भारतकोश
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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

अथाष्टमोऽध्यायः समुद्रसे अमृतका प्रकट होना और भगवान्‌का मोहिनी-अवतार ग्रहण करना

श्रीशुक उवाच

पीते गरे वृषाङ्केण प्रीतास्तेऽमरदानवाः।
ममन्थुस्तरसा सिन्धुं हविर्धानी ततोऽभवत् ।। १

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार जब भगवान् शंकरने विष पी लिया, तब देवता और असुरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे फिर नये उत्साहसे समुद्र मथने लगे। तब समुद्रसे कामधेनु प्रकट हुई ।। १।।

तामग्निहोत्रीमृषयो जगृहुर्ब्रह्मवादिनः।
यज्ञस्य देवयानस्य मेध्याय^१ हविषे नृप ।। २

तत उच्चैःश्रवा नाम हयोऽभूच्चन्द्रपाण्डुरः।
तस्मिन्बलिः स्पृहां चक्रे नेन्द्र ईश्वरशिक्षया ।। ३

तत ऐरावतो नाम वारणेन्द्रो विनिर्गतः।
दन्तैश्चतुर्भिः श्वेताद्रेर्हरन्भगवतो^२ महिम् ।। ४

कौस्तुभाख्यमभूद् रत्नं पद्मरागो महोदधेः।
तस्मिन्हरिः स्पृहां चक्रे वक्षोऽलङ्करणे मणौ ।। ५

ततोऽभवत् पारिजातः सुरलोकविभूषणम्।
पूरयत्यर्थिनो योऽर्थैः शश्वद् भुवि यथा भवान् ।। ६

ततश्चाप्सरसो जाता निष्ककण्ठ्यः^३ सुवाससः।
रमण्यः स्वर्गिणां वल्गुगतिलीलावलोकनैः ।। ७

ततश्चाविरभूत् साक्षाच्छ्री रमा भगवत्परा।
रञ्जयन्ती दिशः कान्त्या विद्युत् सौदामनी यथा ।। ८

तस्यां चक्रुः स्पृहां सर्वे ससुरासुरमानवाः । रूपौदार्यवयोवर्णमहिमाक्षिप्तचेतसः ॥९

तस्या आसनमानिन्ये महेन्द्रो महदद्भुतम् । मूर्तिमत्यः सरिच्छ्रेष्ठा हेमकुम्भैर्जलं शुचिः ॥१०

आभिषेचनिका भूमिराहरत् सकलौषधीः । गावः पञ्च पवित्राणि वसन्तो मधुमाधवौ ॥११

वह अग्निहोत्रकी सामग्री उत्पन्न करनेवाली थी। इसलिये ब्रह्मलोकतक पहुँचानेवाले यज्ञके लिये उपयोगी पवित्र घी, दूध आदि प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मवादी ऋषियोंने उसे ग्रहण किया ।।२।। उसके बाद उच्चैःश्रवा नामका घोड़ा निकला। वह चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णका था। बलिने उसे लेनेकी इच्छा प्रकट की। इन्द्रने उसे नहीं चाहा; क्योंकि भगवान्‌ने उन्हें पहलेसे ही सिखा रखा था ।।३।।

तदनन्तर ऐरावत नामका श्रेष्ठ हाथी निकला। उसके बड़े-बड़े चार दाँत थे, जो उज्ज्वलवर्ण कैलासकी शोभाको भी मात करते थे ।।४।। तत्पश्चात् कौस्तुभ नामक पद्मराग मणि समुद्रसे निकली। उस मणिको अपने हृदयपर धारण करनेके लिये अजितभगवान्‌ने लेना चाहा ।।५।। परीक्षित्! इसके बाद स्वर्गलोककी शोभा बढ़ानेवाला कल्पवृक्ष निकला। वह याचकोंकी इच्छाएँ उनकी इच्छित वस्तु देकर वैसे ही पूर्ण करता रहता है, जैसे पृथ्वीपर तुम सबकी इच्छाएँ पूर्ण करते हो ।।६।। तत्पश्चात् अप्सराएँ प्रकट हुईं। वे सुन्दर वस्त्रोंसे सुसज्जित एवं गलेमें स्वर्णहार पहने हुए थीं। वे अपनी मनोहर चाल और विलासभरी चितवनसे देवताओंको सुख पहुँचानेवाली हुईं ।।७।। इसके बाद शोभाकी मूर्ति स्वयं भगवती लक्ष्मीदेवी प्रकट हुईं। वे भगवान्‌की नित्यशक्ति हैं। उनकी बिजलीके समान चमकीली छटासे दिशाएँ जगमगा उठीं ।।८।। उनके सौन्दर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमासे सबका चित्त खिंच गया। देवता, असुर, मनुष्य—सभीने चाहा कि ये हमें मिल जायँ ।।९।। स्वयं इन्द्र अपने हाथों उनके बैठनेके लिये बड़ा विचित्र आसन ले आये। श्रेष्ठ नदियोंने मूर्तिमान् होकर उनके अभिषेकके लिये सोनेके घड़ोंमें भर-भरकर पवित्र जल ला दिया ।।१०।। पृथ्वीने अभिषेकके योग्य सब ओषधियाँ दीं। गौओंने पंचगव्य और वसन्त ऋतुने चैत्र-वैशाखमें होनेवाले सब फूल-फल उपस्थित कर दिये ।।११।।

ऋषयः कल्पयाञ्चक्रुरभिषेकं यथाविधि । जगुर्भद्राणि गन्धर्वा नट्यश्च९ ननृतुर्जगुः ॥१२

मेघा मृदङ्गपणवमुरजानकगोमुखान् । व्यनादयञ्छङ्खवेणुवीणास्तुमुलनिःस्वनान् ॥१३

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ततोऽभिषिषिचुर्देवी श्रियं पद्मकरां सतीम् । दिगिभाः पूर्णकलशैः सूक्तवाक्यैर्द्विजेरितैः ॥१४

समुद्रः पीतकौशेयवाससी समुपाहरत् । वरुणः स्रजं वैजयन्तीं मधुना मत्तषट्पदाम् ॥१५

भूषणानि विचित्राणि विश्वकर्मा प्रजापतिः । हारं सरस्वती पद्ममजो नागाश्च कुण्डले ॥१६

ततः कृतस्वस्त्ययनोत्पलस्रजं नद्धद्विरेफां परिगृह्य पाणिना । चचाल वक्त्रं सुकपोलकुण्डलं सव्रीडहासं दधती सुशोभनम् ॥१७

स्तनद्वयं चातिकृशोदरी समं निरन्तरं चन्दनकुङ्कुमोक्षितम् । ततस्ततो नूपुरवल्गुशिञ्जितै- र्विसर्पती हेमलतेव सा बभौ ॥१८

विलोकयन्ती निरवद्यमात्मनः पदं ध्रुवं चाव्यभिचारिसद्गुणम्² । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धचारण- त्रैविष्टपेयादिषु नान्वविन्दत ॥१९

