भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 82 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

एवं तेषां च सर्वेषां नास्ति तत्वं गुरोः परं । आसनं शयनं वस्त्रं वाहनं भूषणादिकं ॥२८॥ इसलिए हे शौनकादि ऋषियों गुरु से बढ़ कर इस त्रैलोक्य मे कोई दूसरा तत्व नहीं है, इसलिए चाहिए कि संसारी लोग, आसन, शयनसेज, वस्त्र, आभूषण, गो, इत्यादि गुरुदेव को दान करते हुए अपने आप को उनकी कृपा छांव से जोड़ कर रखें। २८ साधकेन प्रदातव्यं गुरुसंतोषकारकं । गुरोराराधनं कार्यं जीवितं वै निवेदयेत् ॥२९॥ हे महर्षियों - साधक को चाहिए कि गुरुदेव को संतुष्ट करने के लिये हर सम्भव प्रयास करे और उन्ही के नाम स्मरण के सहारे अपना कोई भी छोटा बड़ा कार्य करना शुरु करे, उनकी (सद्गुरुदेव) कृपा से कोई बाधा नहीं होगी। २९ कर्मणा मनसा वाचा नित्यमाराधयेद्गुरुं । दीर्घदंडं नमस्कृत्य निर्लज्जो गुरुसन्निधौ ॥३०॥ इसलिए इस जीवत्मा को मन से, कर्म से, वाणी से हमेशा गुरुदेव के चरणों में प्रेमभाव होना चाहिये और उन्हीं के सानिध्य मे जीना चाहिये। ३० शरीरार्थं च संप्राप्तं पशुपुत्रगृहाणि च । आत्मदारादिकं चैव सद्गुरुं वै निवेदयेत् ॥३१॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिये, सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये, पशु, पुत्र, परिवारजन के कल्याण के लिये, ( 25 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal