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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

कारण शोक, मोह, भय, क्रोध, राग, कायरता और श्रम आदिका शिकार होना पड़ता है—उस धन और जीवनकी स्पृहाका त्याग कर दे ।।३३।।

इस लोकमें मेरे सबसे बड़े गुरु हैं—अजगर और मधुमक्खी। उनकी शिक्षासे हमें वैराग्य और सन्तोषकी प्राप्ति हुई है ।।३४।। मधुमक्खी जैसे मधु इकट्ठा करती है, वैसे ही लोग बड़े कष्टसे धन-संचय करते हैं; परन्तु दूसरा ही कोई उस धन-राशिके स्वामीको मारकर उसे छीन लेता है। इससे मैंने यह शिक्षा ग्रहण की कि विषय-भोगोंसे विरक्त ही रहना चाहिये ।।३५।। मैं अजगरके समान निश्चेष्ट पड़ा रहता हूँ और दैववश जो कुछ मिल जाता है, उसीमें सन्तुष्ट रहता हूँ और यदि कुछ नहीं मिलता, तो बहुत दिनोंतक धैर्य धारण कर यों ही पड़ा रहता हूँ ।।३६।।

कभी थोड़ा अन्न खा लेता हूँ तो कभी बहुत; कभी स्वादिष्ट तो कभी नीरस—बेस्वाद; और कभी अनेकों गुणोंसे युक्त, तो कभी सर्वथा गुणहीन ।।३७।। कभी बड़ी श्रद्धासे प्राप्त हुआ अन्न खाता हूँ तो कभी अपमानके साथ और किसी-किसी समय अपने-आप ही मिल जानेपर कभी दिनमें, कभी रातमें और कभी एक बार भोजन करके भी दुबारा कर लेता हूँ ।।३८।।

क्षौमं दुकूलमजिनं चीरं वल्कलमेव वा ।
वसेऽन्यदपि सम्प्राप्तं दिष्टभुक् तुष्टधीरहम् ।।३९

क्वचिच्छये धरोपस्थे तृणपर्णाश्मभस्मसु ।
क्वचित् प्रासादपर्यङ्के कशिपौ वा परेच्छया ।।४०

क्वचित् स्नातोऽनुलिप्ताङ्गः सुवासाः स्रग्व्यलंकृतः ।
रथेभाश्वैश्चरे क्वापि दिग्वासा ग्रहवद् विभो ।।४१

नाहं निन्दे न च स्तौमि स्वभावविषमं जनम् ।
एतेषां श्रेय आशासे उतैकात्म्यं महात्मनि ।।४२

विकल्पं जुहुयाच्चित्तौ तां मनस्यर्थविभ्रमे ।
मनो वैकारिके हुत्वा तन्मायायां जुहोत्यनु ।।४३

आत्मानुभूतौ तां मायां जुहुयात् सत्यदृङ्मुनिः ।
ततो निरीहो विरमेत् स्वानुभूत्याऽऽत्मनि स्थितः ।।४४

स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमपि वर्णितम् ।
व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्परः ।।४५

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नारद उवाच

धर्मं पारमहंस्यं वै मुनेः श्रुत्वासुरेश्वरः ।
पूजयित्वा ततः प्रीत आमन्त्र्य प्रययौ गृहम् ॥ ४६

मैं अपने प्रारब्धके भोगमें ही सन्तुष्ट रहता हूँ। इसलिये मुझे रेशमी या सूती, मृगचर्म या चीर, वल्कल या और कुछ—जैसा भी वस्त्र मिल जाता है, वैसा ही पहन लेता हूँ ॥३९॥ कभी मैं पृथ्वी, घास, पत्ते, पत्थर या राखके ढेरपर ही पड़ा रहता हूँ, तो कभी दूसरोंकी इच्छासे महलोंमें पलँगों और गद्दोंपर सो लेता हूँ ॥४०॥ दैत्यराज! कभी नहा-धोकर, शरीरमें चन्दन लगाकर सुन्दर वस्त्र, फूलोंके हार और गहने पहन रथ, हाथी और घोड़ेपर चढ़कर चलता हूँ, तो कभी पिशाचके समान बिलकुल नंग-धड़ंग विचरता हूँ ॥४१॥ मनुष्योंके स्वभाव भिन्न-भिन्न होते ही हैं। अतः न तो मैं किसीकी निन्दा करता हूँ और न स्तुति ही। मैं केवल इनका परम कल्याण और परमात्मासे एकता चाहता हूँ ॥४२॥

सत्यका अनुसन्धान करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि जो नाना प्रकारके पदार्थ और उनके भेद-विभेद मालूम पड़ रहे हैं, उनको चित्तवृत्तिमें हवन कर दे। चित्तवृत्तिको इन पदार्थोंके सम्बन्धमें विविध भ्रम उत्पन्न करनेवाले मनमें, मनको सात्त्विक अहंकारमें और सात्त्विक अहंकारको महत्तत्त्वके द्वारा मायामें हवन कर दे। इस प्रकार ये सब भेद-विभेद और उनका कारण माया ही है, ऐसा निश्चय करके फिर उस मायाको आत्मानुभूतिमें स्वाहा कर दे। इस प्रकार आत्मसाक्षात्कारके द्वारा आत्मस्वरूपमें स्थित होकर निष्क्रिय एवं उपरत हो जाय ॥४३-४४॥ प्रह्लादजी! मेरी यह आत्मकथा अत्यन्त गुप्त एवं लोक और शास्त्रसे परेकी वस्तु है। तुम भगवान्के अत्यन्त प्रेमी हो, इसलिये मैंने तुम्हारे प्रति इसका वर्णन किया है ॥४५॥

नारदजी कहते हैं—महाराज! प्रह्लादजीने दत्तात्रेय मुनिसे परमहंसोंके इस धर्मका श्रवण करके उनकी पूजा की और फिर उनसे विदा लेकर बड़ी प्रसन्नतासे अपनी राजधानीके लिये प्रस्थान किया ॥४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे
यतिधर्मे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥


२. प्रा० पा०—परित्यज्य। ३. प्रा० पा०—लिङ्गदण्डादे०।
१. प्रा० पा०—परीक्षेत। २. प्रा० पा०—कञ्चन नाश्रयेत्।
१. प्रा० पा०—स्पृहा। २. प्रा० पा०—हीनं ततः क्व०। ३. प्रा० पा०—योगगतं चापि।

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अथ चतुर्दशोऽध्यायः

गृहस्थसम्बन्धी सदाचार

युधिष्ठिर उवाच

गृहस्थ एतां पदवीं विधिना येन चाञ्जसा ।
याति देवऋषे ब्रूहि मादृशो गृहमूढधीः ॥१

नारद उवाच

गृहेष्ववस्थितो राजन्क्रियाः कुर्वन्गृहोचिताः ।
वासुदेवार्पणं साक्षादुपासीत महामुनीन् ॥२