इन सामग्रियोंसे ऋषियोंने विधिपूर्वक उनका अभिषेक सम्पन्न किया। गन्धर्वोंने मंगलमय संगीतकी तान छेड़ दी। नर्तकियाँ नाच-नाचकर गाने लगीं ।।१२।। बादल सदेह होकर मृदंग, डमरू, ढोल, नगारे, नरसिंगे, शंख, वेणु और वीणा बड़े जोरसे बजाने लगे ।।१३।। तब भगवती लक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लेकर सिंहासनपर विराजमान हो गयीं। दिग्गजोंने जलसे भरे कलशोंसे उनको स्नान कराया। उस समय ब्राह्मणगण वेदमन्त्रोंका पाठ कर रहे थे ।।१४।।

समुद्रने पीले रेशमी वस्त्र उनको पहननेके लिये दिये। वरुणने ऐसी वैजयन्ती माला समर्पित की, जिसकी मधुमय सुगन्धसे भौंरे मतवाले हो रहे थे ।।१५।। प्रजापति विश्वकर्माने भाँति-भाँतिके गहने, सरस्वतीने मोतियोंका हार, ब्रह्माजीने कमल और नागोंने दो कुण्डल समर्पित किये ।।१६।।

इसके बाद लक्ष्मीजी ब्राह्मणोंके स्वस्त्ययन-पाठ कर चुकनेपर अपने हाथोंमें कमलकी ebook converter DEMO Watermarks*

माला लेकर उसे सर्वगुणसम्पन्न पुरुषके गलेमें डालने चलीं। मालाके आसपास उसकी सुगन्धसे मतवाले हुए भौंरे गुंजार कर रहे थे। उस समय लक्ष्मीजीके मुखकी शोभा अवर्णनीय हो रही थी। सुन्दर कपोलोंपर कुण्डल लटक रहे थे। लक्ष्मीजी कुछ लज्जाके साथ मन्द-मन्द मुस्करा रही थीं ।।१७।। उनकी कमर बहुत पतली थी। दोनों स्तन बिल्कुल सटे हुए और सुन्दर थे। उनपर चन्दन और केसरका लेप किया हुआ था। जब वे इधर-उधर चलती थीं, तब उनके पायजेबसे बड़ी मधुर झनकार निकलती थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई सोनेकी लता इधर-उधर घूम-फिर रही है ।।१८।। वे चाहती थीं कि मुझे कोई निर्दोष और समस्त उत्तम गुणोंसे नित्ययुक्त अविनाशी पुरुष मिले तो मैं उसे अपना आश्रय बनाऊँ, वरण करूँ। परन्तु गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध, चारण, देवता आदिमें कोई भी वैसा पुरुष उन्हें न मिला ।।१९।।

नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतोव्यपाश्रयः ॥२०

धर्मः क्वचित् तत्र न भूतसौहृदं त्यागः क्वचित् तत्र न मुक्तिकारणम् । वीर्यं न पुंसोऽस्त्यजवेगनिष्कृतं न हि द्वितीयो गुणसङ्गवर्जितः ।।२१

क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः । यत्रोभयं कुत्र च सोऽप्यमङ्गलः सुमङ्गलः कश्च न काङ्क्षते हि माम् ।।२२

एवं विमृश्याव्यभिचारिसद्गुणै- र्वरं निजैकाश्रयतागुणाश्रयम्१ । वव्रे वरं सर्वगुणैरपेक्षितं रमा मुकुन्दं निरपेक्षमीप्सितम् ।।२३

तस्यांसदेश उशतीं नवकञ्जमालां माद्यन्मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टाम् । तस्थौ निधाय निकटे तदुरः स्वधाम सव्रीडहासविकसन्नयनेन याता ।।२४

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(वे मन-ही-मन सोचने लगीं कि) कोई तपस्वी तो हैं, परन्तु उन्होंने क्रोधपर विजय नहीं प्राप्त की है। किन्हींमें ज्ञान तो है, परन्तु वे पूरे अनासक्त नहीं हैं। कोई-कोई हैं तो बड़े महत्त्वशाली, परन्तु वे कामको नहीं जीत सके हैं। किन्हींमें ऐश्वर्य भी बहुत है; परन्तु वह ऐश्वर्य ही किस कामका, जब उन्हें दूसरोंका आश्रय लेना पड़ता है ।।२०।। किन्हींमें धर्माचरण तो है; परन्तु प्राणियोंके प्रति वे प्रेमका पूरा बर्ताव नहीं करते। त्याग तो है, परन्तु केवल त्याग ही तो मुक्तिका कारण नहीं है। किन्हीं-किन्हींमें वीरता तो अवश्य है, परन्तु वे भी कालके पंजेसे बाहर नहीं हैं। अवश्य ही कुछ महात्माओंमें विषयासक्ति नहीं है, परन्तु वे तो निरन्तर अद्वैत-समाधिमें ही तल्लीन रहते हैं ।।२१।। किसी-किसी ऋषिने आयु तो बहुत लंबी प्राप्त कर ली है, परन्तु उनका शील-मंगल भी मेरे योग्य नहीं है। किन्हींमें शील-मंगल भी है परन्तु उनकी आयुका कुछ ठिकाना नहीं। अवश्य ही किन्हींमें दोनों ही बातें हैं, परन्तु वे अमंगल-वेषमें रहते हैं। रहे एक भगवान् विष्णु—उनमें सभी मंगलमय गुण नित्य निवास करते हैं, परन्तु वे मुझे चाहते ही नहीं ।।२२।।

इस प्रकार सोच-विचारकर अन्तमें श्रीलक्ष्मीजीने अपने चिर अभीष्ट भगवान्‌को ही वरके रूपमें चुना; क्योंकि उनमें समस्त सद्गुण नित्य निवास करते हैं। प्राकृत गुण उनका स्पर्श नहीं कर सकते और अणिमा आदि समस्त गुण उनको चाहा करते हैं; परन्तु वे किसीकी भी अपेक्षा नहीं रखते। वास्तवमें लक्ष्मीजीके एकमात्र आश्रय भगवान् ही हैं। इसीसे उन्होंने उन्हींको वरण किया ।।२३।। लक्ष्मीजीने भगवान्‌के गलेमें वह नवीन कमलोंकी सुन्दर माला पहना दी, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड मतवाले मधुकर गुंजार कर रहे थे। इसके बाद लज्जापूर्ण मुसकान और प्रेमपूर्ण चितवनसे अपने निवासस्थान उनके वक्षःस्थलको देखती हुई वे उनके पास ही खड़ी हो गयीं ।।२४।।

तस्याः श्रियस्त्रिजगतो जनको जनन्या वक्षोनिवासमकरोत् परं विभूतेः । श्रीः स्वाः प्रजाः सकरुणेन निरीक्षणेन यत्र स्थतैधयत साधिपतींस्त्रिलोकान् ।।२५

शङ्खतूर्यमृदङ्गानां वादित्राणां पृथुः स्वनः । देवानुगानां सस्त्रीणां नृत्यतां गायतामभूत् ।।२६

ब्रह्मरुद्राङ्गिरोमुख्याः सर्वे विश्वसृजो विभुम् । ईडिरेऽवितथैर्मन्त्रैस्तल्लिङ्गैः पुष्पवर्षिणः ।।२७

श्रिया विलोकिता देवाः सप्रजापतयः प्रजाः । शीलादिगुणसम्पन्ना लेभिरे निर्वृतिं पराम् ।।२८

निःसत्त्वा लोलुपा राजन् निरुद्योगा गतत्रपाः । यदा चोपेक्षिता लक्ष्म्या बभूवुर्दैत्यदानवाः ॥२९

अथासीद् वारुणी देवी कन्या कमललोचना । असुरा जगृहुस्तां वै हरेरनुमतेन ते ॥३०

अथोदधेर्मथ्यमानात् काश्यपैरमृतार्थिभिः । उदतिष्ठन्महाराज पुरुषः परमाद्भुतः ॥३१

दीर्घपीवरदोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽरुणेक्षणः । श्यामलस्तरुणः स्रग्वी सर्वाभरणभूषितः ॥३२

पीतवासा महोरस्कः१ सुमृष्टमणिकुण्डलः । स्निग्धकुञ्चितकेशान्तः२ सुभगः३ सिंहविक्रमः ॥३३

अमृतापूर्णकलशं बिभ्रद् वलयभूषितः । स वै भगवतः साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भवः ॥३४

जगत्पिता भगवान्ने जगज्जननी, समस्त सम्पत्तियोंकी अधिष्ठातृदेवता श्रीलक्ष्मीजीको अपने वक्षःस्थलपर ही सर्वदा निवास करनेका स्थान दिया। लक्ष्मीजीने वहाँ विराजमान होकर अपनी करुणाभरी चितवनसे तीनों लोक, लोकपति और अपनी प्यारी प्रजाकी अभिवृद्धि की ॥२५॥ उस समय शंख, तुरही, मृदंग आदि बाजे बजने लगे। गन्धर्व अप्सराओंके साथ नाचने-गाने लगे। इससे बड़ा भारी शब्द होने लगा ॥२६॥ ब्रह्मा, रुद्र, अंगिरा आदि सब प्रजापति पुष्पवर्षा करते हुए भगवान्के गुण, स्वरूप और लीला आदिके यथार्थ वर्णन करनेवाले मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे ॥२७॥ देवता, प्रजापति और प्रजा—सभी लक्ष्मीजीकी कृपादृष्टिसे शील आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न होकर बहुत सुखी हो गये ॥२८॥ परीक्षित्! इधर जब लक्ष्मीजीने दैत्य और दानवोंकी उपेक्षा कर दी, तब वे लोग निर्बल, उद्योगरहित, निर्लज्ज और लोभी हो गये ॥२९॥ इसके बाद समुद्रमन्थन करनेपर कमलनयनी कन्याके रूपमें वारुणीदेवी प्रकट हुईं। भगवान्की अनुमतिसे दैत्योंने उसे ले लिया ॥३०॥

तदनन्तर महाराज! देवता और असुरोंने अमृतकी इच्छासे जब और भी समुद्रमन्थन किया, तब उसमेंसे एक अत्यन्त अलौकिक पुरुष प्रकट हुआ ॥३१॥ उसकी भुजाएँ लंबी एवं मोटी थीं। उसका गला शङ्खके समान उतार-चढ़ाववाला था और आँखोंमें लालिमा थी। शरीरका रंग बड़ा सुन्दर साँवला-साँवला था। गलेमें माला, अंग-अंग सब प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित, शरीरपर पीताम्बर, कानोंमें चमकीले मणियोंके कुण्डल, चौड़ी छाती,

तरुण अवस्था, सिंहके समान पराक्रम, अनुपम सौन्दर्य, चिकने और घुँघराले बाल लहराते हुए उस पुरुषकी छबि बड़ी अनोखी थी ।।३२-३३।। उसके हाथोंमें कंगन और अमृतसे भरा हुआ कलश था। वह साक्षात् विष्णुभगवान्‌के अंशांश अवतार थे ।।३४।।

धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् । तमालोक्यासुराः सर्वे कलशं चामृताभृतम् ।।३५

लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलशं तरसाहरन् । नीयमानेऽसुरैस्तस्मिन्कलशेऽमृतभाजने ।।३६

विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः । इति तद्देन्यमालोक्य भगवान्भृत्यकामकृत् । मा खिद्यत मिथोऽर्थं वः साधयिष्ये स्वमायया ।।३७

मिथः कलिरभूत्तेषां तदर्थे तर्षचेतसाम् । अहं पूर्वमहं पूर्वं न त्वं न त्वमिति प्रभो ।।३८

देवाः स्वं भागमर्हन्ति ये तुल्यायासहेतवः । सत्रयाग इवैतस्मिन्नेष धर्मः सनातनः ।।३९

इति स्वान्प्रत्यषेधन्वै दैतेया जातमत्सराः । दुर्बलाः प्रबलान् राजन् गृहीतकलाशान् मुहुः ।।४०

एतस्मिन्नन्तरे विष्णुः सर्वोपायविदीश्वरः । योषिद्रूपमनिर्देश्यं दधार परमाद्भुतम् ।।४१

प्रेक्षणीयोत्पलश्यामं सर्वावयवसुन्दरम् । समानकर्णाभरणं सुकपोलोन्नसाननम् ।।४२

नवयौवननिर्वृत्तस्तनभारकृशोदरम् । मुखामोदानुरक्तालिझङ्कारोद्विग्नलोचनम् ।।४३

वे ही आयुर्वेदके प्रवर्तक और यज्ञभोक्ता धन्वन्तरिके नामसे सुप्रसिद्ध हुए। जब दैत्योंकी दृष्टि उनपर तथा उनके हाथमें अमृतसे भरे हुए कलशपर पड़ी, तब उन्होंने शीघ्रतासे बलात् उस अमृतके कलशको छीन लिया। वे तो पहलेसे ही इस ताकमें थे कि किसी तरह

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समुद्रमन्थनसे निकली हुई सभी वस्तुएँ हमें मिल जायँ। जब असुर उस अमृतसे भरे कलशको छीन ले गये, तब देवताओंका मन विषादसे भर गया। अब वे भगवान्‌की शरणमें आये। उनकी दीन दशा देखकर भक्तवाञ्छाकल्पतरु भगवान्‌ने कहा—'देवताओ! तुमलोग खेद मत करो। मैं अपनी मायासे उनमें आपसकी फूट डालकर अभी तुम्हारा काम बना देता हूँ' ॥३५-३७॥

