श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपने आत्म कल्याण के लिये, पत्नी इत्यादि की सुदृढ़ वैभवपूर्ण स्थिति के लिये गुरुदेव से ही प्रार्थना करनी चाहिये, क्योंकि ये सब उन्हीं से सम्भव है। ३१ संसारवृक्षमारूढाः पतन्तो नरकार्णवे । येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३२॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों हम उन गुरुदेव के चरण-कमल में प्रणाम करते हैं जो संसार रूपी वृक्ष पर आरूढ़ समस्त जीवात्माओं को नरकगामी होने से बचाते हुए आत्मस्वरूप का बोध कराते हुए मोक्ष की स्थिति प्रदान करते हैं। ३२ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुदेवो महेश्वरः । गुरुरेकं परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३३॥ इसलिए महर्षियों और क्या कहें, साक्षात गुरुदेव ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, गुरु ही साक्षात परमब्रह्म हैं उनके अतिरिक्त कहीं कुछ भी और नहीं, उनके श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ३३ हेतवे जगतामेव, संसारार्णव सेतवे । प्रभवे सर्वविद्यानां शंभवे गुरवे नमः ॥३४॥ इस प्रकार गुरुदेव की महिमा का विस्तारित वर्णन शुरु करते हैं और बताते हैं कि महर्षियों गुरुदेव ही संसार को प्रकटित करने के लिये स्रोत हैं और वही संसार सागर से पार पाने के लिए सभी के लिए पुल रूप होकर मुक्त भी करते हैं और वही समस्त विद्याओं के स्वामी हैं ऐसे शिव- स्वरूप गुरुदेव के दिव्य श्रीचरण में मेरा कोटि कोटि प्रणाम। ३४ ( 26 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal