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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

नारायण-सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्तःकरण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी। फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे। जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा—'अरे हर्यश्वो! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ। वास्तवमें तो तुमलोग मूर्ख ही हो। बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है! ।।४-६।।

देखो—एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है। एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है। एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है। एक ऐसा पुरुष है, जो व्यभिचारिणीका पति है। एक ऐसी नदी है, जो आगे-पीछे दोनों ओर बहती है। एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है। एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है। एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने-आप घूमता रहता है। मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे?' ।।७-९।।

नदीमुभयतोवाहा पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम् ।
क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम् ।।८

कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः ।
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ।।९

श्रीशुक उवाच

तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया ।
वाचःकूटं¹ तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ।।१०

भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् ।
अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत्² ।।११

एक एवेश्वरस्तूर्यो भगवान् स्वाश्रयः परः ।
तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१२

पुमान् नैवैति यद् गत्वा बिलस्वर्गं³ गतो यथा ।
प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१३

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नानारूपाऽऽत्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता । तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे— ।।१०।। '(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिंगशरीर ही जिसे साधारणतः जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है? ।।११।। सचमुच ईश्वर एक ही है। वह जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियोंसे भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है। वही सबका आश्रय है, परन्तु उसका आश्रय कोई नहीं है। वही भगवान् हैं। उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्‌के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है? ।।१२।। जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता—वैसे ही जीव जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तर्ज्योतिःस्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है? ।।१३।। यह अपनी बुद्धि ही बहुरूपिणी और सत्त्व, रज आदि गुणोंको धारण करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है। इस जीवनमें इसका अन्त जाने बिना—विवेक प्राप्त किये बिना अशान्तिकों अधिकाधिक बढ़ानेवाले कर्म करनेका प्रयोजन ही क्या है? ।।१४।। यह बुद्धि ही कुलटा स्त्रीके समान है। इसके संगसे जीवरूप पुरुषका ऐश्वर्य—इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है। इसीके पीछे-पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है। इसकी विभिन्न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी? ।।१५।।

तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत् । तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१५

सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम् । मत्तस्य तामविज्ञस्य¹ किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१६

पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणम्² । अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१७

ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम् । विविक्तपदमज्ञाय³ किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१८

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कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत् । स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ।।१९

माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है। यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी। जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है। जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा? ।।१६।।

ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर है। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत्का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं ।।१७।।

भगवान्का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर-क्षीर-विवेकी है। वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडको अलग-अलग करके दिखा देता है। ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंसका आश्रय छोड़कर उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है? ।।१८।।

यह काल ही एक चक्र है। यह निरन्तर घूमता रहता है। इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत्को अपनी ओर खींच रहा है। इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है। यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा? ।।१९।।

शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम् । कथं तदनुरूपाय गुणविश्रम्भ्युपक्रमेत् ।।२०

इति व्यवसिता राजन् हर्यश्वा एकचेतसः । प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम् ।।२१

स्वरब्रह्मणि निर्भातहृषीकेशपदाम्बुजे । अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः ।।२२

नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम् । अन्वतप्यत कः शोचन् सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ।।२३

स१ भूयः पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्त्वितः । पुत्रानजनयद् दक्षः शबलाश्वान् सहस्रशः ।।२४

तेऽपि पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः ।

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नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः ।।२५

तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः । जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तेऽत्र महत् तपः ।।२६

अब्भक्षाः कतिचिन्मासान् कतिचिद्वायुभोजनाः । आराधयन् मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ।।२७

ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने । विशुद्धसत्त्वधिष्णयाय महाहंसाय धीमहि ।।२८

शास्त्र ही पिता है; क्योंकि दूसरा जन्म शास्त्रके द्वारा ही होता है और उसका आदेश कर्मोंमें लगना नहीं, उनसे निवृत्त होना है। इसे जो नहीं जानता, वह गुणमय शब्द आदि विषयोंपर विश्वास कर लेता है। अब वह कर्मोंसे निवृत्त होनेकी आज्ञाका पालन भला कैसे कर सकता है?' ।।२०।। परीक्षित्! हर्यश्वोंने एक मतसे यही निश्चय किया और नारदजीकी परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथके पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता ।।२१।। इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्ममें—संगीतलहरीमें अभिव्यक्त हुए, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंमें अपने चित्तको अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक-लोकान्तरोंमें विचरने लगे ।।२२।।

