भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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सूतजी कहते हैं कि चाहे जितना गुणवान वक्ता हो (मनुष्य, देव) वो ये वाकपटुता, गुरु के पास से तभी ग्रहण कर सकता है जब उसमें भक्ति का भाव हो, अतः गुरु के प्रति स्नेहभाव रखना चाहिए। २४ गुकारस्त्वंधकारःस्यादरुकारस्तं निरासकृत्। अंधःकारविनाशत्वादुहुरित्यभिधीयते ॥२५॥ कहने का भाव यह है कि हे ऋषियों, गुरुनाम के उच्चारण मात्र से ही जीवात्मा के सारे अज्ञान समाप्त हो जाते हैं इसीलिए गुरु से बड़ा कोई और नहीं। २५ गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारो द्वितीयं ब्रह्म मायाभ्रांतिविमोचकं ॥२६॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु, दो वर्णों के मेल से बना हुआ शब्द है और इसका जो पहला शब्द गु-कार है, यह संसार की माया को पूरी तरह से व्यक्त करता है, और रु-कार इस माया के प्रभाव को नष्ट करता है, और इसी शब्द के उच्चारण भाव से ही जीव माया से मुक्त हो जाता है। २६ एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभं । हाहाहूहूगणैश्चैव गंधर्वाद्यैश्च पूज्यते ॥२७॥ इस तरीके गुरु शब्द की महिमा का उल्लेख करते हुए सूतजी ने कहा कि ऋषियों, गुरुदेव भगवान के पद से बढ़कर कोई दूसरा पद नहीं है, यह पद देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, और आज भी हा हा हू हू गन्धर्व अपने समस्त गुण के सहित गुरु की पूजा करते हैं जो कि गन्धर्वराज हैं। २७ ( 24 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal