यात् वश्ये पूर्व मुखोदितं। दक्षिणे मारणं प्रोक्तं स्तंभने पश्चिम मुखं ॥८२॥ अब कहने का भाव ये है कि शांति की प्राप्ति के लिये शुक्लासन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, सबको अपने अनुकूल करने के लिये रक्तासन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, शत्रु को मारने के लिये दक्षिण की ओर मुख करके, और स्तम्भन प्रधान के लिये पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए, ऐसा कहा गया है। ८२

( 40 )

मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवि भूयः प्रियकरं राजानं वश्यमानयेत् ॥८३॥ हे महर्षियों ! हे गिरिनन्दिनि ! सुनो ये गुरुगीता का पाठ प्रत्येक जीव को विमोहित करके पाठकर्ता के अनुकूल करता है और इतना ही नहीं यह मोक्ष की प्राप्ति भी करा देता है और राजाओं को भी वशीभूत कर देता है इसलिए श्रद्धायुक्त होकर पाठ करना चाहिए। ८३ मुखस्तंभकरं नृणां गुणानांच विवर्धनं। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्म सिद्धिदं भवेत् ॥८४॥ इस गुरुगीता के पाठ के प्रभाव से कर्ता के मुख पर दिव्यतेज प्राप्त होता है गुणों की वृद्धि होती है, सारे दुष्कर्म नष्ट हो जाते हैं और सत्कर्म पथ पर जीव दौड़ पड़ता है। ८४ सर्व शांतिकरं नित्यं वंध्यापुत्र फलप्रदं। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परं ॥८५॥ यह दिव्य गीता पाठ हर तरह की सुख शान्ति प्रदान करता है यहाँ तक कि बन्ध्या स्त्री को पुत्रवती करता है, और स्त्रियां अगर पाठ करती हैं कभी विधवा नहीं होती। ८५ आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रपौत्रविवर्धनं। निष्कामस्तु त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात् ॥८६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो इस गुरुगीता पाठ से जीवात्मा अपने जीवन (41)

में अखण्ड आयु, आरोग्यता, ऐश्वर्य तो प्राप्त करता है साथ ही उसका कुल, उसका परिवार, पुत्र, पौत्र, धन धान्य से पूर्ण होता है और साथ ही मोक्ष की प्राप्ति करता है। ८६ अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि। सर्वदुःखभयं विघ्नं नाशयेत तापहारकं ॥८७॥ महिमा का विशद वर्णन क्रम में अब सूतजी कहते हैं कि इस गीतापाठ से सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है, कार्य में कोई रूकावट नहीं आती है और मानो कि दूसरा जन्म मिलता भी है तो जीवन में कोई दुख नहीं होता, तीनों तापों का निवारण हो चुका रहता है। ८७ सर्वबाधाप्रशमनं धर्मार्थकाममोक्षदं। यं यं चिंतयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितं ॥८८॥ यह गुरुगीता पाठ जो करता है उसकी सारी बाधा दूर हो जाती है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ की सहजता मे प्राप्ति होती है और वह जिस जिस क्षेत्र में बढ़ता है उसे पाठ के प्रभाव से सफलता प्राप्त होती है इसलिए गुरुगीता से अधिक कुछ भी नहीं है। ८८ कामधेनुः कामितस्य कल्पितस्य च कल्पदः। चिन्तामणिश्चिंतितस्य सर्वमंगलकारकं ॥८९॥ सूतजी कहते हैं कि कामधेनुः कामना पूर्ण करती है, कल्पवृक्ष स्वर्ग सम्पत्ति देता है, चिंतामणि हर प्रकार की बाधा चिन्ता दूर करता हुआ हर प्रकार का मंगल शुभ फल प्रदान करता है। ८९ ( 42 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

३. तृतीय अध्याय: कुण्डलिनी-जागरण, मोक्ष-साधन, गुरु-सेवा एवं फलश्रुति

जाप्यं शाक्तैश्च सौरैश्च गाणपत्यैश्च वैष्णवैः। शैवस्य सिद्धिदं देवि सत्यं न संशयः ॥९०॥ सूतजी कहते हैं जो व्यक्ति की उपासना करते हैं वो शौर्य की प्राप्ति करते हैं, जो गणेश की आराधना करते हैं उन्हें विष्णु की प्राप्ति होती है किन्तु जो शिव स्वरूप गुरु की पूजा, वन्दना, स्तवन करते है उनको सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ९० संसारमूलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये । गुरुगीता भवेत् स्नानं तत्वज्ञः कुरुते सदा ॥९१॥ इसलिए जो वास्तव में अपने को तत्वज्ञानी समझने वाले बुद्धिशील प्राणी हो, उनको हमेशा संसार की समस्त बाधाओं से निवृत्ति के लिये संसार की माया बन्धन स्थिति से मुक्ति पाने की इच्छा से प्रतिदिन स्नान, ध्यान, गुरुदेव का पूजन करके यह गीता पाठ करना चाहिए। ९१ शयनस्थो ह्वासनस्थो वा गच्छंस्तिष्ठंस्तथापि वा । अश्वारूढो गंजारूढ़ः सुप्तो वा जागृतोऽपि वा ॥९२॥ इसलिए महर्षियो ये जो दिव्य गीता पाठ है, इसका पाठ उठते, बैठते, सोते, जागते, अश्वारुढ़, गजारूढ़, चलते, बैठते, आठों याम यही पाठ करना चाहिए। ९२ शुचिमान्यः सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु । तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥९३॥ सूतजी कहते हैं जो जीवात्मा गुरु गीता पाठ के सहारे शिव स्वरूप समर्थ सर्वत्र गुरु की दीक्षा से दीक्षित जो नित्य पाठ करने वाला सन्यासी ( 43 )

वीतरागी संत है अगर उसका दर्शन मात्र साधारण लोग पा जाते हैं तो वो आवागमन से मुक्त हो जाते हैं ऐसा गुरु गीता का प्रभाव हैं। ९३ समुद्रस्य यथा तोयं क्षीरं क्षीरे जलं जले । भिन्ने कुंभे यथाकाशस्तथात्मा परमात्मनि ॥९४॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियो जैसे समुद्र मे भी जल होता है अन्य सरोवर मे भी जल होता है, घड़े मे भी जल होता है, तो जैसे पात्र बदल रहे हैं (समुद्र, तालाब, सरोवर, घड़ा) किन्तु जल वही रहता है ठीक ऐसे ही गाय, भैंस, बकरी, कुत्ता बिल्ली मनुष्य हाथी पर्वत पठार नही सबसे शिव स्वरूप गुरु की ही सत्ता होती है बस जीव का स्वरूप अलग दिखता है रहता सबमें वही है। ९४ तथैव ज्ञानी जीवात्मा परब्रह्मणि लीयते । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशि ॥९५॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों साधारण जीवत्मा ये मानती है कि हम अलग हैं ब्रह्म अलग है ऐसा वास्तव मे सही नही है जो ज्ञानी है वह सर्वत्र उसी तत्व को निहारता हुआ दिन रात संसार में भ्रमण करता है उसे कोई परेशानी नहीं होती है। अतः यह गीता पाठ तत्व बोध कराने का सहज सरल साधन है। ९५ एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्तते स्वयं । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्तिभावं करोति यः ॥९६॥ इसलिए हे ऋषियों जो भी पूर्ण श्रद्धा, भक्ति विश्वास के साथ इसका पाठ करता है वह संशयहीन, बन्धनहीन होके सर्वदा विचरण करता है और सारा सुख प्राप्त करता है, इसलिए गुरुगीता के सहारे ही जीना चाहिए। ९६ ( 44 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

भुक्तिमुक्तिप्रदस्तेषां जिह्वाग्रे च सरस्वती । अनेन प्राणिनः सर्वे गुरुगीताजपेन च ॥९७॥ अब कहते हैं कि ऋषियों पाठ का अनुपम प्रभाव यह है कि कर्ता को भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है उसकी जिह्वा पर सरस्वती विद्यमान हो कर उसकी वाणी को अलंकृत करती है और कहाँ तक महिमा गाऊँ बहुत लोग भोग मोक्ष की प्राप्ति लाभ गीता पाठ के सहारे प्राप्त किए हैं। ९७ सर्वसिद्धिं प्राप्नुवन्ति भुक्तिमुक्ति न संशयः । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्मो मयोदितः ॥९८॥ भोलेनाथ कहते हैं हे देवि अपने-अपने धर्म आचरण के अनुसार जो भी गुरुगीता का पाठ करता है वह सर्वसिद्धि प्राप्त करता है। भोग मोक्ष की प्राप्ति करता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। ९८ गुरुगीता समं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने । गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरुर्निष्ठा परं तपः ॥९९॥ इसलिए महर्षियो मैं सत्य कहता हूँ सत्य कहता हूँ गुरुगीता की तुलना में कुछ और नहीं गुरुदेव ही साक्षात ईश्वर है, गुरुदेव ही धर्म है, गुरु में निष्ठा, समर्पण का भाव ही सबसे बड़ा तप है। ९९ गुरोः परतरं नास्ति नास्ति तत्वं गुरोः परं । धन्या माता पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा ॥१००॥ (45)

सूतजी कहते हैं महर्षियो और क्या कहें गुरुदेव के अतिरिक्त कोई और नहीं, गुरुदेव के अलावा कोई दूसरा तत्व नहीं, वही तत्व भी हैं और जो जीवात्मा अपना समर्पण गुरु में करता है, उसके माता पिता, कुल तीनों पवित्र और धन्य-धन्य हो जाते हैं। १०० धन्या च वसुधा देवि गुरुभक्तिः सुदुर्लभा । गुरुपुत्रो वरं मूर्खो तस्य सिध्यंति नान्यथा ॥१०१॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो शिवजी कहते हैं हे भवानी ! धरती का वह भूखण्ड धन्य हो जाता है जहाँ गुरुदेव की भक्ति की जाती है और इसी भक्ति भाव के सहारे कृपा की प्राप्ति कर मूर्ख भी विद्वान हो जाता है। १०१ शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षापि सिद्धिदा भवेत् । आकल्पजन्मनां कोट्या जपहोमतपः क्रियाः ॥१०२॥ सूतजी कहते हैं कि शौनकादि ऋषियों ! गुरु से दीक्षित हो जाने के बाद सारे शुभ कर्मों की सिद्धि हो जाती हैं, करोड़ो जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं भाव उनके बताए जप, तप और होम इत्यादि पूजन के सहारे ऐसे गुरु की महिमा है। १०२ तत्सर्वं सफलं देवि गुरुसंतोषकारकं ॥१०३॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु की महिमा का वर्णन करने के क्रम में अब साफ-साफ शिवजी कह रहे हैं कि हे पार्वती ! ये जो कुछ हम फल की प्राप्ति जीवन में बताए ये सब गुरु को प्रसन्न करने पर ही प्राप्त होते हैं अतः सर्व प्रयत्नेन (हर प्रकार) गुरु को खुश रखना चाहिए। १०३ ( 46 )

ब्रह्माविष्णुमहेशादिदेवर्षिपितृकिन्नराः । सिद्धचारणयक्षाश्च ऋषयो मुनयो जनाः ॥१०४॥ गुरुसेवाः परं तीर्थमन्यत्तीर्थं निरर्थकं। सर्वतीर्थाश्च ये देवि सद्गुरोश्चरणाम्बुजं ॥१०५॥ सूतजी कहते हैं महर्षियो - ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, पितृगण, किन्नर, सिद्ध चारण, यक्ष, ऋषिगण, मुनिजन ये सब चाहे जिस पवित्र तीर्थ स्थल पर जा कर तपस्या कर लें, तब तक कोई फल की प्राप्ति इन्हें नहीं मिल सकती जब तक गुरुदेव के कमलवत चरण की सेवा करके उनकी आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक उनका किया जप, तप सब व्यर्थ होता है। अतः श्री गुरु के चरण मे ही रहना चाहिए। १०४ १०५ शरीरमिन्द्रियं प्राणाश्चार्थः स्वजनबान्धवाः। माता पिता कुलं देविं गुरुरेव न संशयः ॥१०६॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - चाहिए यह कि शरीर की इन्द्रियों को वश में करके अपने स्वजनों (माता, पिता, भाई, बहन) के साथ गुरु के श्री चरणों का ही ध्यान करना चाहिए। १०६ विद्यातपोबलेनैव मंदभाग्याश्च ये नराः। गुरुसेवां न कुर्वन्ति सत्यं सत्यं वरानने ॥१०७॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों जो जीवात्मा (विद्या, तप, बल) से हीन मंदबुद्धि का है, सत्य कहता हूँ वह गुरु की सेवा न करने के कारण से ऐसा हो इसलिए कहा गया है कि "गुरु बिना ज्ञानं न भवति" १०७ (४७)