परीक्षित्! जब दक्षप्रजापतिको मालूम हुआ कि मेरे शीलवान् पुत्र नारदके उपदेशसे कर्तव्यच्युत हो गये हैं, तब वे शोकसे व्याकुल हो गये। उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ। सचमुच अच्छी सन्तानका होना भी शोकका ही कारण है ।।२३।। ब्रह्माजीने दक्षप्रजापतिको बड़ी सान्त्वना दी। तब उन्होंने पंचजन-नन्दिनी असिक्नीके गर्भसे एक हजार पुत्र और उत्पन्न किये। उनका नाम था शबलाश्व ।।२४।। वे भी अपने पिता दक्षप्रजापतिकी आज्ञा पाकर प्रजासृष्टिके उद्देश्यसे तप करनेके लिये उसी नारायणसरोवरपर गये, जहाँ जाकर उनके बड़े भाइयोंने सिद्धि प्राप्त की थी ।।२५।। शबलाश्वोंने वहाँ जाकर उस सरोवरमें स्नान किया। स्नानमात्रसे ही उनके अन्तःकरणके सारे मल धुल गये। अब वे परब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए महान् तपस्यामें लग गये ।।२६।। कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने 'हम नमस्कारपूर्वक ओंकारस्वरूप भगवान् नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।'—इस मन्त्रका अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्‌की आराधना की ।।२७-२८।।

इति तानपि राजेन्द्र प्रतिसर्गधियो मुनिः । उपेत्य नारदः प्राह वाचःकूटानि पूर्ववत् ।।२९

दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम । अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः ॥३०

भ्रातॄणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित् । स पुण्यबन्धुः पुरुषो मरुद्भिः सह मोदते ॥३१

एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः । तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष ॥३२

सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः । नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ॥३३

एतस्मिन् काल उत्पातान् बहून् पश्यन् प्रजापतिः । पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपाशृणोत् ॥३४

चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छितः । देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधरः ॥३५

दक्ष उवाच

अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया । असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्गः प्रदर्शितः ॥३६

ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम् । विघातः श्रेयसः पाप लोकयोरुभयोः कृतः ॥३७

परीक्षित्! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहलेके समान ही कूट वचन कहे ॥२९॥ उन्होंने कहा—'दक्षप्रजापतिके पुत्रो! मैं तुमलोगोंको जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्गका अनुसन्धान करो ॥३०॥ जो धर्मज्ञ भाई अपने बड़े भाइयोंके श्रेष्ठ मार्गका अनुसरण करता है, वही सच्चा भाई है! वह पुण्यवान् पुरुष परलोकमें मरुद्गणोंके साथ आनन्द भोगता है ॥३१॥ परीक्षित्! शबलाश्वोंको इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगोंने भी अपने भाइयोंके मार्गका ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजीका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता ॥३२॥ वे उस पथके पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके

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अनुकूल है। वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही ।।३३।।

दक्षप्रजापतिने देखा कि आजकल बहुत-से अशकुन हो रहे हैं। उनके चित्तमें पुत्रोंके अनिष्टकी आशंका हो आयी। इतनेमें ही उन्हें मालूम हुआ कि पहलेकी भाँति अबकी बार भी नारदजीने मेरे पुत्रोंको चौपट कर दिया ।।३४।। उन्हें अपने पुत्रोंकी कर्तव्यच्युतिसे बड़ा शोक हुआ और वे नारदजीपर बड़े क्रोधित हुए। उनके मिलनेपर क्रोधके मारे दक्षप्रजापतिके होठ फड़कने लगे और वे आवेशमें भरकर नारदजीसे बोले ।।३५।।

दक्षप्रजापतिने कहा—ओ दुष्ट! तुमने झूठमूठ साधुओंका बाना पहन रखा है। हमारे भोले-भाले बालकोंको भिक्षुकोंका मार्ग दिखाकर तुमने हमारा बड़ा अपकार किया है ।।३६।।

अभी उन्होंने ब्रह्मचर्यसे ऋषि-ऋण, यज्ञसे देव-ऋण और पुत्रोत्पत्तिसे पितृ-ऋण नहीं उतारा था। उन्हें अभी कर्मफलकी नश्वरताके सम्बन्धमें भी कुछ विचार नहीं था। परन्तु पापात्मन्! तुमने उनके दोनों लोकोंका सुख चौपट कर दिया ।।३७।।

एवं त्वं निरनुक्रोशो बालानां मतिभिद्द्वरेः । पार्षदमध्ये चरसि यशोहा निरपत्रपः ।।३८

ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातराः । ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम् ।।३९

नेत्थं पुंसां विरागः स्यात् त्वया केवलिना मृषा । मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम् ।।४०

नानुभूय न जानाति पुमान् विषयतीक्ष्णताम् । निर्विद्येत स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधीः परैः ।।४१

यन्नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम् । कृतवानसि दुर्मर्षं विप्रियं तव मर्षितम् ।।४२

तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचरः पुनः । तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद् भ्रमतः पदम् ।।४३

श्रीशुक उवाच

प्रतिजग्राह तद्बाढं नारदः साधुसम्मतः । एतावान् साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ।।४४

सचमुच तुम्हारे हृदयमें दयाका नाम भी नहीं है। तुम इस प्रकार बच्चोंकी बुद्धि बिगाड़ते फिरते हो। तुमने भगवान्‌के पार्षदोंमें रहकर उनकी कीर्तिमें कलंक ही लगाया। सचमुच तुम बड़े निर्लज्ज हो ।।३८।।

