भारतकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

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गुरुवक्त्रंस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं कुलस्त्री स्वपतेर्यथा ॥२१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव के बताए सिद्धान्तों पर चलने से जीवात्मा ब्रह्म मे स्थित होकर जीने लगता है, इसलिए पतिव्रता को भी चाहिए कि जैसे पति मे डूबी रहती है, ऐसे ही गुरु के प्रति भी आदर भाव रखे। २१ स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्तिपुष्टिवर्धनं । अन्यत्सर्वं परित्यज्य गुरोरन्यं न भावयेत् ॥२२॥ इसलिए सूतजी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि हे महर्षियों बिना गुरु की कृपा के कोई भी अपने आश्रम को पवित्र नहीं कर सकता, न ही अपनी जाति को सम्मानित कर सकता है और न ही अपने कुल की कीर्ति बढ़ा सकता है इसलिए गुरुदेव के चरण-कमल मे दण्डवत रहना चाहिए। २२ अनन्याश्चिंतयंतो मां सुलभं परमं पदम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ॥२३॥ इसलिए अनन्य भाव से इसी को सर्वथा सरल सहज शाश्वत साधन स्वीकारते हुए सभी को गुरुदेव के ध्यान में डूबकर अपने को संसार के दुष्प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए। २३ गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते । त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्याः सुरपन्नगाः ॥२४॥ ( 23 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal