भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद पूरुषः । नाज्यते प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः स मयि स्थितः ।।८

यः स्वधर्मेण मां नित्यं निराशीः श्रद्धयान्वितः । भजते शनकैस्तस्य मनो राजन् प्रसीदति ।।९

परित्यक्तगुणः सम्यग्दर्शनो विशदाशयः । शान्तिं में समवस्थानं ब्रह्म कैवल्यमश्नुते ।।१०

उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् । कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ।।११

भिन्नस्य लिंगस्य गुणप्रवाहो द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः । दृष्टासु सम्पत्सु विपत्सु सूरयो न विक्रियन्ते मयि बद्धसौहृदाः ।।१२

यदि तुम-जैसे लोग भी मेरी मायासे मोहित हो जायँ, तो समझना चाहिये कि बहुत दिनोंतक की हुई ज्ञानीजनोंकी सेवासे केवल श्रम ही हाथ लगा ।।४।।

ज्ञानवान् पुरुष इस शरीरको अविद्या, वासना और कर्मोंका ही पुतला समझकर इसमें आसक्त नहीं होता ।।५।। इस प्रकार जो इस शरीरमें ही आसक्त नहीं है, वह विवेकी पुरुष इससे उत्पन्न हुए घर, पुत्र और धन आदिमें भी किस प्रकार ममता रख सकता है ।।६।।

यह आत्मा एक, शुद्ध, स्वयंप्रकाश, निर्गुण, गुणोंका आश्रयस्थान, सर्वव्यापक, आवरणशून्य, सबका साक्षी एवं अन्य आत्मासे रहित है; अतएव शरीरसे भिन्न है ।।७।। जो पुरुष इस देहस्थित आत्माको इस प्रकार शरीरसे भिन्न जानता है, वह प्रकृतिसे सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणोंसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मामें रहती है ।।८।।

राजन्! जो पुरुष किसी प्रकारकी कामना न रखकर अपने वर्णाश्रमके धर्मोंद्वारा नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक मेरी आराधना करता है, उसका चित्त धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है ।।९।। चित्त शुद्ध होनेपर उसका विषयोंसे सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। फिर तो वह मेरी समतारूप स्थितिको प्राप्त हो जाता है। यही परम शान्ति, ब्रह्म अथवा कैवल्य है ।।१०।। जो पुरुष यह जानता है कि शरीर, ज्ञान, क्रिया और मनका साक्षी होनेपर भी कूटस्थ आत्मा उनसे निर्लिप्त ही रहता है, वह कल्याणमय मोक्षपद प्राप्त कर लेता है ।।११।।

राजन्! गुणप्रवाहरूप आवागमन तो भूत, इन्द्रिय, इन्द्रियाभिमानी देवता और चिदाभास—इन सबकी समष्टिरूप परिच्छिन्न लिंगशरीरका ही हुआ करता है; इसका सर्वसाक्षी

आत्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझमें दृढ़ अनुराग रखनेवाले बुद्धिमान् पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति प्राप्त होनेपर कभी हर्ष-शोकादि विकारोंके वशीभूत नहीं होते ॥१२॥

समः समानोत्तममध्यमाधमः
  सुखे च दुःखे च जितेन्द्रियाशयः ।
मयोपक्लृप्ताखिललोकसंयुतो
  विधत्स्व वीराखिललोकरक्षणम् ॥१३
श्रेयः प्रजापालनमेव राज्ञो
  यत्साम्पराये सुकृतात् षष्ठमंशम् ।
हर्तान्यथा हृतपुण्यः प्रजाना-
  मरक्षिता करहारोऽघमत्ति ॥१४
एवं द्विजाग्र्यानुमतानुवृत्त-
  धर्मप्रधानोऽन्यतमोऽवितास्याः ।
ह्रस्वेन कालेन गृहोपयातान्
  द्रष्टासि सिद्धाननुरक्तलोकः ॥१५
वरं च मत् कंचन मानवेन्द्र
  वृणीष्व तेऽहं गुणशीलयन्त्रितः ।
नाहं मखैर्वै सुलभस्तपोभि-
  र्योगेन वा यत्समचित्तवर्ती ॥१६

मैत्रेय उवाच

स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित् ।
अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरेः ॥१७
स्पृशन्तं पादयोः प्रेम्णा व्रीडितं स्वेन कर्मणा ।
शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥१८
भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः ।
समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुजः ॥१९
प्रस्थानाभिमुखोऽप्येनमनुग्रहविलम्बितः ।
पश्यन् पद्मपलाशाक्षो न प्रतस्थे सुहृत्सताम् ॥२०

इसलिये वीरवर! तुम उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषोंमें समानभाव रखकर सुख-दुःखको भी एक-सा समझो तथा मन और इन्द्रियोंको जीतकर मेरे ही द्वारा जुटाये हुए मन्त्री आदि समस्त राजकीय पुरुषोंकी सहायतासे सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करो ॥१३॥ राजाका

******ebook converter DEMO Watermarks*******

कल्याण प्रजापालनमें ही है। इससे उसे परलोकमें प्रजाके पुण्यका छठा भाग मिलता है। इसके विररीत जो राजा प्रजाकी रक्षा तो नहीं करता; किंतु उससे कर वसूल करता जाता है, उसका सारा पुण्य तो प्रजा छीन लेती है और बदलेमें उसे प्रजाके पापका भागी होना पड़ता है ।।१४।। ऐसा विचारकर यदि तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी सम्मति और पूर्व परम्परासे प्राप्त हुए धर्मको ही मुख्यतः अपना लो और कहीं भी आसक्त न होकर इस पृथ्वीका न्यायपूर्वक पालन करते रहो तो सब लोग तुमसे प्रेम करेंगे और कुछ ही दिनोंमें तुम्हें घर बैठे ही सनकादि सिद्धोंके दर्शन होंगे ।।१५।। राजन्! तुम्हारे गुणोंने और स्वभावने मुझको वशमें कर लिया है। अतः तुम्हें जो इच्छा हो, मुझसे वर माँग लो। उन क्षमा आदि गुणोंसे रहित यज्ञ, तप अथवा योगके द्वारा मुझको पाना सरल नहीं है, मैं तो उन्हींके हृदयमें रहता हूँ जिनके चित्तमें समता रहती है ।।१६।।

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! सर्वलोकगुरु श्रीहरिके इस प्रकार कहनेपर जगद्विजयी महाराज पृथुने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की ।।१७।। देवराज इन्द्र अपने कर्मसे लज्जित होकर उनके चरणोंपर गिरना ही चाहते थे कि राजाने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगा लिया और मनोमालिन्य निकाल दिया ।।१८।। फिर महाराज पृथुने विश्वात्मा भक्तवत्सल भगवान्‌का पूजन किया और क्षण-क्षणमें उमड़ते हुए भक्तिभावमें निमग्न होकर प्रभुके चरणकमल पकड़ लिये ।।१९।। श्रीहरि वहाँसे जाना चाहते थे; किन्तु पृथुके प्रति जो उनका वात्सल्यभाव था उसने उन्हें रोक लिया। वे अपने कमलदलके समान नेत्रोंसे उनकी ओर देखते ही रह गये, वहाँसे जा न सके ।।२०।।

स आदिराजो रचिताञ्जलिर्हरिं
  विलोकितुं नाशकदश्रुलोचनः ।
न किञ्चनोवाच स बाष्पविक्लवो
  हृदोपगुह्यामुमधादवस्थितः ।।२१
अथावमृज्याश्रुकला१ विलोकयन्
  अतृप्तदृग्गोचरमाह पूरुषम् ।
पदा स्पृशन्तं क्षितिमंस उन्नते
  विन्यस्तहस्ताग्रमुरंगविद्विषः ।।२२

पृथुरुवाच

वरान् विभो त्वद्वरदेश्वराद् बुधः
  कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम् ।
ये नारकाणामपि सन्ति देहिनां
  तानीश कैवल्यपते वृणे न च ।।२३
न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन्-

******eBook converter DEMO Watermarks*******

न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः । महत्तमान्तर्हृदयानमुखच्युतो२ विधत्स्व कर्णायुतमेष३ मे वरः४ ॥२४

स उत्तमश्लोक महन्मुखच्युतो५ भवत्पदाम्भोजसुधाकणानिलः । स्मृतिं पुनर्विस्मृततत्त्ववर्त्मनां६ कुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः ॥२५

यशः शिवं सुश्रव आर्यसंगमे यदृच्छया चोपशृणोति ते सकृत् । कथं गुणज्ञो विरमेद्विना७ पशुं श्रीयत्प्रवव्रे गुणसंग्रहेच्छया ॥२६

आदिराज महाराज पृथु भी नेत्रोंमें जल भर आनेके कारण न तो भगवान्का दर्शन ही कर सके और न तो कण्ठ गद्गद हो जानेसे कुछ बोल ही सके। उन्हें हृदयसे आलिंगन कर पकड़े रहे और हाथ जोड़े ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये ॥२१॥ प्रभु अपने चरणकमलोंसे पृथ्वीको स्पर्श किये खड़े थे; उनका कराग्रभाग गरुडजीके ऊँचे कंधेपर रखा हुआ था। महाराज पृथु नेत्रोंके आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टिसे उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार कहने लगे ॥२२॥

महाराज पृथु बोले—मोक्षपति प्रभो! आप वर देनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको भी वर देनेमें समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियोंके भोगने योग्य विषयोंको कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवोंको भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयोंको आपसे नहीं माँगता ॥२३॥ मुझे तो उस मोक्षपदकी भी इच्छा नहीं है जिसमें महापुरुषोंके हृदयसे उनके मुखद्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलोंका मकरन्द नहीं है—जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुननेका सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणोंको सुनता ही रहूँ ॥२४॥ पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणोंको लेकर महापुरुषोंके मुखसे जो वायु निकलती है, उसीमें इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्वको भूले हुए हम कुयोगियोंको पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरोंकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥२५॥ उत्तम कीर्तिवाले प्रभो! सत्संगमें आपके मंगलमय सुयशको दैववश एक बार भी सुन लेनेपर कोई पशुबुद्धि पुरुष भले ही तृप्त हो जाय; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकारके पुरुषार्थोंकी सिद्धिके लिये स्वयं लक्ष्मीजी भी आपके सुयशको सुनना चाहती हैं ॥२६॥

अथाभजे त्वाखिलपूरुषोत्तमं गुणालयं पद्मकरेव लालसः ।

अप्यावयोरैकपतिस्पृधोः कलि- र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः ॥२७ जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम् । करोषि फल्वप्युरु दीनवत्सलः स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया ॥२८ भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् । भवत्पदानुस्मरणादृते सतां निमित्तमन्यद्भगवन्न विद्महे ॥२९ मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनीं वरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत् । वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोऽसितः कथं पुनः कर्म करोति मोहितः ॥३० त्वन्माययाद्धा जन ईश खण्डितो यदन्यदाशास्त ऋतात्मनोऽबुधः । यथा चरेद्बालहितं पिता स्वयं तथा त्वमेवार्हसि नः समीहितुम् ॥३१

मैत्रेय उवाच

इत्यादिराजेन नुतः स विश्वदृक् तमाह राजन् मयि भक्तिरस्तु ते । दिष्ट्येदृशी धीर्मयि ते कृता यया मायां मदीयां तरति स्म दुस्त्यजाम् ॥३२

अब लक्ष्मीजीके समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकतासे आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तमकी सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पतिकी सेवा प्राप्त करनेकी होड़ होनेके कारण आपके चरणोंमें ही मनको एकाग्र करनेवाले हम दोनोंमें कलह छिड़ जाय ॥२७॥ जगदीश्वर! जगज्जननी लक्ष्मीजीके हृदयमें मेरे प्रति विरोधभाव होनेकी संभावना तो है ही; क्योंकि जिस आपके सेवाकार्यमें उनका अनुराग है, उसीके लिये मैं भी लालायित हूँ। किन्तु आप दीनोंपर दया करते हैं, उनके तुच्छ कर्मोंको भी बहुत करके मानते हैं। इसलिये मुझे आशा है कि हमारे झगड़ेमें भी आप मेरा ही पक्ष लेंगे। आप तो अपने स्वरूपमें ही रमण करते हैं; आपको भला, लक्ष्मीजीसे भी क्या लेना है ॥२८॥ इसीसे निष्काम महात्मा ज्ञान हो