शृण्वन्भगवतोऽभीक्ष्णमवतारकथामृतम् ।
श्रद्दधानो यथाकालमुपशान्तजनावृतः ॥३

सत्सङ्गाच्छनकैः सङ्गमात्मजायात्मजादिषु ।
विमुञ्चेन्मुच्यमानेषु स्वयं स्वप्नवदुत्थितः ॥४

यावदर्थमुपासीनो देहे गेहे च पण्डितः ।
विरक्तो रक्तवत् तत्र नृलोके नरतां न्यसेत् ॥५

ज्ञातयः पितरौ पुत्रा भ्रातरः सुहृदोऽपरे ।
यद् वदन्ति यदिच्छन्ति चानुमोदेत निर्ममः ॥६

दिव्यं भौमं चान्तरिक्षं वित्तमच्युतनिर्मितम् ।
तत् सर्वमुपभुञ्जान एतत् कुर्यात् स्वतो बुधः ॥७

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् ।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥८

राजा युधिष्ठिरने पूछा—देवर्षि नारदजी! मेरे जैसा गृहासक्त गृहस्थ बिना विशेष परिश्रमके इस पदको किस साधनसे प्राप्त कर सकता है, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥१॥

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे और गृहस्थधर्मके अनुसार सब काम करे, परन्तु उन्हें भगवान्‌के प्रति समर्पित कर दे और बड़े-बड़े संत-महात्माओंकी सेवा भी करे ॥२॥ अवकाशके अनुसार विरक्त पुरुषोंमें निवास करे और बार-बार श्रद्धापूर्वक भगवान्‌के अवतारोंकी लीला-सुधाका पान करता रहे ॥३॥ जैसे स्वप्न टूट जानेपर मनुष्य स्वप्नके सम्बन्धियोंसे आसक्त नहीं रहता—वैसे ही ज्यों-ज्यों सत्संगके द्वारा बुद्धि शुद्ध हो, त्यों-ही-त्यों शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदिकी आसक्ति स्वयं छोड़ता चले। क्योंकि एक-न-एक दिन ये छूटनेवाले ही हैं ॥४॥ बुद्धिमान् पुरुषको आवश्यकताके अनुसार ही घर और शरीरकी सेवा करनी चाहिये, अधिक नहीं। भीतरसे विरक्त रहे और बाहरसे रागीके समान लोगोंमें साधारण मनुष्यों-जैसा ही व्यवहार करे ॥५॥ माता-पिता, भाई-बन्धु, पुत्र-मित्र, जातिवाले और दूसरे जो कुछ कहें अथवा जो कुछ चाहें, भीतरसे ममता न रखकर उनका अनुमोदन कर दे ॥६॥

बुद्धिमान् पुरुष वर्षा आदिके द्वारा होनेवाले अन्नादि, पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले सुवर्ण आदि, अकस्मात् प्राप्त होनेवाले द्रव्य आदि तथा और सब प्रकारके धन भगवान्‌के ही दिये हुए हैं—ऐसा समझकर प्रारब्धके अनुसार उनका उपभोग करता हुआ संचय न करे, उन्हें पूर्वोक्त साधुसेवा आदि कर्मोंमें लगा दे ॥७॥ मनुष्योंका अधिकार केवल उतने ही धनपर है, जितनेसे उनकी भूख मिट जाय। इससे अधिक सम्पत्तिको जो अपनी मानता है, वह चोर है, उसे दण्ड मिलना चाहिये ॥८॥

मृगोष्ट्रखरमर्काखुसरीसृप्खगमक्षिकाः ।
आत्मनः पुत्रवत् पश्येत्तैरेषामन्तरं कियत् ॥९

त्रिवर्गं नातिकृच्छ्रेण भजेत गृहमेध्यपि ।
यथादेशं यथाकालं यावद्दैवोपपादितम् ॥१०

आश्वघानान्तेऽवसायिभ्यः कामान्हंविभजेद् यथा ।
अप्येकामात्मनो दारां नृणां स्वत्वग्रहो यतः ॥११

जह्याद् यदर्थे स्वप्राणान्हन्याद् वा पितरं गुरुम् ।
तस्यां स्वत्वं स्त्रियां जह्याद् यस्तेन ह्यजितो जितः ॥१२

कृमिविङ्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।
क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥१३

सिद्धैर्यज्ञावशिष्टार्थैः कल्पयेद् वृत्तिमात्मनः ।
शेषे स्वत्वं त्यजन्प्राज्ञः पदवीं महतामियात् ॥१४

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देवानृषीन् नृन्भूतानि पितॄनात्मानमन्वहम् । स्ववृत्त्यागतवित्तेन यजेत पुरुषं पृथक् ।।१५

यह्यात्मनोऽधिकाराद्याः सर्वाः स्युर्यज्ञसम्पदः । वैतानिकेन विधिना अग्निहोत्रादिना यजेत् ।।१६

न ह्यग्निमुखतोऽयं वै भगवान्सर्वयज्ञभुक् । इज्येत हविषा राजन्यथा विप्रमुखे हुतैः ।।१७

हरिन, ऊँट, गधा, बंदर, चूहा, सरीसृप (रेंगकर चलनेवाले प्राणी), पक्षी और मक्खी आदिको अपने पुत्रके समान ही समझे। उनमें और पुत्रोंमें अन्तर ही कितना है ।।९।। गृहस्थ मनुष्योंको भी धर्म, अर्थ और कामके लिये बहुत कष्ट नहीं उठाना चाहिये; बल्कि देश, काल और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे सन्तोष करना चाहिये ।।१०।। अपनी समस्त भोग-सामग्रियोंको कुत्ते, पतित और चाण्डालपर्यन्त सब प्राणियोंको यथायोग्य बाँटकर ही अपने काममें लाना चाहिये। और तो क्या, अपनी स्त्रीको भी—जिसे मनुष्य समझता है कि यह मेरी है—अतिथि आदिकी निर्दोष सेवामें नियुक्त रखे ।।११।। लोग स्त्रीके लिये अपने प्राणतक दे डालते हैं। यहाँतक कि अपने मा-बाप और गुरुको भी मार डालते हैं। उस स्त्रीपरसे जिसने अपनी ममता हटा ली, उसने स्वयं नित्यविजयी भगवान्‌पर भी विजय प्राप्त कर ली ।।१२।। यह शरीर अन्तमें कीड़े, विष्ठा या राखकी ढेरी होकर रहेगा। कहाँ तो यह तुच्छ शरीर और इसके लिये जिसमें आसक्ति होती है वह स्त्री, और कहाँ अपनी महिमासे आकाशको भी ढक रखनेवाला अनन्त आत्मा! ।।१३।। गृहस्थको चाहिये कि प्रारब्धसे प्राप्त और पंचयज्ञ आदिसे बचे हुए अन्नसे ही अपना जीवन-निर्वाह करे। जो बुद्धिमान् पुरुष इसके सिवा और किसी वस्तुमें स्वत्व नहीं रखते, उन्हें संतोंका पद प्राप्त होता है ।।१४।।

अपनी वर्णाश्रमविहित वृत्तिके द्वारा प्राप्त सामग्रियोंसे प्रतिदिन देवता, ऋषि, मनुष्य, भूत और पितृगणका तथा अपने आत्माका पूजन करना चाहिये। यह एक ही परमेश्वरकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें आराधना है ।।१५।। यदि अपनेको अधिकार आदि यज्ञके लिये आवश्यक सब वस्तुएँ प्राप्त हों तो बड़े-बड़े यज्ञ या अग्निहोत्र आदिके द्वारा भगवान्‌की आराधना करनी चाहिये ।।१६।। युधिष्ठिर! वैसे तो समस्त यज्ञोंके भोक्ता भगवान् ही हैं; परन्तु ब्राह्मणके मुखमें अर्पित किये हुए हविष्यान्नसे उनकी जैसी तृप्ति होती है, वैसी अग्निके मुखमें हवन करनेसे नहीं ।।१७।।

तस्माद् ब्राह्मणदेवेषु मर्त्यादिषु यथार्हतः । तैस्तैः कामैर्यजस्वैनं क्षेत्रज्ञं ब्राह्मणाननु ।।१८

कुर्यादापरपक्षीयं मासि प्रौष्ठपदे द्विजः ।

श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

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श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

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श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

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Here is the exact transcript:

श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

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श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

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माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

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श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

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Okay:

श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये ।
चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।
चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे ।
राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः ।
तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः ।
कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

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श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये ।
चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।
चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे ।
राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः ।
तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः ।
कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

एषु स्नानं जपो होमो व्रतं देवद्विजार् archanam... -> देवद्विजार् archanam?

Wait, देवद्विजार् + चनम्! Let me output:

श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये ।
चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।
चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे ।
राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः ।
तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः ।
कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

एषु स्नानं जपो होमो व्रतं देवद्विजार् archanam...

Let's just output the final text accurately.

श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघं तदायुषः ।।२४

एषु स्नानं जपो होमो व्रतं देवद्विजार् archanam: एषु स्नानं जपो होमो व्रतं देवद्विजार् archanam

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श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।१९

अयने विषुवे कुर्याद् व्यतीपाते दिनक्षये । चन्द्रादित्योपरागे च द्वादशीश्रवणेषु च ।।२०

तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ।।२१

माघे च सितसप्तम्यां मघाराकासमागमे । राकया चानुमत्या वा मासर्क्षाणि युतान्यपि ।।२२

द्वादश्यामनुराधा स्याच्छ्रवणस्तिस्र उत्तराः । तिसृष्वेकादशी वासु जन्मर्क्षश्रोणियोगयुक् ।।२३

त एते श्रेयसः काला नृणां श्रेयोविवर्धनाः । कुर्यात् सर्वात्मनैतेषु श्रेयोऽमोघ

या श्रवण नक्षत्रसे योग—ये सारे समय पितृगणोंका श्राद्ध करने योग्य एवं श्रेष्ठ हैं। ये योग केवल श्राद्धके लिये ही नहीं, सभी पुण्यकर्मोंके लिये उपयोगी हैं। ये कल्याणकी साधनाके उपयुक्त और शुभकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं। इन अवसरोंपर अपनी पूरी शक्ति लगाकर शुभ कर्म करने चाहिये। इसीमें जीवनकी सफलता है ।।२०-२४।। इन शुभ संयोगोंमें जो स्नान, जप, होम, व्रत तथा देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा की जाती है अथवा जो कुछ देवता, पितर, मनुष्य एवं प्राणियोंको समर्पित किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है ।।२५।। युधिष्ठिर! इसी प्रकार स्त्रीके पुंसवन आदि, सन्तानके जातकर्मादि तथा अपने यज्ञ-दीक्षा आदि संस्कारोंके समय, शव-दाहके दिन या वार्षिक श्राद्धके उपलक्ष्यमें अथवा अन्य मांगलिक कर्मोंमें दान आदि शुभकर्म करने चाहिये ।।२६।।

अथ देशान्प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेयआवहान् । स वै पुण्यतमो देशः सत्पात्रं यत्र लभ्यते ॥२७

बिम्बं भगवतो यत्र सर्वमेतच्चराचरम् । यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम् ॥२८

यत्र यत्र हरेरर्चा स देशः श्रेयसां पदम् । यत्र गङ्गादयो नद्यः पुराणेषु च विश्रुताः ॥२९

सरांसि पुष्करादीनि क्षेत्राण्यर्हाश्रितान्युत । कुरुक्षेत्रं गयशिरः प्रयागः पुलहाश्रमः ॥३०

नैमिषं फाल्गुनं सेतुः प्रभासोऽथ कुशस्थली । वाराणसी मधुपुरी पम्पा बिन्दुसरस्तथा ॥३१

नारायणाश्रमो नन्दा सीतारामश्रमादयः । सर्वे कुलाचला राजन्महेन्द्रमलयादयः ॥३२

एते पुण्यतमा देशा हरेरर्चाश्रिताश्च ये । एतान्देशान् निषेवेत श्रेयस्कामो ह्यभीक्ष्णशः । धर्मो ह्यत्रेहितः पुंसां सहस्राधिकफलोदयः ॥३३

पात्रं त्वत्र निरुक्तं वै कविभिः पात्रवित्तमैः । हरिरेवैक उर्वीश यन्मयं वै चराचरम् ॥३४

देवर्ष्र्यर्हत्सु वै सत्सु तत्र ब्रह्मात्मजादिषु ।
राजन्यदग्रपूजायां मतः पात्रतयाच्युतः ॥३५

जीवराशिभिराकीर्ण आण्डकोशाङ्घ्रिपो महान् ।
तन्मूलत्वादच्युतेज्या सर्वजीवात्मतर्पणम् ॥३६

पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः ।
शेते जीवेन रूपेण पुरेषु पुरुषो ह्यसौ ॥३७

युधिष्ठिर! अब मैं उन स्थानोंका वर्णन करता हूँ, जो धर्म आदि श्रेयकी प्राप्ति करानेवाले हैं। सबसे पवित्र देश वह है, जिसमें सत्पात्र मिलते हों ॥२७॥

जिनमें यह सारा चर और अचर जगत् स्थित है, उन भगवान्की प्रतिमा जिस देशमें हो, जहाँ तप, विद्या एवं दया आदि गुणोंसे युक्त ब्राह्मणोंके परिवार निवास करते हों तथा जहाँ-जहाँ भगवान्की पूजा होती हो और पुराणोंमें प्रसिद्ध गंगा आदि नदियाँ हों, वे सभी स्थान परम कल्याणकारी हैं ॥२८-२९॥

पुष्कर आदि सरोवर, सिद्ध पुरुषोंके द्वारा सेवित क्षेत्र, कुरुक्षेत्र, गया, प्रयाग, पुलहाश्रम (शालग्राम क्षेत्र), नैमिषारण्य, फाल्गुनक्षेत्र, सेतुबन्ध, प्रभास, द्वारका, काशी, मथुरा, पम्पासर, बिन्दुसरोवर, बदरिकाश्रम, अलकनन्दा, भगवान् सीतारामजीके आश्रम—अयोध्या, चित्रकूटादि, महेन्द्र और मलय आदि समस्त कुलपर्वत और जहाँ-जहाँ भगवान्के अर्चावतार हैं—वे सब-के-सब देश अत्यन्त पवित्र हैं। कल्याणकामी पुरुषको बार-बार इन देशोंका सेवन करना चाहिये। इन स्थानोंपर जो पुण्यकर्म किये जाते हैं, मनुष्योंको उनका हजारगुना फल मिलता है ॥३०-३३॥

युधिष्ठिर! पात्रनिर्णयके प्रसंगमें पात्रके गुणोंको जाननेवाले विवेकी पुरुषोंने एकमात्र भगवान्को ही सत्पात्र बतलाया है। यह चराचर जगत् उन्हींका स्वरूप है ॥३४॥

अभी तुम्हारे इसी यज्ञकी बात है; देवता, ऋषि, सिद्ध और सनकादिकोंके रहनेपर भी अग्रपूजाके लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही पात्र समझा गया ॥३५॥

असंख्य जीवोंसे भरपूर इस ब्रह्माण्डरूप महावृक्षके एकमात्र मूल भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। इसलिये उनकी पूजासे समस्त जीवोंकी आत्मा तृप्त हो जाती है ॥३६॥

उन्होंने मनुष्य, पशु-पक्षी, ऋषि और देवता आदिके शरीररूप पुरोंकी रचना की है तथा वे ही इन पुरोंमें जीवरूपसे शयन भी करते हैं। इसीसे उनका एक नाम ‘पुरुष’ भी है ॥३७॥

तेष्वेषु भगवान् राजंस्तारतम्येन वर्तते ।
तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥३८

दृष्ट्वा तेषां मिथो नृणामवज्ञानात्मतां नृप । त्रेतादिषु हरेरर्चा क्रियायै कविभिः कृता ॥३९

ततोऽर्चायां हरिं केचित् संश्रद्धाय सपर्यया । उपासत उपास्तापि नार्थदा पुरुषद्विषाम् ॥४०

पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः । तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥४१

नन्वस्य ब्राह्मणा राजन्कृष्णस्य जगदात्मनः । पूनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥४२

युधिष्ठिर! एकरस रहते हुए भी भगवान् इन मनुष्यादि शरीरोंमें उनकी विभिन्नताके कारण न्यूनाधिकरूपसे प्रकाशमान हैं। इसलिये पशु-पक्षी आदि शरीरोंकी अपेक्षा मनुष्य ही श्रेष्ठ पात्र हैं और मनुष्योंमें भी, जिसमें भगवान्‌का अंश—तप-योगादि जितना ही अधिक पाया जाता है, वह उतना ही श्रेष्ठ है ॥३८॥

युधिष्ठिर! त्रेता आदि युगोंमें जब विद्वानोंने देखा कि मनुष्य परस्पर एक-दूसरेका अपमान आदि करते हैं, तब उन लोगोंने उपासनाकी सिद्धिके लिये भगवान्‌की प्रतिमाकी प्रतिष्ठा की ॥३९॥ तभीसे कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्रीसे प्रतिमामें ही भगवान्‌की पूजा करते हैं। परन्तु जो मनुष्यसे द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमाकी उपासना करनेपर भी सिद्धि नहीं मिल सकती ॥४०॥ युधिष्ठिर! मनुष्योंमें भी ब्राह्मण विशेष सुपात्र माना गया है। क्योंकि वह अपनी तपस्या, विद्या और सन्तोष आदि गुणोंसे भगवान्‌के वेदरूप शरीरको धारण करता है ॥४१॥ महाराज! हमारी और तुम्हारी तो बात ही क्या—ये जो सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण हैं, इनके भी इष्टदेव ब्राह्मण ही हैं। क्योंकि उनके चरणोंकी धूलसे तीनों लोक पवित्र होते रहते हैं ॥४२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे सदाचारनिर्णयो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥


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अथ पञ्चदशोऽध्यायः

गृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन

नारद उवाच

कर्मनिष्ठा द्विजाः केचित् तपोनिष्ठा नृपापरे ।
स्वाध्यायेऽन्ये प्रवचने ये केचिज्ज्ञानयोगयोः ॥१

ज्ञाननिष्ठाय देयानि कव्यान्यानन्त्यमिच्छता ।
दैवे च तदभावे स्यादितरेभ्यो यथार्हतः ॥२

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! कुछ ब्राह्मणोंकी निष्ठा कर्ममें, कुछकी तपस्यामें, कुछकी वेदोंके स्वाध्याय और प्रवचनमें, कुछकी आत्मज्ञानके सम्पादनमें तथा कुछकी योगमें होती है ॥१॥ गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि श्राद्ध अथवा देवपूजाके अवसरपर अपने कर्मका अक्षय फल प्राप्त करनेके लिये ज्ञाननिष्ठ पुरुषको ही हव्य-कव्यका दान करे। यदि वह न मिले तो योगी, प्रवचनकार आदिको यथायोग्य और यथाक्रम देना चाहिये ॥२॥

द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनैकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि श्राद्धे कुर्यान्न विस्तरम् ॥३

देशकालोचितश्रद्धाद्रव्यपात्रार्हणानि च ।
सम्यग् भवन्ति नैतानि¹ विस्तरात् स्वजनार्पणात् ॥४

देशे काले च सम्प्राप्ते मुन्यन्नं² हरिदैवतम् ।
श्रद्धया विधिवत् पात्रे न्यस्तं कामधुगक्षयम् ॥५

देवर्षिपितृभूतेभ्य आत्मने स्वजनाय च ।
अन्नं संविभजन्पश्येत् सर्वं तत् पुरुषात्मकम् ॥६

न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद् धर्मतत्त्ववित् ।
मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया ॥७

नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम् ।

न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य³ यः ।।८

एके कर्ममयान् यज्ञान् ज्ञानिनो यज्ञवित्तमाः । आत्मसंयमनेऽनीहा जुह्वति ज्ञानदीपिते ।।९

द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति । एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम् ।।१०

तस्माद् दैवोपपन्नेन मुन्यन्नेनापि धर्मवित् । सन्तुष्टोऽहरहः कुर्यान्नित्यनैमित्तिकीः क्रियाः ।।११

विधर्मः परधर्मश्च आभास उपमा छलः । अधर्मशाखाः पञ्चेमा धर्मज्ञोऽधर्मवत् त्यजेत् ।।१२

देवकार्यमें दो और पितृकार्यमें तीन अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अत्यन्त धनी होनेपर भी श्राद्धकर्ममें अधिक विस्तार नहीं करना चाहिये ।।३।। क्योंकि सगे-सम्बन्धी आदि स्वजनोंको देनेसे और विस्तार करनेसे देश-कालोचित श्रद्धा, पदार्थ, पात्र और पूजन आदि ठीक-ठीक नहीं हो पाते ।।४।। देश और कालके प्राप्त होनेपर ऋषि-मुनियोंके भोजन करनेयोग्य शुद्ध हविष्यान्न भगवान्‌को भोग लगाकर श्रद्धासे विधिपूर्वक योग्य पात्रको देना चाहिये। वह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होता है ।।५।। देवता, ऋषि, पितर, अन्य प्राणी, स्वजन और अपने-आपको भी अन्नका विभाजन करनेके समय परमात्मस्वरूप ही देखे ।।६।।

धर्मका मर्म जाननेवाला पुरुष श्राद्धमें मांसका अर्पण न करे और न स्वयं ही उसे खाय; क्योंकि पितरोंको ऋषि-मुनियोंके योग्य हविष्यान्नसे जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी पशु-हिंसासे नहीं होती ।।७।। जो लोग सद्धर्मपालनकी अभिलाषा रखते हैं, उनके लिये इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं है कि किसी भी प्राणीको मन, वाणी और शरीरसे किसी प्रकारका कष्ट न दिया जाय ।।८।। इसीसे कोई-कोई यज्ञतत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी ज्ञानके द्वारा प्रज्वलित आत्मसंयमरूप अग्निमें इन कर्ममय यज्ञोंका हवन कर देते हैं और बाह्य कर्म-कलापोंसे उपरत हो जाते हैं ।।९।। जब कोई इन द्रव्यमय यज्ञोंसे यजन करना चाहता है, तब सभी प्राणी डर जाते हैं; वे सोचने लगते हैं कि यह अपने प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दयी मूर्ख मुझे अवश्य मार डालेगा ।।१०।। इसलिये धर्मज्ञ मनुष्यको यही उचित है कि प्रतिदिन प्रारब्धके द्वारा प्राप्त मुनिजनोचित हविष्यान्नसे ही अपने नित्य और नैमित्तिक कर्म करे तथा उसीसे सर्वदा सन्तुष्ट रहे ।।११।।

अधर्मकी पाँच शाखाएँ हैं—विधर्म, परधर्म, आभास, उपमा और छल। धर्मज्ञ पुरुष अधर्मके समान ही इनका भी त्याग कर दे ।।१२।।

धर्मबाधो विधर्मः स्यात् परधर्मोऽन्यचोदितः ।
उपधर्मस्तु पाखण्डो दम्भो वा शब्दभिच्छलः ।।१३

यस्त्विच्छया कृतः पुम्भिराभासो ह्याश्रमात् पृथक् ।
स्वभावविहितो धर्मः कस्य नेष्टः प्रशान्तये ।।१४

धर्मार्थमपि नेहेत यात्रार्थं वाधनो धनम् ।
अनीहानीहमानस्य महाहेरिव वृत्तिदा ।।१५

सन्तुष्टस्य निरीहस्य स्वात्मारामस्य यत् सुखम् ।
कुतस्तत् कामलोभेन धावतोऽर्थेहया दिशः ।।१६

सदा सन्तुष्टमनसः सर्वाः सुखमया१ दिशः ।
शर्कराकण्टकादिभ्यो यथोपानत्पदः शिवम् ।।१७

सन्तुष्टः केन वा राजन्न वर्तेतापि वारिणा ।
औपस्थ्यजैह्वयकार्पण्याद् गृहपालायते जनः ।।१८

असन्तुष्टस्य विप्रस्य तेजो विद्या तपो यशः ।
स्रवन्तीन्द्रियलौल्येन ज्ञानं चैवावकीर्यते ।।१९

कामस्यान्तं च२ क्षुत्तृड्भ्यां क्रोधस्यैतत्फलोदयात् ।
जनो याति न लोभस्य जित्वा भुक्त्वा दिशो भुवः ।।२०

जिस कार्यको धर्मबुद्धिसे करनेपर भी अपने धर्ममें बाधा पड़े, वह 'विधर्म' है। किसी अन्यके द्वारा अन्य पुरुषके लिये उपदेश किया हुआ धर्म 'परधर्म' है। पाखण्ड या दम्भका नाम 'उपधर्म' अथवा 'उपमा' है। शास्त्रके वचनोंका दूसरे प्रकारका अर्थ कर देना 'छल' है ।।१३।। मनुष्य अपने आश्रमके विपरीत स्वेच्छासे जिसे धर्म मान लेता है, वह 'आभास' है। अपने-अपने स्वभावके अनुकूल जो वर्णाश्रमोचित धर्म हैं, वे भला किसे शान्ति नहीं देते ।।१४।। धर्मात्मा पुरुष निर्धन होनेपर भी धर्मके लिये अथवा शरीर-निर्वाहके लिये धन प्राप्त करनेकी चेष्टा न करे। क्योंकि जैसे बिना किसी प्रकारकी चेष्टा किये अजगरकी जीविका चलती ही है, वैसे ही निवृत्ति-परायण पुरुषकी निवृत्ति ही उसकी जीविकाका निर्वाह कर देती है ।।१५।।

जो सुख अपनी आत्मामें रमण करनेवाले निष्क्रिय सन्तोषी पुरुषको मिलता है, वह उस मनुष्यको भला कैसे मिल सकता है, जो कामना और लोभसे धनके लिये हाय-हाय करता

हुआ इधर-उधर दौड़ता फिरता है ॥१६॥ जैसे पैरोंमें जूता पहनकर चलनेवालेको कंकड़ और काँटोंसे कोई डर नहीं होता—वैसे ही जिसके मनमें सन्तोष है, उसके लिये सर्वदा और सब कहीं सुख-ही-सुख है, दुःख है ही नहीं ॥१७॥ युधिष्ठिर! न जाने क्यों मनुष्य केवल जलमात्रसे ही सन्तुष्ट रहकर अपने जीवनका निर्वाह नहीं कर लेता। अपितु रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रियके फेरमें पड़कर यह बेचारा घरकी चौकसी करनेवाले कुत्तेके समान हो जाता है ॥१८॥ जो ब्राह्मण सन्तोषी नहीं है, इन्द्रियोंकी लोलुपताके कारण उसके तेज, विद्या, तपस्या और यश क्षीण हो जाते हैं और वह विवेक भी खो बैठता है ॥१९॥ भूख और प्यास मिट जानेपर खाने-पीनेकी कामनाका अन्त हो जाता है। क्रोध भी अपना काम पूरा करके शान्त हो जाता है। परन्तु यदि मनुष्य पृथ्वीकी समस्त दिशाओंको जीत ले और भोग ले, तब भी लोभका अन्त नहीं होता ॥२०॥

