श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाशीक्षेत्र निवासोऽसौ जाह्नवीचरणोदकं । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारको ब्रह्म निश्चितं ॥१८॥ अब सूतजी कहते हैं कि हे महर्षियों, गुरुदेव की कृपा महिमा के बखान क्रम में भोलेनाथ पार्वती से कहते हैं कि हे प्रिये वाराणसी नगरी में निवास कर रहे जो भक्तजन हैं, गंगा में स्नान करके जलपान करके साक्षात गुरुदेव के ही धाम को प्राप्त होते हैं। १८
गुरोः पादांकितं भूत्वा गयास्ते सोक्षयो वटः । तीर्थराजः प्रयागस्तु गुरुमूर्ते नमोनमः ॥१९॥ इसलिए महर्षियो - गुरुदेव के चरणों को अंकितरूप समझकर गया धाम में विराजमान अक्षयवट को और तीर्थराज प्रयाग को गुरुमूर्तिमय मानकर हम प्रणाम करते हैं। १९
गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् । गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत् ॥२०॥ इसलिए गुरुदेव की छवि का ध्यान प्रति क्षण करना चाहिए और शंकर रूपी गुरु का नाम जप करते रहना चाहिए, बिना गुरु की आज्ञा के कुछ भी नहीं करना चाहिए, जो गुरुदेव की भावना के अनुसार हो, वही कर्म करना चाहिए। २०
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