परीक्षित्! अमृतलोलुप दैत्योंमें उसके लिये आपसमें झगड़ा खड़ा हो गया। सभी कहने लगे 'पहले मैं पीऊँगा, पहले मैं; तुम नहीं, तुम नहीं' ॥३८॥ उनमें जो दुर्बल थे, वे उन बलवान् दैत्योंका विरोध करने लगे, जिन्होंने कलश छीनकर अपने हाथमें कर लिया था, वे ईर्ष्यावश धर्मकी दुहाई देकर उनको रोकने और बार-बार कहने लगे कि 'भाई! देवताओंने भी हमारे बराबर ही परिश्रम किया है, उनको भी यज्ञभागके समान इसका भाग मिलना ही चाहिये। यही सनातनधर्म है' ॥३९-४०॥ इस प्रकार इधर दैत्योंमें 'तू-तू, मैं-मैं' हो रही थी और उधर सभी उपाय जाननेवालोंके स्वामी चतुरशिरोमणि भगवान्‌ने अत्यन्त अद्भुत और अवर्णनीय स्त्रीका रूप धारण किया ॥४१॥

शरीरका रंग नील कमलके समान श्याम एवं देखने ही योग्य था। अंग-प्रत्यंग बड़े ही आकर्षक थे। दोनों कान बराबर और कर्णफूलसे सुशोभित थे। सुन्दर कपोल, ऊँची नासिका और रमणीय मुख ॥४२॥ नयी जवानीके कारण स्तन उभरे हुए थे और उन्हींके भारसे कमर पतली हो गयी थी। मुखसे निकलती हुई सुगन्धके प्रेमसे गुनगुनाते हुए भौंरे उसपर टूटे पड़ते थे, जिससे नेत्रोंमें कुछ घबराहटका भाव आ जाता था ॥४३॥

बिभ्रत् स्वकेशभारेण मालामुत्फुल्लमल्लिकाम् ।
सुग्रीवकण्ठाभरणं सुभुजाङ्गदभूषितम् ॥४४

विरजाम्बरसंवीतनितम्बद्वीपशोभया ।
काञ्च्या प्रविलसद्वल्गुचलच्चरणनूपुरम् ॥४५

सव्रीडस्मितविक्षिप्तभ्रूविलासावलोकनैः ।
दैत्ययूथपचेतःसु काममुद्दीपयन् मुहुः ॥४६

अपने लंबे केशपाशोंमें उन्होंने खिले हुए बेलेके पुष्पोंकी माला गूँथ रखी थी। सुन्दर गलेमें कण्ठके आभूषण और सुन्दर भुजाओंमें बाजूबंद सुशोभित थे ॥४४॥ इनके चरणोंके नूपुर मधुर ध्वनिसे रुनझुन-रुनझुन कर रहे थे और स्वच्छ साड़ीसे ढके नितम्बद्वीपपर शोभायमान करधनी अपनी अनूठी छटा छिटका रही थी ॥४५॥ अपनी सलज्ज मुसकान, नाचती हुई तिरछी भौंहें और विलासभरी चितवनसे मोहिनी-रूपधारी भगवान् दैत्यसेनापतियोंके चित्तमें बार-बार कामोद्दीपन करने लगे ॥४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भगवन्मायोपलम्भनं
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नामाष्टमोऽध्यायः ।।८।।

१. प्रा० पा०—मेध्यस्य। २. प्रा० पा०—हरञ्छृङ्गव०। ३. प्रा० पा०—निष्कग्रीवाः। १. प्रा० पा०—नार्यश्च। २. प्रा० पा०—चारस०। १. प्रा० पा०—श्रयसद्गुणा०। १. प्रा० पा०—महास्कन्धः। २. प्रा० पा०—नील०। ३. प्रा० पा०—शुभाङ्गः।

अथ नवमोऽध्यायः मोहिनीरूपसे भगवान्‌के द्वारा अमृत बाँटा जाना

श्रीशुक उवाच

तेऽन्योन्यतोऽसुराः पात्रं हरन्तस्त्यक्तसौहृदाः । क्षिपन्तो दस्युधर्माण आयान्तीं ददृशुः स्त्रियम् ॥१॥

अहो रूपमहो धाम अहो अस्या नवं वयः । इति ते तामभिद्रुत्य पप्रच्छुर्जातहृच्छयाः ॥२॥

का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कुतो वा किं चिकीर्षसि । कस्यासि वद वामोरु मथ्नन्तीव१ मनांसि नः ॥३॥

न वयं त्वामरैर्दैत्यैः सिद्धगन्धर्वचारणैः । नास्पृष्टपूर्वां जानीमो लोकेशैश्च२ कुतो नृभिः ॥४॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! असुर आपसके सद्भाव और प्रेमको छोड़कर एक-दूसरेकी निन्दा कर रहे थे और डाकूकी तरह एक-दूसरेके हाथसे अमृतका कलश छीन रहे थे। इसी बीचमें उन्होंने देखा कि एक बड़ी सुन्दरी स्त्री उनकी ओर चली आ रही है ॥१॥ वे सोचने लगे—‘कैसा अनुपम सौन्दर्य है। शरीरमेंसे कितनी अद्भुत छटा छिटक रही है! तनिक इसकी नयी उम्र तो देखो!’ बस, अब वे आपसकी लाग-डाँट भूलकर उसके पास दौड़ गये। उन लोगोंने काममोहित होकर उससे पूछा— ॥२॥ ‘कमलनयनी! तुम कौन हो? कहाँसे आ रही हो? क्या करना चाहती हो? सुन्दरी! तुम किसकी कन्या हो? तुम्हें देखकर हमारे मनमें खलबली मच गयी है ॥३॥ हम समझते हैं कि अबतक देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व, चारण और लोकपालोंने भी तुम्हें स्पर्शतक न किया होगा। फिर मनुष्य तो तुम्हें कैसे छू पाते? ॥४॥

नूनं त्वं विधिना सुभ्रूः प्रेषितासि शरीरिणाम् । सर्वेन्द्रियमनः प्रीतिं विधातुं सघृणेन किम् ॥५॥

सा त्वं नः स्पर्धमानानामेकवस्तुनि मानिनि । ज्ञातीनां बद्धवैराणां शं विधत्स्व सुमध्यमे ॥६॥

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वयं कश्यपदाय़ादा भ्रातरः कृतपौरुषाः । विभजस्व यथान्यायं नैव भेदो यथा भवेत् ॥७

इत्युपामन्त्रितो दैत्यैर्मायायोषिद्वपुर्हरिः । प्रहस्य रुचिरापाङ्गैर्निरीक्षन्निदमब्रवीत् ॥८

श्रीभगवानुवाच

कथं कश्यपदाय़ादाः पुंश्चल्यां मयि सङ्गताः । विश्वासं पण्डितो जातु कामिनीषु न याति हि ॥९

सालावृकाणां स्त्रीणां च स्वैरिणीनां सुरद्विषः । सख्यान्याहुरनित्यानि नूतनं नूतनं विचिन्वताम् ॥१०

श्रीशुक उवाच

इति ते क्वेलिसैस्तस्या आश्वस्तमनसोऽसुराः । जहसुर्भावगम्भीरं ददुश्चामृतभाजनम् ॥११

ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि- र्बभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा । यद्यभ्युपेतं क्व च साध्वसाधु वा कृतं मया वो विभजे सुधामिमाम् ॥१२

