भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३५॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - जिन श्री सद्गुरुदेव के ज्ञान रूपी अंजन के सहारे संसारी लोग अपने हृदय के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा देते हैं तो ये अनुपम स्थिति में जिनके दिव्य ज्ञान अंजन को शलाका के सहारे आँख में लगाते ही संसार के दोष समाप्त हो जाते हैं ऐसे सर्वशक्तिमान गुरुदेव के श्री चरणों मे मेरा प्रणाम है। ३५ अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३६॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ये जो चराचर जगत जड़ और चैतन्य से व्याप्त दिख रहा है यह सब कुछ (जड़, चेतन) रूप मे साक्षात गुरुदेव ही हैं और जिनकी कृपा होते ही ये जीवत्मा संसार न देखकर प्रत्यक्ष गुरुरूप का दर्शन करने लगती है ऐसे श्री गुरु के चरणों मे प्रणाम करता हूं। ३६ सर्वश्रुतिशिरोरत्नं विराजितपदांबुजं । वेदांतांबुजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३७॥ अब सूतजी समझाते हैं कि ऋषियों - श्रुतियां कहती हैं कि गुरुदेव सारे रत्नों से सुशोभित हैं वही वेद, जल और सूर्य रूप में भी है उनके कमलवत चरण मे मेरा प्रणाम है। ३७ ( 27 )