ebook converter DEMO Watermarks*

जानेके बाद भी आपका भजन करते हैं। आपमें मायाके कार्य अहंकारादिका सर्वथा अभाव है। भगवन्! मुझे तो आपके चरणकमलोंका निरन्तर चिन्तन करनेके सिवा सत्पुरुषोंका कोई और प्रयोजन ही नहीं जान पड़ता ।।२९।। मैं भी बिना किसी इच्छाके आपका भजन करता हूँ, आपने जो मुझसे कहा कि 'वर माँग' सो आपकी इस वाणीको तो मैं संसारको मोहमें डालनेवाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणीने भी तो जगत्‌को बाँध रखा है। यदि उस वेदवाणीरूप रस्सीसे लोग बँधे न होते, तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते? ।।३०।। प्रभो! आपकी मायासे ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादिकी इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्रकी प्रार्थनाकी अपेक्षा न रखकर अपने-आप ही पुत्रका कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छाकी अपेक्षा न करके हमारे हितके लिये स्वयं ही प्रयत्न करें ।।३१।।

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—आदिराज पृथुकी इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वसाक्षी श्रीहरिने उनसे कहा, 'राजन्! तुम्हारी मुझमें भक्ति हो। बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे चित्त इस प्रकार मुझमें लगा हुआ है। ऐसा होनेपर तो पुरुष सहजमें ही मेरी उस मायाको पार कर लेता है, जिसको छोड़ना या जिसके बन्धनसे छूटना अत्यन्त कठिन है। अब तुम सावधानीसे मेरी आज्ञाका पालन करते रहो। प्रजापालक नरेश! जो पुरुष मेरी आज्ञाका पालन करता है, उसका सर्वत्र मंगल होता है' ।।३२-३३।।

तत् त्वं कुरु मयाऽऽदिष्टमप्रमत्तः प्रजापते । मदादेशकरो लोकः सर्वत्राप्नोति शोभनम् ।।३३

मैत्रेय उवाच

इति वैन्यस्य राजर्षेः प्रतिनन्द्यार्थवद्वचः । पूजितोऽनुगृहीत्वैनं गन्तुं चक्रेऽच्युतो मतिम् ।।३४ देवर्षिपितृगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगाः । किन्नराप्सरसो मर्त्याः खगा भूतान्यनेकशः ।।३५ यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः । सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ।।३६ भगवानपि राजर्षेः सोपाध्यायस्य चाच्युतः । हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत¹ ।।३७ अदृष्टाय नमस्कृत्य नृपः सन्दर्शितात्मने । अव्यक्ताय² च देवानां देवाय स्वपुरं ययौ ।।३८

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान्‌ने राजर्षि पृथुके सारगर्भित

ebook converter DEMO Watermarks*

वचनोंका आदर किया। फिर पृथुने उनकी पूजा की और प्रभु उनपर सब प्रकार कृपा कर वहाँसे चलनेको तैयार हुए ।।३४।। महाराज पृथुने वहाँ जो देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सरा, मनुष्य और पक्षी आदि अनेक प्रकारके प्राणी एवं भगवान्‌के पार्षद आये थे, उन सभीका भगवद्बुद्धिसे भक्तिपूर्वक वाणी और धनके द्वारा हाथ जोड़कर पूजन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानोंको चले गये ।।३५-३६।। भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितोंका चित्त चुराते हुए अपने धामको सिधारे ।।३७।। तदनन्तर अपना स्वरूप दिखाकर अन्तर्धान हुए अव्यक्तस्वरूप देवाधिदेव भगवान्‌को नमस्कार करके राजा पृथु भी अपनी राजधानीमें चले आये ।।३८।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे विंशोऽध्यायः ।।२०।।