इत्याभिव्याहृतं तस्या आकर्ण्यासुरपुङ्गवाः । अप्रमाणविदस्तस्यास्तत् तथेत्यन्वमंसत ॥१३

सुन्दरी! अवश्य ही विधाताने दया करके शरीरधारियोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं मनको तृप्त करनेके लिये तुम्हें यहाँ भेजा है ॥५॥ मानिनी! वैसे हमलोग एक ही जातिके हैं। फिर भी हम सब एक ही वस्तु चाह रहे हैं, इसलिये हममें डाह और वैरकी गाँठ पड़ गयी है। सुन्दरी! तुम हमारा झगड़ा मिटा दो ॥६॥ हम सभी कश्यपजीके पुत्र होनेके नाते सगे भाई हैं। हमलोगोंने अमृतके लिये बड़ा पुरुषार्थ किया है। तुम न्यायके अनुसार निष्पक्षभावसे इसे बाँट दो, जिससे फिर हमलोगोंमें किसी प्रकारका झगड़ा न हो' ॥७॥ असुरोंने जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब लीलासे स्त्रीवेष धारण करनेवाले भगवान्ने तनिक हँसकर और तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥८॥

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श्रीभगवान्ने कहा—आपलोग महर्षि कश्यपके पुत्र हैं और मैं हूँ कुलटा। आपलोग मुझपर न्यायका भार क्यों डाल रहे हैं? विवेकी पुरुष स्वेच्छाचारिणी स्त्रियोंका कभी विश्वास नहीं करते ॥९॥

दैत्यो! कुत्ते और व्यभिचारिणी स्त्रियोंकी मित्रता स्थायी नहीं होती। वे दोनों ही सदा नये-नये शिकार ढूँढ़ा करते हैं ॥१०॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मोहिनीकी परिहासभरी वाणीसे दैत्योंके मनमें और भी विश्वास हो गया। उन लोगोंने रहस्यपूर्ण भावसे हँसकर अमृतका कलश मोहिनीके हाथमें दे दिया ॥११॥

भगवान्ने अमृतका कलश अपने हाथमें लेकर तनिक मुसकराते हुए मीठी वाणीसे कहा—'मैं उचित या अनुचित जो कुछ भी करूँ, वह सब यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो मैं यह अमृत बाँट सकती हूँ' ॥१२॥

बड़े-बड़े दैत्योंने मोहिनीकी यह मीठी बात सुनकर उसकी बारीकी नहीं समझी, इसलिये सबने एक स्वरसे कह दिया 'स्वीकार है।' इसका कारण यह था कि उन्हें मोहिनीके वास्तविक स्वरूपका पता नहीं था ॥१३॥

अथोपोष्‍य कृतस्नाना हुत्वा च हविषानलम् ।
दत्त्वा गोविप्रभूतेभ्यः कृतस्वस्त्ययना द्विजैः ॥१४

यथोपजोषं वासांसि परिधायाहतानि ते ।
कुशेषु प्राविशन्सर्वे प्रागग्रेष्वभिभूषिताः ॥१५

प्राङ्मुखेषूपविष्टेषु सुरेषु दितिजेषु च ।
धूपामोदितशालायां जुष्टायां माल्यदीपकैः ॥१६

तस्यां नरेन्द्र करभोरुरुशद्दुकूल-
$\quad$श्रोणीतटालसगतिमंदविह्वलाक्षी ।
सा कूजती कनकनूपुरशिञ्जितेन
$\quad$कुम्भस्तनी कलशपाणिरथाविवेश ॥१७

तां श्रीसखीं कनककुण्डलचारुकर्ण-
$\quad$नासाकपोलवदनां परदेवताख्याम् ।
संवीक्ष्य सम्मुमूहुरुत्स्मितवीक्षणेन
$\quad$देवासुरा विगलितस्तनपट्टिकान्ताम् ॥१८

असुराणां सुधादानं सर्पाणामिव दुर्नयम् ।
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मत्वा जातिनृशंसानां न तां व्यभजदच्युतः ॥१९

कल्पयित्वा पृथक् पङ्क्तीरुभयेषां जगत्पतिः । तांश्चोपवेशयामास स्वेषु स्वेषु च पङ्क्तिषु ॥२०

दैत्यान्गृहीतकलशो वञ्चयन्नुपसञ्चरैः । दूरस्थान् पाययामास जरामृत्युहरां सुधाम् ॥२१

इसके बाद एक दिनका उपवास करके सबने स्नान किया। हविष्यसे अग्निमें हवन किया। गौ, ब्राह्मण और समस्त प्राणियोंको घास-चारा, अन्न-धनादिका यथायोग्य दान दिया तथा ब्राह्मणोंसे स्वस्त्ययन कराया ।।१४।। अपनी-अपनी रुचिके अनुसार सबने नये-नये वस्त्र धारण किये और इसके बाद सुन्दर-सुन्दर आभूषण धारण करके सब-के-सब उन कुशासनोंपर बैठ गये, जिनका अगला हिस्सा पूर्वकी ओर था ।।१५।। जब देवता और दैत्य दोनों ही धूपसे सुगन्धित, मालाओं और दीपकोंसे सजे-सजाये भव्य भवनमें पूर्वकी ओर मुँह करके बैठ गये, तब हाथमें अमृतका कलश लेकर मोहिनी सभामण्डपमें आयी। वह एक बड़ी सुन्दर साड़ी पहने हुए थी। नितम्बोंके भारके कारण वह धीरे-धीरे चल रही थी। आँखें मदसे विह्वल हो रही थीं। कलशके समान स्तन और गजशावककी सूँड़के समान जंघाएँ थीं। उसके स्वर्णनूपुर अपनी झनकारसे सभाभवनको मुखरित कर रहे थे ।।१६-१७।। सुन्दर कानोंमें सोनेके कुण्डल थे और उसकी नासिका, कपोल तथा मुख बड़े ही सुन्दर थे। स्वयं परदेवता भगवान् मोहिनीके रूपमें ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मीजीकी कोई श्रेष्ठ सखी वहाँ आ गयी हो । मोहिनीने अपनी मुसकानभरी चितवनसे देवता और दैत्योंकी ओर देखा, तो वे सब-के-सब मोहित हो गये। उस समय उनके स्तनोंपरसे अंचल कुछ खिसक गया था ।।१८।। भगवान्ने मोहिनीरूपमें यह विचार किया कि असुर तो जन्मसे ही क्रूर स्वभाववाले हैं। इनको अमृत पिलाना सर्पोंको दूध पिलानेके समान बड़ा अन्याय होगा। इसलिये उन्होंने असुरोंको अमृतमें भाग नहीं दिया ।।१९।। भगवान्ने देवता और असुरोंकी अलग-अलग पंक्तियाँ बना दीं और फिर दोनोंको कतार बाँधकर अपने-अपने दलमें बैठा दिया ।।२०।। इसके बाद अमृतका कलश हाथमें लेकर भगवान् दैत्योंके पास चले गये। उन्हें हाव-भाव और कटाक्षसे मोहित करके दूर बैठे हुए देवताओंके पास आ गये तथा उन्हें वह अमृत पिलाने लगे, जिसे पी लेनेपर बुढ़ापे और मृत्युका नाश हो जाता है ।।२१।।