मैं जानता हूँ कि भगवान्‌के पार्षद सदा-सर्वदा दुःखी प्राणियोंपर दया करनेके लिये व्यग्र रहते हैं। परन्तु तुम प्रेमभावका विनाश करनेवाले हो। तुम उन लोगोंसे भी वैर करते हो, जो किसीसे वैर नहीं करते ।।३९।।

यदि तुम ऐसा समझते हो कि वैराग्यसे ही स्नेहपाश—विषयासक्तिका बन्धन कट सकता है, तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है; क्योंकि तुम्हारे जैसे झूठमूठ वैराग्यका स्वाँग भरनेवालोंसे किसीको वैराग्य नहीं हो सकता ।।४०।।

नारद! मनुष्य विषयोंका अनुभव किये बिना उनकी कटुता नहीं जान सकता। इसलिये उनकी दुःखरूपताका अनुभव होनेपर स्वयं जैसा वैराग्य होता है, वैसा दूसरोंके बहकानेसे नहीं होता ।।४१।।

हमलोग सद्गृहस्थ हैं, अपनी धर्ममर्यादाका पालन करते हैं। एक बार पहले भी तुमने हमारा असह्य अपकार किया था। तब हमने उसे सह लिया ।।४२।।

तुम तो हमारी वंशपरम्पराका उच्छेद करनेपर ही उतारू हो रहे हो। तुमने फिर हमारे साथ वही दुष्टताका व्यवहार किया। इसलिये मूढ़! जाओ, लोक-लोकान्तरोंमें भटकते रहो। कहीं भी तुम्हारे लिये ठहरनेको ठौर नहीं होगी ।।४३।।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! संतशिरोमणि देवर्षि नारदने ‘बहुत अच्छा’ कहकर दक्षका शाप स्वीकार कर लिया। संसारमें बस, साधुता इसीका नाम है कि बदला लेनेकी शक्ति रहनेपर भी दूसरेको किया हुआ अपकार सह लिया जाय ।।४४।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदशापो नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।।


१. प्रा० पा०—तद्वाचःकूटं देवर्षेः। २. प्रा० पा०—किं नु स्यात्कर्म०। ३. प्रा० पा०—बिलं सर्गं।
१. प्रा० पा०—तदविज्ञस्य। २. प्रा० पा०—दर्शनम्। ३. प्रा० पा०—रूपम०।
१. प्रा० पा०—ततः स पाञ्च०।

अथ षष्ठोऽध्यायः

दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओंके वंशका विवरण

श्रीशुक उवाच

ततः प्राचेतसोऽसिकन्यामनुनीतः स्वयम्भुवा ।
षष्टिं संजनयामास दुहितॄः पितृवत्सलाः ।।१
दश धर्माय कायेन्दोर्द्विषट् त्रिणव दत्तवान् ।
भूताङ्गिरः कृशाश्वेभ्यो द्वे द्वे तार्क्ष्याय चापराः ।।२
नामधेयान्यमूषां त्वं सापत्यानां च मे शृणु ।
यासां प्रसूतिप्रसवैर्लोका आपूरितास्त्रयः ।।३
भानुर्लम्बा ककुब्जामिर्विश्वा साध्या मरुत्वती ।
वसुर्मुहूर्ता सङ्कल्पा धर्मपत्न्यः सुतान् शृणु ।।४
भानोस्तु देवऋषभ इन्द्रसेनस्ततो नृप ।
विद्योत आसील्लम्बायास्ततश्च स्तनयित्नवः ।।५
ककुभः सङ्कटस्तस्य कीकटस्तनयो यतः ।
भुवो दुर्गाणि जामेयः स्वर्गो नन्दिस्ततोऽभवत् ।।६
विश्वेदेवास्तु विश्वाया अप्रजांस्तान् प्रचक्षते ।
साध्योगणस्तु साध्याया अर्थसिद्धिस्तु तत्सुतः ।।७
मरुत्वांश्च जयन्तश्च मरुत्वत्यां बभूवतुः ।
जयन्तो वासुदेवांश उपेन्द्र इति यं विदुः ।।८
मौहूर्तिका देवगणा मुहूर्तायाश्च जज्ञिरे ।
ये वै फलं प्रयच्छन्ति भूतानां स्वस्वकालजम् ।।९
सङ्कल्पायाश्च सङ्कल्पः कामःसङ्कल्पजः स्मृतः ।
वसवोऽष्टौ वसोः पुत्रास्तेषां नामानि मे शृणु ।।१०
द्रोणः प्राणो ध्रुवोऽर्कोऽग्निर्दोषो वसुर्विभावसुः ।
द्रोणस्याभिमतेः पत्न्या हर्षशोकभयादयः ।।११
प्राणस्योर्जस्वती भार्या सह आयुः पुरोजवः ।
ध्रुवस्य भार्या धरणीरसूत विविधाः पुरः ।।१२

