भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकः न गुरोरधिकः। शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥५५॥ इसलिए हे महर्षियों - गुरुदेव से बढ़कर कोई नहीं गुरुदेव के अतिरिक्त किसी को जानते हीं नही क्यों उनसे बढ़कर कोई दूसरा नहीं इसलिए शिव स्वरूप गुरु के श्री चरण में मैं प्रणाम करता हूं। ५५ एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिंदां करोति यः। स याति नरकं घोरं यावच्चंद्रदिवाकरौ ॥५६॥ सूतजी कहतें हैं कि भगवान भोलेनाथ से ये अनुपम रहस्य जानने के पश्चात माता पार्वती कहती हैं कि जो गुरुदेव की निन्दा करता है, वह घोर नरक की अधोगति प्राप्त करता है। ५६ यो वै हुंकृत्य हुंकृत्य गुरुं निर्जित्य वादतः। अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥५७॥ इस प्रकार मईया कहती है कि जो गुरु की आज्ञा का पालन न करके वाद-विवाद कुतर्क करता है वह जंगल में निर्जल प्रदेश में ब्रह्मराक्षस रूप धारण करता है। ५७ मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैर्वा शापितो यदि। कालमृत्युभयाद्वापि गुरु रक्षति पार्वती ॥५८॥ सूतजी कहते हैं महर्षियों भगवान शिव कहते हैं कि प्रिये मुनिजन, पन्नग, देवता किसी को श्रापित भी किए हों तो वह (जीवात्मा) काल के मुख ( ३३ ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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