पण्डिता बहवो राजन्बहुज्ञाः संशयच्छिदः । सदसस्पतयोऽप्येके असन्तोषात् पतन्त्यधः ॥२१

असङ्कल्पाज्जयैत् कामं क्रोधं कामविवर्जनात् । अर्थानर्थेक्षया लोभं भयं तत्त्वावमर्शनात् ॥२२

आन्वीक्षिक्या शोकमोहौ दम्भं महदुपासया । योगान्तरायान् मौनेन हिंसां कायाद्यनीहया ॥२३

कृपया भूतजं दुःखं दैवं जह्यात् समाधिना । आत्मजं योगवीर्येण निद्रां सत्त्वनिषेवया ॥२४

रजस्तमश्च सत्त्वेन सत्त्वं चोपशमेन च । एतत् सर्वं गुरौ भक्त्या पुरुषो ह्यञ्जसा जयेत् ॥२५

यस्य साक्षाद् भगवति ज्ञानदीपप्रदे गुरौ । मर्त्यासद्धीः श्रुतं तस्य सर्वं कुञ्जरशौचवत् ॥२६

एष वै भगवान्साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वरः । योगेश्वरैर्विमृग्याङ्घ्रिर्लोको यं मन्यते नरम् ॥२७

षड्वर्गसंयमैकान्ताः सर्वा नियमचोदनाः । तदन्ता यदि नो योगान्वावहेयुः श्रमावहाः ॥२८

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अनेक विषयोंके ज्ञाता, शंकाओंका समाधान करके चित्तमें शास्त्रोक्त अर्थको बैठा देनेवाले और विद्वत्सभाओंके सभापति बड़े-बड़े विद्वान् भी असन्तोषके कारण गिर जाते हैं ॥२१॥

धर्मराज! संकल्पोंके परित्यागसे कामको, कामनाओंके त्यागसे क्रोधको, संसारी लोग जिसे 'अर्थ' कहते हैं उसे अनर्थ समझकर लोभको और तत्त्वके विचारसे भयको जीत लेना चाहिये ॥२२॥ अध्यात्मविद्यासे शोक और मोहपर, संतोंकी उपासनासे दम्भपर, मौनके द्वारा योगके विघ्नोंपर और शरीर-प्राण आदिको निश्चेष्ट करके हिंसापर विजय प्राप्त करनी चाहिये ॥२३॥ आधिभौतिक दुःखको दयाके द्वारा, आधिदैविक वेदनाको समाधिके द्वारा और आध्यात्मिक दुःखको योगबलसे एवं निद्राको सात्त्विक भोजन, स्थान, संग आदिके सेवनसे जीत लेना चाहिये ॥२४॥ सत्त्वगुणके द्वारा रजोगुण एवं तमोगुणपर और उपरतिके द्वारा सत्त्वगुणपर विजय प्राप्त करनी चाहिये। श्रीगुरुदेवकी भक्तिके द्वारा साधक इन सभी दोषोंपर सुगमतासे विजय प्राप्त कर सकता है ॥२५॥ हृदयमें ज्ञानका दीपक जलानेवाले गुरुदेव साक्षात् भगवान् ही हैं। जो दुर्बुद्धि पुरुष उन्हें मनुष्य समझता है, उसका समस्त शास्त्र-श्रवण हाथीके स्नानके समान व्यर्थ है ॥२६॥ बड़े-बड़े योगेश्वर जिनके चरणकमलोंका अनुसन्धान करते रहते हैं, प्रकृति और पुरुषके अधीश्वर वे स्वयं भगवान् ही गुरुदेवके रूपमें प्रकट हैं। इन्हें लोग भ्रमसे मनुष्य मानते हैं ॥२७॥

शास्त्रोंमें जितने भी नियमसम्बन्धी आदेश हैं, उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—इन छः शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली जाय अथवा पाँचों इन्द्रिय और मन—ये छः वशमें हो जायें। ऐसा होनेपर भी यदि उन नियमोंके द्वारा भगवान्‌के ध्यान-चिन्तन आदिकी प्राप्ति नहीं होती, तो उन्हें केवल श्रम-ही-श्रम समझना चाहिये ॥२८॥

यथा वार्तादयो ह्यर्था योगस्यार्थं न बिभ्रति ।
अनर्थाय भवेयुस्ते पूर्तमिष्टं तथासत: ॥२९

यश्चित्तविजये यत्तः स्यान्निःसङ्गोऽपरिग्रहः ।
एको विविक्तशरणो भिक्षुर्भिक्षामिताशनः ॥३०

देशे शुचौ समे राजन्संस्थाप्यासनमात्मनः ।
स्थिरं समं सुखं तस्मिन्नासीतर्ध्वङ्ग ओमिति ॥३१

प्राणापानौ सन्निरुन्ध्यात् पूरककुम्भकरेचकैः ।
यावन्मनस्त्यजेत् कामान् स्वनासाग्रनिरीक्षणः ॥३२

यतो यतो निःसरति मनः कामहतं भ्रमत् ।

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ततस्तत उपाहृत्य हृदि रुन्ध्याच्छनैर्बुधः ।।३३

एवमभ्यसतश्चित्तं कालेनाल्पीयसा यतेः । अनि‍शं तस्य निर्वाणं यात्यनिन्धनवह्निवत् ।।३४

कामादिभिरनाविद्धं प्रशान्ताखिलवृत्ति यत् । चित्तं ब्रह्मसुखस्पृष्टं नैवोत्तिष्ठेत कर्हिचित् ।।३५

यः प्रव्रज्य गृहात् पूर्वं त्रिवर्गाद्वपनात् पुनः । यदि सेवेत तान्भिक्षुः स वै वान्ताश्यपत्रपः ।।३६

जैसे खेती, व्यापार आदि और उनके फल भी योग-साधनाके फल भगवत्प्राप्ति या मुक्तिको नहीं दे सकते—वैसे ही दुष्ट पुरुषके श्रौत-स्मार्त कर्म भी कल्याणकारी नहीं होते, प्रत्युत उलटा फल देते हैं ।।२९।।

जो पुरुष अपने मनपर विजय प्राप्त करनेके लिये उद्यत हो, वह आसक्ति और परिग्रहका त्याग करके संन्यास ग्रहण करे। एकान्तमें अकेला ही रहे और भिक्षा-वृत्तिसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये स्वल्प और परिमित भोजन करे ।।३०।।