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर ब्रह्माजीके बहुत अनुनय-विनय करनेपर दक्षप्रजापतिने अपनी पत्नी असिक्नीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। वे सभी अपने पिता दक्षसे बहुत प्रेम करती थीं ॥१॥ दक्षप्रजापतिने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, दो भूतको, दो अंगिराको, दो कृशाश्वको और शेष चार तार्क्ष्यनामधारी कश्यपको ही ब्याह दीं ॥२॥ परीक्षित्! तुम इन दक्षकन्याओं और इनकी सन्तानोंके नाम मुझसे सुनो। इन्हींकी वंशपरम्परा तीनों लोकोंमें फैली हुई है ॥३॥

धर्मकी दस पत्नियाँ थीं—भानु, लम्बा, ककुभ्, जामि, विश्वा, साध्या, मरुत्वती, वसु, मुहूर्ता और संकल्पा। इनके पुत्रोंके नाम सुनो ॥४॥ राजन्! भानुका पुत्र देवऋषभ और उसका इन्द्रसेन था। लम्बाका पुत्र हुआ विद्योत और उसके मेघगण ॥५॥ ककुभ्का पुत्र हुआ संकट, उसका कीकट और कीकटके पुत्र हुए पृथ्वीके सम्पूर्ण दुर्गों (किलों)-के अभिमानी देवता। जामिके पुत्रका नाम था स्वर्ग और उसका पुत्र हुआ नन्दी ॥६॥ विश्वाके विश्वेदेव हुए। उनके कोई सन्तान न हुई। साध्यासे साध्यगण हुए और उनका पुत्र हुआ अर्थसिद्धि ॥७॥

मरुत्वतीके दो पुत्र हुए—मरुत्वान् और जयन्त। जयन्त भगवान् वासुदेवके अंश हैं, जिन्हें लोग उपेन्द्र भी कहते हैं ॥८॥ मुहूर्तासे मुहूर्तके अभिमानी देवता उत्पन्न हुए। ये अपने-अपने मुहूर्तमें जीवोंको उनके कर्मानुसार फल देते हैं ॥९॥ संकल्पाका पुत्र हुआ संकल्प और उसका काम। वसुके पुत्र आठों वसु हुए। उनके नाम मुझसे सुनो ॥१०॥ द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु। द्रोणकी पत्नीका नाम है अभिमति। उससे हर्ष, शोक, भय आदिके अभिमानी देवता उत्पन्न हुए ॥११॥ प्राणकी पत्नी ऊर्जस्वतीके गर्भसे सह, आयु और पुरोजव नामके तीन पुत्र हुए। ध्रुवकी पत्नी धरणीने अनेक नगरोंके अभिमानी देवता उत्पन्न किये ॥१२॥

अर्कस्य वासना भार्या पुत्रास्तर्षादयः स्मृताः ।
अग्नेर्भार्या वसोर्धारा पुत्रा द्रविणकादयः ॥१३

स्कन्दश्च कृत्तिकापुत्रो ये विशाखादयस्ततः ।
दोषस्य शर्वरीपुत्रः शिशुमारो हरेः कला ॥१४

वसोराङ्गिरसीपुत्रो विश्वकर्मा कृतीपतिः ।
ततो मनुश्चाक्षुषोऽभूद् विश्वे साध्या मनोः सुताः ॥१५

विभावसोरसूतोषा व्युष्टं रोचिषमातपम् ।
पञ्चयामोऽथ भूतानि येन जाग्रति कर्मसु ॥१६

सरूपासूत भूतस्य भार्या रुद्रांश्च कोटिशः ।
रैवतोऽजो भवो भीमो वाम उग्रो वृषाकपिः ॥१७

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अजैकपादहिर्बुध्न्यो बहुरूपो महानिति । रुद्रस्य पार्षदाश्चान्ये घोरा भूतविनायकाः ॥१८

प्रजापतेरङ्गिरसः स्वधा पत्नी पितॄनथ । अथर्वाङ्गिरसं वेदं पुत्रत्वे चाकरोत् सती ॥१९

कृशाश्वोऽर्चिषि भार्यायां धूम्रकेशमजीजनत् । धिषणायां वेदशिरो देवलं वयुनं मनुम् ॥२०

तार्क्ष्यस्य विनता कद्रूः पतङ्गी यामिनीति च । पतङ्ग्यसूत पतगान् यामिनी शलभानथ ॥२१

सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद् यज्ञेशवाहनम् । सूर्यसूतमनूरुं च कद्रूर्नागाननेकशः ।॥२२

कृत्तिकादीनि नक्षत्राणीन्दोः पत्न्यस्तु भारत । दक्षशापात् सोऽनपत्यस्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः ॥२३