ते पालयन्तः समयमसुराः स्वकृतं नृप । तूष्णीमासन्कृतस्नेहाः स्त्रीविवादजुगुप्सया ॥२२

तस्यां कृतातिप्रणयाः प्रणयापायकातराः । बहुमानेन चाबद्धा नोचुः किञ्चन विप्रियम् ॥२३

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देवलिङ्गप्रतिच्छन्नः स्वर्भानुर्देवसंसदि । प्रविष्टः सोममपिबच्चन्द्रार्काभ्यां च सूचितः ॥२४

चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबतः शिरः । हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत् ॥२५

शिरस्त्वमरतां नीतमजो ग्रहमचीक्लृपत् । यस्तु पर्वणि चन्द्रार्कावभिधावति वैरधीः ॥२६

पीतप्रायेऽमृते देवैर्भगवान्ल्लोकभावनः । पश्यतामसुरेन्द्राणां स्वं रूपं जगृहे हरिः१ ॥२७

एवं सुरासुरगणाः समदेशकाल- हेत्वर्थकर्ममतयोऽपि फले विकल्पाः । तत्रामृतं सुरगणाः फलमञ्जसाऽऽपु- र्यत्पादपङ्कजरजःश्रयणान्न दैत्याः ॥२८

परीक्षित्! असुर अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन कर रहे थे। उनका स्नेह भी हो गया था और वे स्त्रीसे झगड़नेमें अपनी निन्दा भी समझते थे। इसलिये वे चुपचाप बैठे रहे ॥२२॥

मोहिनीमें उनका अत्यन्त प्रेम हो गया था। वे डर रहे थे कि उससे हमारा प्रेमसम्बन्ध टूट न जाय। मोहिनीने भी पहले उन लोगोंका बड़ा सम्मान किया था, इससे वे और भी बँध गये थे। यही कारण है कि उन्होंने मोहिनीको कोई अप्रिय बात नहीं कही ॥२३॥

जिस समय भगवान् देवताओंको अमृत पिला रहे थे, उसी समय राहु दैत्य देवताओंका वेष बनाकर उनके बीचमें आ बैठा और देवताओंके साथ उसने भी अमृत पी लिया। परन्तु तत्क्षण चन्द्रमा और सूर्यने उसकी पोल खोल दी ॥२४॥

अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान्ने अपने तीखी धारवाले चक्रसे उसका सिर काट डाला। अमृतका संसर्ग न होनेसे उसका धड़ नीचे गिर गया ॥२५॥

परन्तु सिर अमर हो गया और ब्रह्माजीने उसे 'ग्रह' बना दिया। वही राहु पर्वके दिन (पूर्णिमा और अमावस्याको) वैर-भावसे बदला लेनेके लिये चन्द्रमा तथा सूर्यपर आक्रमण किया करता है ॥२६॥

जब देवताओंने अमृत पी लिया, तब समस्त लोकोंको जीवनदान करनेवाले भगवान्ने बड़े-बड़े दैत्योंके सामने ही मोहिनीरूप त्यागकर अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया ॥२७॥

परीक्षित्! देखो—देवता और दैत्य दोनोंने एक ही समय एक स्थानपर एक प्रयोजन

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तथा एक वस्तुके लिये एक विचारसे एक ही कर्म किया था, परन्तु फलमें बड़ा भेद हो गया। उनमेंसे देवताओंने बड़ी सुगमतासे अपने परिश्रमका फल—अमृत प्राप्त कर लिया, क्योंकि उन्होंने भगवान्‌के चरणकमलोंकी रजका आश्रय लिया था। परन्तु उससे विमुख होनेके कारण परिश्रम करनेपर भी असुरगण अमृतसे वंचित ही रहे ॥२८॥

यद् युज्यतेऽसुवसुकर्ममनोवचोभि- र्देहात्मजादिषु नृभिस्तदसत् पृथक्त्वात् । तैरेव सद् भवति यत् क्रियतेऽपृथक्त्वात् सर्वस्य तद् भवति मूलनिषेचनं यत् ॥२९

मनुष्य अपने प्राण, धन, कर्म, मन और वाणी आदिसे शरीर एवं पुत्र आदिके लिये जो कुछ करता है—वह व्यर्थ ही होता है; क्योंकि उसके मूलमें भेदबुद्धि बनी रहती है। परन्तु उन्हीं प्राण आदि वस्तुओंके द्वारा भगवान्‌के लिये जो कुछ किया जाता है, वह सब भेदभावसे रहित होनेके कारण अपने शरीर, पुत्र और समस्त संसारके लिये सफल हो जाता है। जैसे वृक्षकी जड़में पानी देनेसे उसका तना, टहनियाँ और पत्ते—सब-के-सब सिंच जाते हैं, वैसे ही भगवान्‌के लिये कर्म करनेसे वे सबके लिये हो जाते हैं ॥२९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धेऽमृतमथने नवमोऽध्यायः ॥९॥


१. प्रा० पा०—मथ्नासीव। २. प्रा० पा०—योगेशैश्च।
१. प्रा० पा०—प्रभुः।

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अथ दशमोऽध्यायः

देवासुर-संग्राम

श्रीशुक उवाच

इति दानवदैतेया नाविन्दन्नमृतं नृप ।
युक्ताः कर्मणि यत्ताश्च वासुदेवपराङ्मुखाः ॥१

साधयित्वामृतं राजन्पाययित्वा स्वकान्सुरान् ।
पश्यतां सर्वभूतानां ययौ गरुडवाहनः ॥२

सपत्ननां परामृद्धिं दृष्ट्वा ते दितिनन्दनाः ।
अमृष्यमाणा उत्पेतुर्देवान्प्रत्युद्यतायुधाः ॥३

ततः सुरगणाः सर्वे सुधया पीतयैधिताः ।
प्रतिसंयुयुधुः शस्त्रैर्नारायणपदाश्रयाः ॥४

तत्र दैवासुरो नाम रणः परमदारुणः ।
रोधस्युदन्वतो राजंस्तुमुलो रोमहर्षणः ॥५

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यद्यपि दानवों और दैत्यों ने बड़ी सावधानीसे समुद्रमन्थनकी चेष्टा की थी, फिर भी भगवान्‌से विमुख होनेके कारण उन्हें अमृतकी प्राप्ति नहीं हुई ॥१॥ राजन्! भगवान्‌ने समुद्रको मथकर अमृत निकाला और अपने निजजन देवताओंको पिला दिया। फिर सबके देखते-देखते वे गरुड़पर सवार हुए और वहाँसे चले गये ॥२॥ जब दैत्योंने देखा कि हमारे शत्रुओंको तो बड़ी सफलता मिली तब वे उनकी बढ़ती सह न सके। उन्होंने तुरंत अपने हथियार उठाये और देवताओंपर धावा बोल दिया ॥३॥ इधर देवताओंने एक तो अमृत पीकर विशेष शक्ति प्राप्त कर ली थी और दूसरे उन्हें भगवान्‌के चरणकमलोंका आश्रय था ही। बस, वे भी अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो दैत्योंसे भिड़ गये ॥४॥ परीक्षित्! क्षीरसागरके तटपर बड़ा ही रोमांचकारी और अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ। देवता और दैत्योंकी वह घमासान लड़ाई ही ‘देवासुर-संग्राम’ के नामसे कही जाती है ॥५॥