युधिष्ठिर! पवित्र और समान भूमिपर अपना आसन बिछाये और सीधे स्थिर-भावसे समान और सुखकर आसनसे उसपर बैठकर ॐ कारका जप करे ।।३१।।

जबतक मन संकल्प-विकल्पोंको छोड़ न दे, तबतक नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर पूरक, कुम्भक और रेचकद्वारा प्राण तथा अपानकी गतिको रोके ।।३२।।

कामकी चोटसे घायल चित्त इधर-उधर चक्कर काटता हुआ जहाँ-जहाँ जाय, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वहाँ-वहाँसे उसे लौटा लाये और धीरे-धीरे हृदयमें रोके ।।३३।।

जब साधक निरन्तर इस प्रकारका अभ्यास करता है, तब ईंधनके बिना जैसे अग्नि बुझ जाती है, वैसे ही थोड़े समयमें उसका चित्त शान्त हो जाता है ।।३४।।

इस प्रकार जब काम-वासनाएँ चोट करना बंद कर देती हैं और समस्त वृत्तियाँ अत्यन्त शान्त हो जाती हैं, तब चित्त ब्रह्मानन्दके संस्पर्शमें मग्न हो जाता है और फिर उसका कभी उत्थान नहीं होता ।।३५।।

जो संन्यासी पहले तो धर्म, अर्थ और कामके मूल कारण गृहस्थाश्रमका परित्याग कर देता है और फिर उन्हींका सेवन करने लगता है, वह निर्लज्ज अपने उगले हुएको खानेवाला कुत्ता ही है ।।३६।।

यैः स्वदेहः स्मृतो नात्मा मर्त्यो विट्कृमिभस्मसात् । त एनमात्मसात्कृत्वा श्लाघयन्ति ह्यसत्तमाः ।।३७

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गृहस्थस्य क्रियात्यागो व्रतत्यागो वटोरपि । तपस्विनो ग्रामसेवा भिक्षोरिन्द्रियलोलता ।।३८

आश्रमापसदा ह्येते खल्वाश्रमविडम्बकाः । देवमायाविमूढांस्तानपेक्षेतानुकम्पया ।।३९

आत्मानं चेद् विजानीयात् परं ज्ञानधुताशयः । किमिच्छन्कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः ।।४०

आहुः शरीरं रथमिन्द्रियाणि हयानभीषून् मन इन्द्रियेशम् । वर्त्मानि मात्रा धिषणां च सूतं सत्त्वं बृहद् बन्धुरमीशसृष्टम् ।।४१

अक्षं दशप्राणमधर्मधर्मौ चक्रेऽभिमानं रथिनं च जीवम् । धनुर्हि तस्य प्रणवं पठन्ति शरं तु जीवं परमेव लक्ष्यम् ।।४२

रागो द्वेषश्च लोभश्च शोकमोहौ भयं मदः । मानोऽवमानोऽसूया च माया हिंसा च मत्सरः ।।४३

रजः प्रमादः क्षुन्निद्रा शत्रवस्त्वेवमादयः । रजस्तमःप्रकृतयः सत्त्वप्रकृतयः क्वचित् ।।४४

यावन्नृकायरथमात्मवशोपकल्पं धत्ते गरिष्ठचरणार्चनया निशातम् ।

जिन्होंने अपने शरीरको अनात्मा, मृत्युग्रस्त और विष्ठा, कृमि एवं राख समझ लिया था—वे ही मूढ़ फिर उसे आत्मा मानकर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं ।।३७।। कर्मत्यागी गृहस्थ, व्रतत्यागी ब्रह्मचारी, गाँवमें रहनेवाला तपस्वी (वानप्रस्थ) और इन्द्रियलोलुप संन्यासी—ये चारों आश्रमके कलंक हैं और व्यर्थ ही आश्रमोंका ढोंग करते हैं। भगवान्की मायासे विमोहित उन मूढ़ोंपर तरस खाकर उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ।।३८-३९।। आत्मज्ञानके द्वारा जिसकी सारी वासनाएँ निर्मूल हो गयी हैं और जिसने अपने

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आत्माको परब्रह्मस्वरूप जान लिया है, वह किस विषयकी इच्छा और किस भोक्ताकी तृप्तिके लिये इन्द्रियलोलुप होकर अपने शरीरका पोषण करेगा? ।।४०।।

उपनिषदोंमें कहा गया है कि शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, इन्द्रियोंका स्वामी मन लगाम है, शब्दादि विषय मार्ग हैं, बुद्धि सारथि है, चित्त ही भगवान्‌के द्वारा निर्मित बाँधनेकी विशाल रस्सी है, दस प्राण धुरी हैं, धर्म और अधर्म पहिये हैं और इनका अभिमानी जीव रथी कहा गया है। ॐ कार ही उस रथीका धनुष है, शुद्ध जीवात्मा बाण और परमात्मा लक्ष्य है। (इस ॐ कारके द्वारा अन्तरात्माको परमात्मामें लीन कर देना चाहिये) ।।४१-४२।।

राग, द्वेष, लोभ, शोक, मोह, भय, मद, मान, अपमान, दूसरेके गुणोंमें दोष निकालना, छल, हिंसा, दूसरेकी उन्नति देखकर जलना, तृष्णा, प्रमाद, भूख और नींद—ये सब, और ऐसे ही जीवोंके और भी बहुत-से शत्रु हैं। उनमें रजोगुण और तमोगुणप्रधान वृत्तियाँ अधिक हैं, कहीं-कहीं कोई-कोई सत्त्वगुणप्रधान ही होती हैं ।।४३-४४।।

यह मनुष्य-शरीररूप रथ जबतक अपने वशमें है और इसके इन्द्रिय मन-आदि सारे साधन अच्छी दशामें विद्यमान हैं, तभीतक श्रीगुरुदेवके चरणकमलोंकी सेवा-पूजासे शान धरायी हुई ज्ञानकी तीखी तलवार लेकर भगवान्‌के आश्रयसे इन शत्रुओंका नाश करके अपने स्वराज्य-सिंहासनपर विराजमान हो जाय और फिर अत्यन्त शान्तभावसे इस शरीरका भी परित्याग कर दे ।।४५।। नहीं तो, तनिक भी प्रमाद हो जानेपर ये इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़े और उनसे मित्रता रखनेवाला बुद्धिरूप सारथि रथके स्वामी जीवको उलटे रास्ते ले जाकर विषयरूपी लुटेरोंके हाथोंमें डाल देंगे। वे डाकू सारथि और घोड़ोंके सहित इस जीवको मृत्युसे अत्यन्त भयावने घोर अन्धकारमय संसारके कुएँमें गिरा देंगे ।।४६।।

ज्ञानासिमच्युतबलो दधदस्तशत्रुः
स्वाराज्यतुष्ट उपशान्त इदं१ विजह्यात् ।।४५

नो चेत् प्रमत्तमसदिन्द्रियवाजिसूता
नीत्वोत्पथं विषयदस्युषु निक्षिपन्ति ।
ते दस्यवः सहयसूतमिमं तमोऽन्धे
संसारकूप उरुमृत्युभये क्षिपन्ति ।।४६