अर्ककी पत्नी वासनाके गर्भसे तर्ष (तृष्णा) आदि पुत्र हुए। अग्नि नामक वसुकी पत्नी धाराके गर्भसे द्रविणक आदि बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए ॥१३॥ कृत्तिकापुत्र स्कन्द भी अग्निसे ही उत्पन्न हुए। उनसे विशाख आदिका जन्म हुआ। दोषकी पत्नी शर्वरीके गर्भसे शिशुमारका जन्म हुआ। वह भगवान्का कलावतार है ॥१४॥ वसुकी पत्नी आङ्गिरसीसे शिल्पकलाके अधिपति विश्वकर्माजी हुए। विश्वकर्माके उनकी भार्या कृतीके गर्भसे चाक्षुष मनु हुए और उनके पुत्र विश्वेदेव एवं साध्यगण हुए ॥१५॥ विभावसुकी पत्नी उषासे तीन पुत्र हुए—व्युष्ट, रोचिष् और आतप । उनमेंसे आतपके पंचयाम (दिवस) नामक पुत्र हुआ, उसीके कारण सब जीव अपने-अपने कार्योंमें लगे रहते हैं ॥१६॥ भूतकी पत्नी दक्षकन्दिनी सरूपाने कोटि-कोटि रुद्रगण उत्पन्न किये। इनमें रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप, और महान्—ये ग्यारह मुख्य हैं। भूतकी दूसरी पत्नी भूतासे भयंकर भूत और विनायकादिका जन्म हुआ। ये सब ग्यारहवें प्रधान रुद्र महान्के पार्षद हुए ॥१७-१८॥

अंगिरा प्रजापतिकी प्रथम पत्नी स्वधाने पितृगणको उत्पन्न किया और दूसरी पत्नी सतीने अथर्वांगिरस नामक वेदको ही पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया ॥१९॥ कृशाश्वकी पत्नी अर्चिसे धूम्रकेशका जन्म हुआ और धिषणासे चार पुत्र हुए—वेदशिरा, देवल, वयुन और मनु ॥२०॥ तार्क्ष्यनामधारी कश्यपकी चार स्त्रियाँ थीं—विनता, कद्रू, पतंगी और यामिनी। पतंगीसे पक्षियोंका और यामिनीसे शलभों (पतिंगों)-का जन्म हुआ ॥२१॥ विनताके पुत्र गरुड़ हुए, ये ही भगवान् विष्णुके वाहन हैं। विनताके ही दूसरे पुत्र अरुण हैं, जो भगवान्

सूर्यके सारथि हैं। कद्रूसे अनेकों नाग उत्पन्न हुए ।।२२।। परीक्षित्! कृत्तिका आदि सत्ताईस नक्षत्रा-भिमानिनी देवियाँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं। रोहिणीसे विशेष प्रेम करनेके कारण चन्द्रमाको दक्षने शाप दे दिया, जिससे उन्हें क्षयरोग हो गया था। उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई ।।२३।। पुनः प्रसाद्य तं सोमः कला लेभे क्षये दिताः । शृणु नामानि लोकानां मातृणां शङ्कराणि च ।।२४ अथ कश्यपपत्नीनां यत्प्रसूतमिदं जगत् । अदितिर्दितिर्दनुः काष्ठा अरिष्टा सुरसा इला ।।२५ मुनिः क्रोधवशा ताम्रा सुरभिः सरमा तिमिः । तिमेर्यादोगणा आसन् श्वापदाः सरमासुताः ।।२६ सुरभेर्महिषागावो ये चान्ये द्विशफा नृप । ताम्रायाः श्येनगृध्राद्या मुनेरप्सरसां गणाः ।।२७ दन्दशूकादयः सर्पा राजन् क्रोधवशात्मजाः । इलाहा भूरुहाः सर्वे यातुधानाश्च सौरसाः ।।२८ अरिष्टायाश्च गन्धर्वाः काष्ठाया द्विशफेतराः । सुता दनोरेकषष्टिस्तेषां प्राधानिकान् शृणु ।।२९ द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसुः । अयोमुखः शङ्कुशिराः स्वर्भानुः कपिलोऽरुणः ।।३० पुलोमा वृषपर्वा च एकचक्रोऽनुतापनः । धूम्रकेशो विरूपाक्षो विप्रचित्तिश्च दुर्जयः ।।३१ स्वर्भानोः सुप्रभां कन्यामुवाह नमुचिः किल । वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ।।३२ वैश्वानरसुता याश्च चतस्रश्चारुदर्शनाः । उपदानवी हयशिरा पुलोमा कालका तथा ।।३३ उपदानवीं हिरण्याक्षः क्रतुर्हयशिरां नृप । पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः ।।३४ उपयेमेऽथ भगवान् कश्यपो ब्रह्मचोदितः । पौलोमाः कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिनः ।।३५ तयोः षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितुः पिता । जघान स्वर्गंतो राजन्नेक इन्द्रप्रियङ्करः ।।३६

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उन्होंने दक्षको फिरसे प्रसन्न करके कृष्णपक्षकी क्षीण कलाओंके शुक्लपक्षमें पूर्ण होनेका वर तो प्राप्त कर लिया, (परन्तु नक्षत्राभिमानी देवियोंसे उन्हें कोई सन्तान न हुई) अब तुम कश्यपपत्नियोंके मंगलमय नाम सुनो। वे लोकमाताएँ हैं। उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। उनके नाम हैं—अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। इनमें तिमिके पुत्र हैं—जलचर जन्तु और सरमाके बाघ आदि हिंसक जीव ।।२४-२६।। सुरभिके पुत्र हैं—भैंस, गाय तथा दूसरे दो खुरवाले पशु। ताम्राकी सन्तान हैं—बाज, गीध आदि शिकारी पक्षी। मुनिसे अप्सराएँ उत्पन्न हुईं ।।२७।। क्रोधवशाके पुत्र हुए—साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तु। इलासे वृक्ष, लता आदि पृथ्वीमें उत्पन्न होनेवाली वनस्पतियाँ और सुरसासे यातुधान (राक्षस) ।।२८।। अरिष्टासे गन्धर्व और काष्ठासे घोड़े आदि एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। दनुके इकसठ पुत्र हुए। उनमें प्रधान-प्रधानके नाम सुनो ।।२९।।