जपेन फलमाप्नोति चानंतं फलमाप्नुयात्। हीनकर्म त्यजन्सर्वं स्थानानि चाधमानि च ॥१०८॥ जो जीवात्मा गुरुगीता का पाठ करके जप करता है उसी जीवात्मा को गुरु की कृपा से एक पाठ, एक माला जप का एक हजार गुना फल प्राप्त होता है। १०८ उग्रध्यानं कुक्कुटस्थं हीनकर्म फलप्रदं। गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे ॥१०९॥ सूतजी कहते हैं कि हे ऋषिगणों - जो अष्टांग योग के सहारे (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) पूरे भाव मे डूब कर विकलता, व्याकुलता की पराकाष्ठा पर पहुँचकर गुरुगीता का पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है, समर भूमि में विजय प्राप्त करता है। १०९ जपते जयमाप्नोति मरणे मुक्तिदायकं। सर्वकर्म च सर्वत्र गुरुपुत्रस्य सिद्ध्यति ॥११०॥ सूतजी कहते हैं कि जीवात्मा जैसे ही गीता पाठ के सहारे अपनों को समर्पित करके गुरुमन्त्र का जप करता है, विजय को प्राप्त करता है, मरते समय जप के प्रभाव से मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति करता है, और क्या कहें जैसे गुरु पुत्र के सारे कार्य सम्पन्न होते हैं ऐसे जीवात्मा को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। ११० ( 48 )

इदं रहस्यं नो वाच्यं तवाग्रे कथितं मया। सुगोप्यं च प्रयत्नेन येनात्मत्वं प्रयास्यसि ॥१११॥ स्वामिमुख्यगणेशादिवैष्णवानां च पार्वति। मनसापि न वक्तव्यं मम सान्निध्यकारकं ॥११२॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - शिव जगदम्बा.पार्वती को ये पावन चरित्र सुनाते हुए कह रहे हैं कि हे देवि ! आज से पूर्व कभी किसी को हमने ये गुप्त रहस्य नहीं बताया था। यहाँ तक कि जितने भी देवता हैं, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यक्ष, कुबेर, ऋषिगण, तपस्वी, मनस्वी गणेश इत्यादि हैं सब मेरी ही शरणागत होकर सर्वसिद्धि फल की प्राप्ति करते हैं। १११ ११२ अभक्तो वंचको धूर्तः पाखंडी नास्तिको नरः। मनसापि न वक्तव्या गुरुगीतां. कदाचन ॥११३॥ सूतजी का अब कहना है कि हे शौनक ! इस चराचर जगत में जो जीवात्मा भक्तिहीन, ठगधर, धूर्त, पाखण्डी, नास्तिक है, समझो निःसन्देह उसने एक भी क्षण मन से वाणी से न तो गुरुदेव का ध्यान किया है और न ही गुणगान किया है। ११३ अतीवपक्वचित्ताय श्रद्धाभक्तियुताय च। प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मासि सदाप्रिये ॥११४॥ अतः महर्षियों गुरुदेव की चरण-शरण में ही रहना श्रेयस्कर है और जो श्रद्धा भक्ति से मुक्त हो कर गुरुगीता के सहारे सिद्धान्तों पर जीता है, वह भूतभावन भोलेनाथ को प्राप्त होता है। ११४ ( 49 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri संसारसागरसमुत्तरणैकमंत्रं ब्रह्मादिदेवमुनिपूजित सिद्धमंत्रम्। दारिद्र्यदुःखभयशोकविनाशमंत्रं वंदे महाभयहरं गुरुराजमंत्रम् ॥११५॥ अतः अंतिम स्थिति में सूतजी आह्लादित होकर नैमिषारण्य की धरती पर विराजमान ८८००० ऋषियों को समझाते हैं कि महर्षियो - संसार सागर से पार पाने का सहज साधन बस यही है कि "ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, इन्द्र, मुनिजन, ऋषिगण, इत्यादि के द्वारा जो पूजित गुरुराज यन्त्र है इसी को श्रद्धान्वित होकर जपता हुआ, जीवन के दारिद्र, दुःख को समाप्त कर सुख प्राप्त करे और इस भव सागर से मुक्त हो जाय। अंतः हम उन गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करते हैं जिनका सानिध्य मात्र ही संसार का भय दूर करता है। ११५ इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे ईश्वरपार्वतीसंवादे श्रीगुरुगीता समाप्ता॥ ॥ श्रीगुरवे नमः । श्रीगुरवे नमः । श्रीगुरवे नमः॥ ऐसा स्कन्द पुराण में गुरुगीता का निरुपण भोलेनाथ पार्वती के संवाद रूप में निरुपित किया गया है। ( 50 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

॥ गुरुस्तवराजः ॥ ॥ गुंगुरुभ्यो नमः ॥ श्री गणेशाय नमः। ॥ श्री गुरुस्तवराजः प्रारभ्यते सर्वाऽभीष्टसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः॥ शरदचंद्र के समान श्वेत कमल जैसे नेत्र किंचित मुस्कराते हुये, शरद के पूर्ण चन्द्रमा के समान उद्दीत्यमान मुख, दिव्य विशाल नेत्र, श्वेत वस्त्र, चंदन को धारण किये हुए, अरूण आभा, वामांग में स्वप्रकाशित मनोहर शक्ति को बिठाए हुए, बर अभय मुद्रा धारण किये, समस्त सुलक्षणों सहित ऐसे सद्गुरु को अपने सिर में सहस्रदल कमल के मध्य ध्यान करें। ब्रह्मस्थानसरोजमध्यविलसच्छीतांशु पीठस्थितम्॥ स्फूर्जत्सूर्यरुचिं वराभयकरं कर्पूरकुन्दोज्ज्वलम्॥ श्वेतस्रग्वसनानूलेपनयुतं विद्युद्रुचा कान्तया॥ संश्लिष्टार्द्धतनुं प्रसन्नवदनं वन्दे गुरुं सादरम्॥१॥ सहस्रदल कमल में स्थित चंद्रपीठ में बैठे हुए जाज्वल्य सूर्य के समान प्रकाशित वर अभय मुद्रा धारण किये हुए, कर्पूर कुन्द के समान आभा, श्वेत पुष्प माला धारण श्वेत वस्त्र और चन्दन लेपन-बिजली के समान कांति वाली मातृ शक्ति के साथ सद्गुरु की आदर सहित वन्दना करता हूँ॥१॥ मोहध्वान्तमदान्धताग्रहवतां चक्षूंषिचोन्मीलयन्॥ यश्चक्ररुचिराणि तानि दयया ज्ञानाञ्जनाभ्यञ्जनैः॥ व्याप्तं यन्महसा जगत्त्रयमिदं तत्त्वबोधोदये॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥२॥ ( 51 )

मद मोहरूप अंधकार से ग्रसित मनुष्यों के नेत्रों को अपनी इच्छा से दया करके ज्ञान अंजन से खोलकर जिसने दिव्य अन्तर्चक्षु देकर रुचिर बना दिया है उनकी तेजोमयी कान्ति प्रभा तीनों लोक (तल, अतल, तलातल) में व्याप्त हो रही है। तत्त्व का ज्ञान बोध कराने वाले, समस्त सिद्धियों के प्रदाता शिव स्वरूप अपने सद्गुरू की वंदना करता हूँ॥२॥ मातंगी भुवनेश्वरी च बगला धूमावती भैरवी॥ तारा छिन्नशिरोधरा भगवती श्यामा रमा सुन्दरी॥ दातुं न प्रभवन्ति वाञ्छितफलं यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थ सिद्धिप्रदम्॥३॥ मातंगी, भुवनेश्वरी, बगला, धूमावती, भैरवी, तारा, छिन्नमस्ता, भगवती काली, लक्ष्मी त्रिभुवन सुन्दरी, जिस गुरु के प्रसन्न हुये बिना इच्छित फल नहीं दे सकती ऐसे शिव स्वरूप सर्व सिद्धि प्रदायक अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥३॥ काशीद्वारवती प्रयाग मथुरा-ऽयोध्या गयाऽवन्तिका॥ माया पुष्कर-काञ्चिकोत्कलगिरिः श्री शैलविन्ध्यादयः॥ नैते तारयितुं भवन्ति कुशला यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥४॥ काशी, द्वारवती, प्रयाग, मथुरा, अयोध्या, गया, अवंतिका (उज्जैन), माया, पुष्कर, कांची (शिव कांची) उत्कृष्ट उड़ीसा श्रीशैल विंध्याचल ये सभी शिव समान गुरु की कृपा के बिना तरन तारण करने में समर्थ ( 52 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