प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।
आवर्तते२ प्रवृत्तेन निवृत्तेनाश्नुतेऽमृतम् ।।४७

हिंस्रं द्रव्यमयं काम्यमग्निहोत्राद्यशान्तिदम् ।
दर्शश्च पूर्णमासश्च चातुर्मास्यं पशुः३ सुतः ।।४८

एतदिष्टं प्रवृत्ताख्यं हुतं प्रहुतमेव च । पूर्तं सुरालयारामकूपाजीव्यादिलक्षणम् ॥४९

द्रव्यसूक्ष्मविपाकश्च धूमो रात्रिरपक्षयः । अयनं दक्षिणं सोमो दर्श ओषधिवीरुधः ॥५०

अन्नं रेत इति क्ष्मेश पितृयानं पुनर्भवः । एकैकश्येनानुपूर्वं भूत्वा भूत्वेह जायते ॥५१

वैदिक कर्म दो प्रकारके हैं—एक तो वे जो वृत्तियोंको उनके विषयोंकी ओर ले जाते हैं—प्रवृत्तिपरक और दूसरे वे जो वृत्तियोंको उनके विषयोंकी ओरसे लौटाकर शान्त एवं आत्म-साक्षात्कारके योग्य बना देते हैं—निवृत्तिपरक। प्रवृत्तिपरक कर्ममार्गसे बार-बार जन्म-मृत्युकी प्राप्ति होती है और निवृत्तिपरक भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्गके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति होती है ॥४७॥ श्येनयागादि हिंसामय कर्म, अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुयाग, सोमयाग, वैश्वदेव, बलिहरण आदि द्रव्यमय कर्म ‘इष्ट’ कहलाते हैं और देवालय, बगीचा, कुआँ आदि बनवाना तथा प्याऊ आदि लगाना ‘पूर्तकर्म’ हैं। ये सभी प्रवृत्तिपरक कर्म हैं और सकामभावसे युक्त होनेपर अशान्तिके ही कारण बनते हैं ॥४८-४९॥ प्रवृत्तिपरायण पुरुष मरनेपर चरु-पुरोडाशादि यज्ञ-सम्बन्धी द्रव्योंके सूक्ष्मभागसे बना हुआ शरीर धारणकर धूमाभिमानी देवताओंके पास जाता है। फिर क्रमशः रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके अभिमानी देवताओंके पास जाकर चन्द्रलोकमें पहुँचता है। वहाँसे भोग समाप्त होनेपर अमावस्याके चन्द्रमाके समान क्षीण होकर वृष्टिद्वारा क्रमशः ओषधि, लता, अन्न और वीर्यके रूपमें परिणत होकर पितृयान-मार्गसे पुनः संसारमें ही जन्म लेता है ॥५०-५१॥

निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृतो द्विजः । इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान् ज्ञानदीपेषु जुह्वति ॥५२

इन्द्रियाणि मनस्यूर्मौ वाचि वैकारिकं मनः । वाचं वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् । ओङ्कारं बिन्दौ नादे तं तं तु प्राणे महत्यमुम् ॥५३

अग्निः सूर्यो दिवा प्राह्नः शुक्लो राकोत्तरं स्वराट् । विश्वश्च१ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयात् ॥५४

देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वानुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥५५ **ebook converter DEMO Watermarks***

य एते पितृदेवानामयने वेदनिर्मिते ।
शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि² न मुह्यति ।।५६

युधिष्ठिर! गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त सम्पूर्ण संस्कार जिनके होते हैं, उनको ‘द्विज’ कहते हैं। (उनमेंसे कुछ तो पूर्वोक्त प्रवृत्तिमार्गका अनुष्ठान करते हैं और कुछ आगे कहे जानेवाले निवृत्तिमार्गका।) निवृत्तिपरायण पुरुष इष्ट, पूर्त्त आदि कर्मोंसे होनेवाले समस्त यज्ञोंको विषयोंका ज्ञान करानेवाले इन्द्रियोंमें हवन कर देता है ।।५२।। इन्द्रियोंको दर्शनादि-संकल्परूप मनमें, वैकारिक मनको परा वाणीमें और परा वाणीको वर्णसमुदायमें, वर्णसमुदायको ‘अ उ म्’ इन तीन स्वरोंके रूपमें रहनेवाले ॐ कारमें, ॐ कारको बिन्दुमें, बिन्दुको नादमें, नादको सूत्रात्मारूप प्राणमें तथा प्राणको ब्रह्ममें लीन कर देता है ।।५३।। वह निवृत्तिनिष्ठ ज्ञानी क्रमशः अग्नि, सूर्य, दिन, सायंकाल, शुक्लपक्ष, पूर्णमासी और उत्तरायणके अभिमानी देवताओंके पास जाकर ब्रह्मलोकमें पहुँचता है और वहाँके भोग समाप्त होनेपर वह स्थूलोपाधिक ‘विश्व’ अपनी स्थूल उपाधिको सूक्ष्ममें लीन करके सूक्ष्मोपाधिक ‘तैजस’ हो जाता है। फिर सूक्ष्म उपाधिको कारणमें लय करके कारणोपाधिक ‘प्राज्ञ’ रूपसे स्थित होता है; फिर सबके साक्षीरूपसे सर्वत्र अनुगत होनेके कारण साक्षीके ही स्वरूपमें कारणोपाधिका लय करके ‘तुरीय’ रूपसे स्थित होता है। इस प्रकार दृश्योंका लय हो जानेपर वह शुद्ध आत्मा रह जाता है। यही मोक्षपद है ।।५४।। इसे ‘देवयान’ मार्ग कहते हैं। इस मार्गसे जानेवाला आत्मोपासक संसारकी ओरसे निवृत्त होकर क्रमशः एकसे दूसरे देवताके पास होता हुआ ब्रह्मलोकमें जाकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह प्रवृत्तिमार्गीके समान फिर जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता ।।५५।।

ये पितृयान और देवयान दोनों ही वेदोक्त मार्ग हैं। जो शास्त्रीय दृष्टिसे इन्हें तत्त्वतः जान लेता है, वह शरीरमें स्थित रहता हुआ भी मोहित नहीं होता ।।५६।।

आदावन्ते जनानां सद् बहिरन्तः परावरम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं वचो वाच्यं तमो ज्योतिस्त्वयं स्वयम् ।।५७

आबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः ।
दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम् ।।५८

क्षित्यादीनामिहार्थानां छाया न कतमापि हि ।
न संघातो विकारोऽपि न पृथङ्नान्वितो मृषा ।।५९

धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।
न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यसन्नवयवोऽन्ततः ।।६०