द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शंकुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति और दुर्जय ।।३०-३१।। स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभासे नमुचिने और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठासे महाबली नहुषनन्दन ययातिने विवाह किया ।।३२।। दनुके पुत्र वैश्वानरकी चार सुन्दरी कन्याएँ थीं। इनके नाम थे—उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा और कालका ।।३३।। इनमेंसे उपदानवीके साथ हिरण्याक्षका और हयशिराके साथ क्रतुका विवाह हुआ। ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रजापति भगवान् कश्यपने ही वैश्वानरकी शेष दो पुत्रियों—पुलोमा और कालकाके साथ विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नामके साठ हजार रणवीर दानव हुए। इन्हींका दूसरा नाम निवातकवच था। ये यज्ञकर्ममें विघ्न डालते थे, इसलिये परीक्षित्! तुम्हारे दादा अर्जुनने अकेले ही उन्हें इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये मार डाला। यह उन दिनोंकी बात है, जब अर्जुन स्वर्गमें गये हुए थे ।।३४-३६।।

विप्रचित्तिः सिंहिकायां शतं चैकमजीजनत् ।
राहुज्येष्ठं केतुशतं ग्रहत्वं य उपागतः ।।३७

अथातः श्रूयतां वंशो योऽदितेरनुपूर्वशः ।
यत्र नारायणो देवः स्वांशेनावतरद् विभुः ।।३८

विवस्वानर्यमा पूषा त्वष्टाथ सविता भगः ।
धाता विधाता वरुणो मित्रः शक्र उरुक्रमः ।।३९

विवस्वतः श्राद्धदेवं संज्ञासूत वै मनुम् ।
मिथुनं च महाभागा यमं देवं यमीं तथा ।
सैव भूत्वाथ वडवा नासत्यौ सुषुवे भुवि ।।४०

छाया शनैश्चरं लेभे सावर्णिं च मनुं ततः । कन्यां च तपतीं या वै वव्रे संवरणं पतिम् ॥४१

अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणयः सुताः । यत्र वै मानुषी जातिर्ब्रह्मणा चोपकल्पिता ॥४२

पूषानपत्यः पिष्टादो भग्नदन्तोऽभवत् पुरा । योऽसौ दक्षाय कुपितं जहासास विवृतद्विजः ॥४३

त्वष्टुर्दैत्यानुजा भार्या रचना नाम कन्यका । संनिवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान् ॥४४

तं वव्रिरे सुरगणा स्वस्त्रीयं द्विषतामपि । विमतेन परित्यक्ता गुरुणाऽऽङ्गिरसेन यत् ॥४५

विप्रचित्तिकी पत्नी सिंहिकाके गर्भसे एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे बड़ा था राहु, जिसकी गणना ग्रहोंमें हो गयी। शेष सौ पुत्रोंका नाम केतु था ॥३७॥ परीक्षित्! अब क्रमशः अदितिकी वंशपरम्परा सुनो। इस वंशमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायणने अपने अंशसे वामनरूपमें अवतार लिया था ॥३८॥ अदितिके पुत्र थे—विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम (वामन)। यही बारह आदित्य कहलाये ॥३९॥ विवस्वान्की पत्नी महाभाग्यवती संज्ञाके गर्भसे श्राद्धदेव (वैवस्वत) मनु एवं यम-यमीका जोड़ा पैदा हुआ! संज्ञाने ही घोड़ीका रूप धारण करके भगवान् सूर्यके द्वारा भूलोकमें दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया ॥४०॥

विवस्वान्की दूसरी पत्नी थी छाया। उसके शनैश्चर और सावर्णि मनु नामके दो पुत्र तथा तपती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। तपतीने संवरणको पतिरूपमें वरण किया ॥४१॥ अर्यमाकी पत्नी मातृका थी। उसके गर्भसे चर्षणी नामक पुत्र हुए। वे कर्तव्य-अकर्तव्यके ज्ञानसे युक्त थे। इसलिये ब्रह्माजीने उन्हींके आधारपर मनुष्यजातिकी (ब्राह्मणादि वर्णोंकी) कल्पना की ॥४२॥ पूषाके कोई सन्तान न हुई। प्राचीनकालमें जब शिवजी दक्षपर क्रोधित हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्रने इनके दाँत तोड़ दिये थे। तबसे पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ॥४३॥ दैत्योंकी छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टाकी पत्नी थी। रचनाके गर्भसे दो पुत्र हुए—संनिवेश और पराक्रमी विश्वरूप ॥४४॥ इस प्रकार विश्वरूप यद्यपि शत्रुओंके भानजे थे—फिर भी जब देवगुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रसे अपमानित होकर देवताओंका परित्याग कर दिया, तब देवताओंने विश्वरूपको ही अपना पुरोहित बनाया था ॥४५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ ebook converter DEMO Watermarks*

