श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान
Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan
राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा
स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 16, कुल 32 में से
संदर्भ में पढ़ेंघर वापस आते हैं तो दशरथ बहुत परेशान हो जाते हैं कि बिना बिताये इस तरह से विवाह हुआ है, तो राम कहते हैं “कि जो भी हुआ है ईश्वर की इच्छा से हुआ है, इसमें ना आपकी चलेगी, ना मेरी चलेगी”।
फिर कुछ दिन पश्चात वो घटना घटित होती है, कि कैकयी दशरथ से कहती है, कि अब मुझे वर माँगने दो, अब समय आ गया है, कि मेरा पुत्र गद्दी का अधिकारी बनें, ये मेरी अभीष्ट इच्छा है, अब आप राम को वन भेजो और मेरे भरत को गद्दी दिलाओ, दशरथ परेशान हो जाते हैं। लेकिन राम को जब पता चलता है तो वे सहज स्वीकार करते हैं और फिर दशरथ से कहते हैं कि इसमें ईश्वर की ही कोई इच्छा है, माने हर बार राम जी ईश्वर के प्रति भक्ति ऐसे दिखाते हैं।
आस्थावान व्यक्ति कैसा होता है, जो हर परिस्थिति में ईश्वर की इच्छा देखता है। लक्ष्मण को बहुत गलत लगता है, लक्ष्मण विद्रोह करने के लिए तैयार है।
लक्ष्मण – “ऐसे कैसे हो सकता है? ये आपका अधिकार है, आप बड़े हैं, गद्दी पर आपको ही बैठना है, राज्य आपको ही चलाना है, नीतियां आपको आती हैं, न्याय अन्याय आप जानते हैं, भरत को तो कोई समझ भी नहीं है, वो जिंदगी भर ननिहाल में रहा है, सुखों ही सुखों में रहा है, उसने दुख कभी देखा नहीं है, आपने तो दुख का अनुभव किया है, इसलिए राजा बनने के अधिकारी तो आप ही हैं”
श्री राम – “नहीं, यदि राजा बनकर मैं यहाँ बैठ गया तो इससे भी बड़े कार्य होने वाले हैं, वे नहीं हो पायेंगे, इसलिए वन गमन तो जाना है”।
फिर वन गमन जाना तय होता है, उनके साथ उनकी भार्या सीता और लक्ष्मण भी जाते हैं, राजा दशरथ कहते हैं कि तुम वन जा रहे हो तो दास-दासियों को साथ लेकर जाओ, हाथी-घोड़े लेकर जाओ, धन सम्पत्ति लेकर जाओ, अस्त्र-शस्त्र लेकर जाओ। तब श्री राम कहते हैं कि “नहीं, मैं जहाँ जाऊँगा वही सेना बनाऊँगा, वही के संसाधनों से रहूँगा, मुझे एक साधारण व्यक्ति का जीवन बिताना है और मैं सब साधारण व्यक्तियों के बीच साधारण रहूँगा, तो उनमें ज्यादा प्रेरणा पैदा होगी, और शायद वो अपना लक्ष्य हासिल कर सके, एक राजा की हैसियत से जाऊँगा तो मेरे और उनके बीच में दूरी रहेगी, ये दूरी पट नहीं पाई, तो जो हासिल करना है वो मिलेगा नहीं, और 14 वर्ष का जो उनका वनवास है जगह-जगह जाना, कंद-मूल खाना, वही कुटिया बनाकर रहना, वही के संसाधनों से जीवन चलाना, सुख में रहना, दुख में रहना, अलग-अलग तरीके से जीवन बिताते हुए, राक्षसों का संहार करते हुए और जनजातियों का राज्य स्थापित कराते हुए, अंत में पहुँचते हैं जब उनकी पत्नी का अपहरण होता है, रावण उठाकर ले जाता है फिर युद्ध का नाद होता है और युद्ध होता है, युद्ध में राम विजयी होते हैं, रावण हारता है और विभीषण को लंका का राजा बनाते हैं, विभीषण खुद हैरान है कि ये मुझे राजा बना रहे हैं, अब तक सोच कर बैठा था कि राम राजा बनेगे, तो राम कह रहे हैं कि मेरी आज तक की परंपरा नहीं है जिस राज्य को जीता मैं राजा बना, ऐसा हुआ नहीं, मैंने उसी राज्य के नागरिकों को राजा बनाया, तब विभीषण पूछ लेते हैं, कि मुझे एक जिज्ञासा है, कि आपने बाली का संहार किया था