श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसां । गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकं ॥१५॥ पूज्य गुरुदेव जी के श्रीचरण का प्रक्षालन जल पीकर ये जीवात्मा इस संसार सागर से पार हो जाता है और उसके सारे पाप समाप्त हो जाते हैं और साथ ही साथ एक दिव्य ज्ञान ज्योति प्रकाशित हो जाती है जिसके कारण सहजता में मुक्त हो जाता है। १५ अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणं । ज्ञानवैराग्यसिद्धयर्थं गुरुपादोदकं पिबेत् ॥१६॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो - गुरुदेव के पाँव प्रक्षालन जल के सहारे इस जीवात्मा के सारे बन्धन जड़ से मिट जाते हैं जन्म कर्म का बन्धन समाप्त हो जाता है और साथ ही साथ ज्ञान वैराग्य जीवन में जागृत हो जाता है। १६ गुरुपदोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनं । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुस्तोत्रं सदा जपेत् ॥१७॥ इसलिये हे ऋषिगणों - गुरुदेव के प्रक्षालित चरण जल का पान करना चाहिये, मिल सके, सम्भव हो तो जूठा भोजन भी प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए और सदैव उन्हीं के ध्यान में डूबकर इस जीवात्मा को अपना कल्याण कर लेना चाहिए। १७