तत्रान्योन्यं सपत्नास्ते संरब्धमनसो रणे ।
समासाद्यासिभिर्बाणैर्निजघ्नुर्विविधायुधैः ॥६

शङ्खतूर्यमृदङ्गानां भेरीडमरुणां१ महान् । हस्त्यश्वरथपत्तीनां नदतां निःस्वनोऽभवत् ।।७ रथिनो रथिभिस्तत्र पत्तिभिः सह पत्तयः । हया हयैरिभाश्चेभैः समसज्जन्त संयुगे ।।८ उष्ट्रैः केचिदिभैः केचिदपरे युयुधुः खरैः । केचिद् गौरमृगैर्ऋक्षैर्द्धीपिभिर्हरिभिर्भटाः ।।९ गृध्रैः कङ्कबकै रन्ये श्येनभासैस्तिमिङ्गिलैः । शरभैर्महिषैः खड्गैर्गोवृषैर्गवयारुणैः ।।१० शिवाभिराखुभिः केचित् कृकलासैः शशैनरैः२ । बस्तैरेके३ कृष्णसारैर्हंसैरन्ये च सूकरैः ।।११ अन्ये जलस्थलखगैः सत्त्वैर्विकृतविग्रहैः । सेनयोरुभयो राजन्न्विविशुस्तेऽग्रतोऽग्रतः ।।१२ चित्रध्वजपटै राजन्नातपत्रैः सितामलैः । महाधनैर्वज्रदण्डैर्व्यजनैर्बार्हचामरैः४ ।।१३ वातोद्धूतोत्तरोष्णीषैरर्चिर्भिर्वर्मभूषणैः । स्फुरद्भिर्विशदैः शस्त्रैः सुतरां सूर्यरश्मिभिः ।।१४ देवदानववीराणां ध्वजिन्यौ पाण्डुनन्दन । रेजतुर्वीिरमालाभिर्यादसामिव सागरौ ।।१५ वैरोचनो बलिः संख्ये सोऽसुराणां चमूपतिः । यानं वैहायसं नाम कामगं मयनिर्मितम् ।।१६

दोनों ही एक-दूसरेके प्रबल शत्रु हो रहे थे, दोनों ही क्रोधसे भरे हुए थे। एक-दूसरेको आमने-सामने पाकर तलवार, बाण और अन्य अनेकानेक अस्त्र-शस्त्रोंसे परस्पर चोट पहुँचाने लगे ।।६।। उस समय लड़ाईमें शङ्ख, तुरही, मृदंग, नगारे और डमरू बड़े जोरसे बजने लगे; हाथियोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, रथोंकी घरघराहट और पैदल सेनाकी चिल्लाहटसे बड़ा कोलाहल मच गया ।।७।। रणभूमिमें रथियोंके साथ रथी, पैदलके साथ पैदल, घुड़सवारोंके साथ घुड़सवार एवं हाथीवालोंके साथ हाथीवाले भिड़ गये ।।८।। उनमेंसे कोई-कोई वीर ऊँटोंपर, हाथियोंपर और गधोंपर चढ़कर लड़ रहे थे तो कोई-कोई गौरमृग, भालू, बाघ और सिंहोंपर ।।९।। कोई-कोई सैनिक गिद्ध, कंक, बगुले, बाज और भास पक्षियोंपर चढ़े हुए थे तो बहुत-से तिमिङ्गिल मच्छ, शरभ, भैंसे, गैंडे, बैल, नीलगाय और जंगली साँड़ोंपर सवार थे ।।१०।।

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किसी-किसीने सियारिन, चूहे, गिरगिट और खरहोंपर ही सवारी कर ली थी तो बहुत-से मनुष्य, बकरे, कृष्णसार मृग, हंस और सूअरोंपर चढ़े थे ।।११।। इस प्रकार जल, स्थल एवं आकाशमें रहनेवाले तथा देखनेमें भयंकर शरीरवाले बहुत-से प्राणियोंपर चढ़कर कई दैत्य दोनों सेनाओंमें आगे-आगे घुस गये ।।१२।।

परीक्षित्! उस समय रंग-बिरंगी पताकाओं, स्फटिक मणिके समान श्वेत निर्मल छत्रों, रत्नोंसे जड़े हुए दण्डवाले बहुमूल्य पंखों, मोरपंखों, चँवरों और वायुसे उड़ते हुए दुपट्टों, पगड़ी, कलँगी, कवच, आभूषण तथा सूर्यकी किरणोंसे अत्यन्त दमकते हुए उज्ज्वल शस्त्रों एवं वीरोंकी पंक्तियोंके कारण देवता और असुरोंकी सेनाएँ ऐसी शोभायमान हो रही थीं, मानो जल-जन्तुओंसे भरे हुए दो महासागर लहरा रहे हों ।।१३-१५।। परीक्षित्! रणभूमिमें दैत्योंके सेनापति विरोचनपुत्र बलि मय दानवके बनाये हुए वैहायस नामक विमानपर सवार हुए। वह विमान चलानेवालेकी जहाँ इच्छा होती थी, वहीं चला जाता था ।।१६।।

सर्वसाङ्ग्रामिकोपेतं सर्वाश्चर्यमयं प्रभो । अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं दृश्यमानमदर्शनम् ।।१७

आस्थितस्तद् विमानाग्र्यं सर्वानीकाधिपैर्वृतः । वालव्यजनछत्राग्र्यै रेजे चन्द्र इवोदये ।।१८

तस्यासन्सर्वतो यानैर्यूथानां पतयोऽसुराः । नमुचिः शम्बरो बाणो विप्रचित्तिरयोमुखः ।।१९

द्विमूर्धा कालनाभोऽथ प्रहेतिर्हेतिरित्त्वलः । शकुनिर्भूतसंतापो वज्रदंष्ट्रो विरोचनः ।।२०

हयग्रीवः शङ्कुशिराः कपिलो मेघदुन्दुभिः । तारकश्चक्रदृक् शुम्भो निशुम्भो जम्भ उत्कलः ।।२१

अरिष्टोऽरिष्टनेमिश्च मयश्च त्रिपुराधिपः । अन्ये पौलोमकालेया निवातकवचादयः ।।२२

अलब्धभागाः सोमस्य केवलं क्लेशभागिनः । सर्व एते रणमुखे बहुशो निर्जितामराः ।।२३

सिंहनादान्विमुञ्चन्तः शङ्खान्दध्मुर्महारवान् । दृष्ट्वा सपत्नानुत्सिक्तान्बलभित् कुपितो भृशम् ।।२४