नहीं है। ऐसे शिव स्वरूप सद्गुरु सर्व सिद्धि देने वाले अपने गुरु की वंदना करता हूँ॥४॥ रेवासिन्धुसरस्वती त्रिपथगाः सूर्यात्मजा कौशिकी॥ गङ्गासागरसङ्गमोऽद्रितनया लौहित्यशोणादयः॥ नालं प्रोक्तफलप्रदानविषये यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥५॥ रेवा, सिन्धु, सरस्वती, गंगा-जमुना, कौशिकी, गंगासागर, संगमोदितनया (लोहित्य) शोणभद्रादिक ये सभी जिनकी कृपा के बिना इच्छित फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं। ऐसे शिव-स्वरूप समस्त सिद्धियों के प्रदाता अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥५॥ सत्कीर्ति विमलं यशः सुकविता पाण्डित्यमारोग्यता॥ वादे वाक्पटुता कुले चतुरता गाम्भीर्यमक्षोभ्यता॥ प्रागल्भ्यं प्रभुता गुणे निपुणता यस्य प्रसादाद् भवेत्॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिपदम्॥६॥ सुन्दर कीर्ति, विमल यश, अच्छी कविता, विद्वता, निरोगता, शास्त्रार्थ में निपुणता, कुल में चतुरता, समर्थता धैर्यशीलता, गम्भीरता, तेजस्विता ऐश्वर्यवान, गुणों में निपुणता ये समस्त गुण उन गुरुवर की करुण कृपा से ही परिपूर्णता पाते हैं जो समस्त सिद्धियों को देने वाले हैं ऐसे शिव स्वरूप अपने सद्गुरु की वंदना करता हूँ॥६॥ लोकेशो हरिरम्बिका स्मरहरो मातापिताऽभ्यागता॥ आचार्य्यः कुलपूजितो यतिवरो वृद्धस्तथा भिक्षुकः॥ ( 53 )

नैते यस्य तुलां व्रजन्ति कलया कारुण्यवारांनिधेः॥ स्तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥७॥ इंद्रादिक, विष्णुदेव, महादेव, अम्बिका माता-पिता, अतिथि, अभ्यागत, आचार्य कुलगुरु, श्रेष्ठ यतीजती, विद्या वृन्द, तपोनिष्ठ भिक्षुक इन सबकी कलायें, उन सद्गुरु करुणा सागर की अनुग्रहीत किंचित कृपा की तुलना में नगण्य हैं। ऐसे शिव स्वरूप समर्थ सद्गुरु समस्त सिद्धियों के प्रदाता की वन्दना करता हूँ॥७॥ ध्यानं दैवतपूजनं गुरुतपोदानाग्निहोत्रादयः॥ पाठो होमनिषेवणं पितृमखाह्याभ्यागतार्च्चा वलिः॥ एते व्यर्थफलां भवन्ति सततं यस्य प्रसादं विना॥ तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥८॥ ध्यान, देव पूजन, महान तप, दान, श्राद्ध, हवन आदिक कर्म व्रतोपवास पाठ अभ्यागत अतिथि का विधिवत पूजागत सत्कर्म जिनकी कृपा के बिना सुफलदायी नहीं होते ऐसे शिव स्वरूप अपने समर्थ सद्गुरु की मैं वन्दना करता हूँ॥८॥ पूर्वाशाभिमुखः कृताञ्जलिपुटः श्लोकाष्टकं यः पठेत्॥ पौरश्चर्यविधिं विनाऽपि लभते मन्त्रस्य सिद्धि पराम्॥ नो विघ्नैः परिभूयते प्रतिदिनं प्राप्नोति पूजाफलम्॥ देहान्ते परमं पदं निविशते यद्योगिनां दुर्लभम्॥९॥ पूर्व दिशा की ओर आमुख होकर प्रातः काल विनम्र श्रद्धावनत होकर युगल कर-वंदना से भाव विभोर होते हुए उपरोक्त आठों पदों (श्लोकों ( 54 )