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अथ सप्तमोऽध्यायः

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण

राजोवाच

कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः ।
एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ ॥१

श्रीशुक उवाच

इन्द्रस्त्रिभुवनैश्वर्यमदोल्लङ्घितसत्पथः ।
मरुद्भिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप ॥२

विश्वेदेवैश्च साध्यैश्च नासत्याभ्यां परिश्रितः ।
सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥३

विद्याधराप्सरोभिश्च किन्नरैः पतगोरगैः ।
निषेव्यमाणो मघवान् स्तूयमानश्च भारत ॥४

उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाश्रितः ।
पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा ॥५

युक्तश्चान्यैः पारमेष्ठ्यैश्चामरव्यजनादिभिः ।
विराजमानः पौलोम्या सहार्धासनया भृशम् ॥६

स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह ।
नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥७

वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम् ।
नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्नपि सभागतम् ॥८

ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरसः प्रभुः ।
आययौ स्वगृहं तूष्णीं विद्वान् श्रीमदविक्रियाम् ॥९

तर्ह्येव प्रतिबुद्ध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः । गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना ।।१०

राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय शिष्य देवताओंको किस कारण त्याग दिया था? देवताओंने अपने गुरुदेवका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ।।१।।

श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोजित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे ।।२-६।। इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये। उन्हें सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं। इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परन्तु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरुका सत्कार ही किया। यहाँतक कि वे अपने आसनसे हिले-डुलेतक नहीं ।।७-८।। त्रिकालदर्शी समर्थ बृहस्पतिजीने देखा कि यह ऐश्वर्यमदका दोष है! बस, वे झटपट वहाँसे निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये ।।९।। परीक्षित्! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है। वे भरी सभामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे ।।१०।।

अहो बत ममासाधु कृतं वै दम्भबुद्धिना । यन्मयैश्वर्यमत्तेन गुरुः सदसि तात्कृतः ।।११

को गृध्येत् पण्डितो लक्ष्मीं त्रिविष्टपपतेरपि । ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वरः ।।१२

ये पारमेष्ठ्यं धिषणमधितिष्ठन् न कञ्चन । प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्मं ते न परं विदुः ।।१३

तेषां कुपथदेष्टॄणां पततां तमसि ह्यधः । ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इव ।।१४

अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम् । प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन् ।।१५

एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान् गृहात् । बृहस्पतिर्गतोऽदृष्टां गतिमध्यात्ममायया ।।१६

गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन् भगवान् स्वराट् । ध्यायन् धिया सुरैर्युक्तः शर्म नालभतात्मनः ।।१७

तच्छ्रुत्वैवासुराः सर्व आश्रित्यौशनसं मतम् । देवान् प्रत्युद्यमं चक्रुर्दुर्मदा आततायिनः ।।१८

तैर्विसृष्टेषुभिस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्नाङ्गोरुबाहवः । ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहेन्द्रा नतकन्धराः ।।१९

तांस्तथाभ्यर्दितान् वीक्ष्य भगवानात्मभूरजः । कृपया परया देव उवाच परिसान्त्वयन् ।।२०

‘हाय-हाय! बड़े खेदकी बात है कि भरी सभामें मूर्खतावश मैंने ऐश्वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेवका तिरस्कार कर दिया। सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है ।।११।। भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्गकी राजलक्ष्मीको पानेकी इच्छा करेगा? देखो तो सही, आज इसीने मुझ देवराजको भी असुरोंके-से रजोगुणी भावसे भर दिया ।।१२।। जो लोग यह कहते हैं कि सार्वभौम राजसिंहासनपर बैठा हुआ सम्राट् किसीके आनेपर राजसिंहासनसे न उठे, वे धर्मका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते ।।१३।। ऐसा उपदेश करनेवाले कुमार्गकी ओर ले जानेवाले हैं। वे स्वयं घोर नरकमें गिरते हैं। उनकी बातपर जो लोग विश्वास करते हैं, वे पत्थरकी नावकी तरह डूब जाते हैं ।।१४।। मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा’ ।।१५।।

परीक्षित्! देवराज इन्द्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् बृहस्पतिजी अपने घरसे निकलकर योगबलसे अन्तर्धान हो गये ।।१६।। देवराज इन्द्रने अपने गुरुदेवको बहुत ढूँढ़ा-ढूँढ़वाया; परन्तु उनका कहीं पता न चला। तब वे गुरुके बिना अपनेको सुरक्षित न समझकर देवताओंके साथ अपनी बुद्धिके अनुसार स्वर्गकी रक्षाका उपाय सोचने लगे, परन्तु वे कुछ भी सोच न सके! उनका चित्त अशान्त ही बना रहा ।।१७।। परीक्षित्! दैत्योंको भी देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्रकी अनबनका पता लग गया। तब उन मदोन्मत्त और आततायी असुरोंने अपने गुरु शुक्राचार्यके आदेशानुसार देवताओंपर विजय पानेके लिये धावा बोल