ऐरावतं दिक्करिणमारूढः शुशुभे स्वराट् । यथा स्रवत्प्रस्रवणमुदयाद्रिमहर्पतिः ॥२५

तस्यासन्सर्वतो देवा नानावाहध्वजायुधाः । लोकपालाः सह गणैर्वाय्वग्निवरुणादयः ॥२६

तेऽन्योन्यमभिसंसृत्य क्षिपन्तो मर्मभिर्मिथः । आह्वयन्तो विशन्तोऽग्रे युयुधुर्द्वन्द्वयोधिनः ॥२७

युद्धकी समस्त सामग्रियाँ उसमें सुसज्जित थीं। परीक्षित्! वह इतना आश्चर्यमय था कि कभी दिखलायी पड़ता तो कभी अदृश्य हो जाता। वह इस समय कहाँ है—जब इस बातका अनुमान भी नहीं किया जा सकता था तब बतलाया तो कैसे जा सकता था ।।१७।। उसी श्रेष्ठ विमानपर राजा बलि सवार थे। सभी बड़े-बड़े सेनापति उनको चारों ओरसे घेरे हुए थे। उनपर श्रेष्ठ चमर डुलाये जा रहे थे और छत्र तना हुआ था। उस समय बलि ऐसे जान पड़ते थे, जैसे उदयाचलपर चन्द्रमा ।।१८।। उनके चारों ओर अपने-अपने विमानोंपर सेनाकी छोटी-छोटी टुकड़ियोंके स्वामी नमुचि, शम्बर, बाण, विप्रचित्ति, अयोमुख, द्विमूर्धा, कालनाभ, प्रहेति, हेति, इल्वल, शकुनि, भूतसन्ताप, वज्रदंष्ट्र, विरोचन, हयग्रीव, शंकुशिरा, कपिल, मेघदुन्दुभि, तारक, चक्राक्ष, शुम्भ, निशुम्भ, जन्म, उत्कल, अरिष्ट, अरिष्टनेमि, त्रिपुराधिपति मय, पौलोम कालेय और निवातकवच आदि स्थित थे ।।१९-२२।। ये सब-के-सब समुद्रमन्थनमें सम्मिलित थे। परन्तु इन्हें अमृतका भाग नहीं मिला, केवल क्लेश ही हाथ लगा था। इन सब असुरोंने एक नहीं, अनेक बार युद्धमें देवताओंको पराजित किया था ।।२३।। इसलिये वे बड़े उत्साहसे सिंहनाद करते हुए अपने घोर स्वरवाले शंख बजाने लगे। इन्द्रने देखा कि हमारे शत्रुओंका मन बढ़ रहा है, ये मदोन्मत्त हो रहे हैं; तब उन्हें बड़ा क्रोध आया ।।२४।। वे अपने वाहन ऐरावत नामक दिग्गजपर सवार हुए। उसके कपोलोंसे मद बह रहा था। इसलिये इन्द्रकी ऐसी शोभा हुई, मानो भगवान् सूर्य उदयाचलपर आरूढ़ हों और उससे अनेकों झरने बह रहे हों ।।२५।। इन्द्रके चारों ओर अपने-अपने वाहन, ध्वजा और आयुधोंसे युक्त देवगण एवं अपने-अपने गणोंके साथ वायु, अग्नि, वरुण आदि लोकपाल हो लिये ।।२६।। दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो गयीं। दो-दोकी जोड़ियाँ बनाकर वे लोग लड़ने लगे। कोई आगे बढ़ रहा था, तो कोई नाम ले-लेकर ललकार रहा था। कोई-कोई मर्मभेदी वचनोंके द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वीको धिक्कार रहा था ।।२७।।

युयोध बलिरिन्द्रेण तारकेण गुहोऽस्यत । वरुणो हेतिनायुध्यन्मित्रो राजन्प्रहेतिना ।।२८ यमस्तु कालनाभेन विश्वकर्मा मयेन वै । शम्बरो युयुधे त्वष्ट्रा सवित्रा तु विरोचनः ।।२९

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अपराजितेन नमुचिरश्विनौ वृषपर्वणा । सूर्यो बलिसुतैर्देवो बाणज्येष्ठैः शतेन च ।।३० राहुणा च तथा सोमः पुलोम्ना युयुधेऽनिलः । निशुम्भशुम्भयोर्देवी भद्रकाली तरस्विनी ।।३१ वृषाकपिस्तु जम्भेन महिषेण विभावसुः । इल्वलः सह वातापिर्ब्रह्मपुत्रैररिन्दम ।।३२ कामदेवेन दुर्मर्ष उत्कलो मातृभिः सह । बृहस्पतिश्चोशनसा नरकेण शनैश्चरः ।।३३ मरुतो निवातकवचैः कालेयैर्वसवोऽमराः । विश्वेदेवास्तु पौलोमै रुद्राः क्रोधवशैः सह ।।३४ त एवमाजावसुराः सुरेन्द्रा द्वन्द्वेन संहत्य च युध्यमानाः । अन्योन्यमासाद्य निजघ्नुरोजसा जिगीषवस्तीक्ष्णशरासितोमरैः ।।३५ भुशुण्डिभिश्चक्रगदर्षिपट्टिशैः शक्त्युल्मुकैः प्रासपरश्वधैरपि । निस्त्रिंशभल्लैः परिघैः समुद्गरैः सभिन्दिपालैश्च शिरांसि चिच्छिदुः ।।३६ गजास्तुरङ्गाः सरथाः पदातयः सारोहवाहा विविधा विखण्डिताः । निकृत्तबाहूरुशिरोधराङ्‌घ्रय- श्छिन्नध्वजेष्वासनतनुत्रभूषणाः ।।३७ तेषां पदाघातरथाङ्गचूर्णिता- दायोधनादुल्बण उत्थितस्तदा । रेणुर्दिशः खं द्युमणिं च छादयन् न्यवर्ततासृक्स्रुतिभिः परिप्लुतात् ।।३८

बलि इन्द्रसे, स्वामीकार्तिक तारकासुरसे, वरुण हेतिसे और मित्र प्रहेतिसे भिड़ गये ।।२८।। यमराज कालनाभसे, विश्वकर्मा मयसे, शम्बरासुर त्वष्टासे तथा सविता विरोचनसे लड़ने लगे ।।२९।। नमुचि अपराजितसे, अश्विनीकुमार वृषपर्वासे तथा सूर्यदेव बलिके बाण आदि सौ पुत्रोंसे युद्ध करने लगे ।।३०।। राहुके साथ चन्द्रमा और पुलोमाके साथ वायुका युद्ध हुआ। भद्रकालीदेवी निशुम्भ और शुम्भपर झपट पड़ीं ।।३१।। परीक्षित्! जम्भासुरसे महोदवजीकी, महिषासुरसे अग्निदेवकी और वातापि तथा इल्वलसे ब्रह्माके पुत्र मरीचि

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