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दिया ।।१८।। उन्होंने देवताओंपर इतने तीखे-तीखे बाणोंकी वर्षा की कि उनके मस्तक, जंघा, बाहु आदि अंग कट-कटकर गिरने लगे। तब इन्द्रके साथ सभी देवता सिर झुकाकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ।।१९।। स्वयम्भू एवं समर्थ ब्रह्माजीने देखा कि देवताओंकी तो सचमुच बड़ी दुर्दशा हो रही है। अतः उनका हृदय अत्यन्त करुणासे भर गया। वे देवताओंको धीरज बँधाते कहने लगे ।।२०।।

ब्रह्मोवाच

अहो बत सुरश्रेष्ठ ह्यभद्रं वः कृतं महत् । ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं दान्तमैश्वर्यान्नाभ्यनन्दत ।।२१

तस्यायमनयस्यासीत् परेभ्यो वः पराभवः । प्रक्षीणेभ्यः स्ववैरिभ्यः समृद्धानां च यत् सुराः ।।२२

मघवन् द्विषतः पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात् । सम्प्रत्युपचितान् भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः । आददीरन् निलयनं ममापि भृगुदेवताः ।।२३

त्रिविष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य- मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षिताार्थाः । न विप्रगोविन्दगवीश्वराणां भवन्त्यभद्राणि नरेश्वराणाम् ।।२४

तद् विश्वरूपं भजताशु विप्रं तपस्विनं त्वाष्ट्रमथात्मवन्तम् । सभाजितोऽर्थान् स विधास्यते वो यदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म ।।२५

श्रीशुक उवाच

त एवमुदिता राजन् ब्रह्मणा विगतज्वराः । ऋषिं त्वाष्ट्रमुपव्रज्य परिष्वज्येदमब्रुवन् ।।२६

देवा ऊचुः

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वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते । कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः ॥२७

ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! यह बड़े खेदकी बात है। सचमुच तुमलोगोंने बहुत बुरा काम किया। हरे, हरे! तुमलोगोंने ऐश्वर्यके मदसे अंधे होकर ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ एवं संयमी ब्राह्मणका सत्कार नहीं किया ॥२१॥ देवताओ! तुम्हारी उसी अनीतिक यह फल है कि आज समृद्धिशाली होनेपर भी तुम्हें अपने निर्बल शत्रुओंके सामने नीचा देखना पड़ा ॥२२॥ देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परन्तु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन-जनसे सम्पन्न हो गये हैं। देवताओ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे ॥२३॥ भृगुवंशियोंने इन्हें अर्थशास्त्रकी पूरी-पूरी शिक्षा दे रखी है। ये जो कुछ करना चाहते हैं, उसका भेद तुमलोगोंको नहीं मिल पाता। उनकी सलाह बहुत गुप्त होती है। ऐसी स्थितिमें वे स्वर्गको तो समझते ही क्या हैं, वे चाहे जिस लोकको जीत सकते हैं। सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गोविन्द और गौओंको अपना सर्वस्व मानते हैं और जिनपर उनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमंगल नहीं होता ॥२४॥ इसलिये अब तुमलोग शीघ्र ही त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके पास जाओ और उन्हींकी सेवा करो। वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं। यदि तुमलोग उनके असुरोंके प्रति प्रेमको क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे ॥२५॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब ब्रह्माजीने देवताओंसे इस प्रकार कहा, तब उनकी चिन्ता दूर हो गयी। वे त्वष्टाके पुत्र विश्वरूप ऋषिके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर यों कहने लगे ॥२६॥

देवताओंने कहा—बेटा विश्वरूप! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं। हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित अभिलाषा पूर्ण करो ॥२७॥

पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम् । अपि पुत्रवतां ब्रह्मन् किमुत ब्रह्मचारिणाम् ॥२८

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः । भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनुः ॥२९

दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम् । अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः ॥३०

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तस्मात् पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम् । तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि ॥३१

वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम् । यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा ॥३२

न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्र्यभिवादनम् । छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन् वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ॥३३

ऋषिरुवाच

अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः । स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्नः श्लक्ष्णया गिरा ॥३४

विश्वरूप उवाच

विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्च उपव्ययम् । कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम् । प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते ॥३५

अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः ।

जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है ॥२८॥ वत्स! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजीकी, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वीकी मूर्ति होती है ॥२९॥ (इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्निकी और जगत्‌के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं ॥३०॥ पुत्र! हम तुम्हारे पितर हैं। इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है। हम बड़े दुःखी हो रहे हैं। तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दुःख, दारिद्र्य, पराजय टाल दो। पुत्र! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ॥३१॥ तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अतः जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥३२॥

पुत्र! आवश्यकता पड़नेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है। वेदज्ञानको छोड़कर केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है ॥३३॥

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