१. प्रा० पा०—कार्यं। १. प्रा० पा०—कलां। २. प्रा० पा०—च्युतं विध०। ३. प्रा० पा०—कर्णामृत०। ४. प्रा० पा०—वचः। ५. प्रा० पा०—मुखाच्च्युतो। ६. प्रा० पा०—कर्मणां। ७. प्रा० पा०—विरमेद्हते। १. प्रा० पा०—प्रत्यगात्पुनः। २. प्रा० पा०—वासुदेवाय देवानां।

अथैकविंशोऽध्यायः महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश

मैत्रेय उवाच

मौक्तिकैः कुसुमस्त्रग्भिर्दुकूलैः स्वर्णतोरणैः । महासुरभिभिर्धूपैर्मण्डितं तत्र तत्र वै ॥१॥

चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् । पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिर्चितम् ॥२॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! उस समय महाराज पृथुका नगर सर्वत्र मोतियोंकी लड़ियों, फूलोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्रों, सोनेके दरवाजों और अत्यन्त सुगन्धित धूपोंसे सुशोभित था ॥१॥ उसकी गलियाँ, चौक और सड़कें चन्दन और अरगजेके जलसे सींच दी गयी थीं तथा उसे पुष्प, अक्षत, फल, यवांकुर, खील और दीपक आदि मांगलिक द्रव्योंसे सजाया गया था ॥२॥

सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम् । तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलंकृतम् ॥३॥ प्रजास्तं दीपबलिभिः सम्भृताशेषमंगलैः । अभीयुर्मृष्टकन्याश्च मृष्टकुण्डलमण्डिताः ॥४॥ शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम् । विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः ॥५॥ पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः । पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः ॥६॥ स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः । कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम् ॥७॥

सूत उवाच

तदादिराजस्य^१ यशो विजृम्भितं

गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् । क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन् ॥८

विदुर उवाच

सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैर्लब्धाशेषसुराहर्णः । बिभ्रत् स वैष्णवं तेजो बाह्वोर्याभ्यां दुदोह गाम् ॥९ को न्वस्य कीर्तिं न शृणोत्यभिज्ञो यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः । लोकाः सपाला उपजीवन्ति² काम- मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम् ॥१०

वह ठौर-ठौरपर रखे हुए फल-फूलके गुच्छोंसे युक्त केलेके खंभों और सुपारीके पौधोंसे बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था तथा सब ओर आम आदि वृक्षोंके नवीन पत्तोंकी बंदनवारोंसे विभूषित था ॥३॥ जब महाराजने नगरमें प्रवेश किया, तब दीपक, उपहार और अनेक प्रकारकी मांगलिक सामग्री लिये हुए प्रजाजनोंने तथा मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित सुन्दरी कन्याओंने उनकी अगवानी की ॥४॥ शंख और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे, ऋत्विजगण वेदध्वनि करने लगे, वन्दीजनोंने स्तुतिगान आरम्भ कर दिया। यह सब देख और सुनकर भी उन्हें किसी प्रकारका अहंकार नहीं हुआ। इस प्रकार वीरवर पृथुने राजमहलमें प्रवेश किया ॥५॥ मार्गमें जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियोंने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराजने भी उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया ॥६॥ महाराज पृथु महापुरुष और सभीके पूजनीय थे। उन्होंने इसी प्रकारके अनेकों उदार कर्म करते हुए पृथ्वीका शासन किया और अन्तमें अपने विपुल यशका विस्तार कर भगवान्‌का परमपद प्राप्त किया ॥७॥

सूतजी कहते हैं—मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेयके मुखसे आदिराज पृथुका अनेक प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न और गुणवानोंद्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजीने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा ॥८॥

विदुरजी बोले—ब्रह्मन्! ब्राह्मणोंने पृथुका अभिषेक किया। समस्त देवताओंने उन्हें उपहार दिये। उन्होंने अपनी भुजाओंमें वैष्णव तेजको धारण किया और उससे पृथ्वीका दोहन किया ॥९॥ उनके उस पराक्रमके उच्छिष्टरूप विषयभोगोंसे ही आज भी सम्पूर्ण राजा तथा लोकपालोंके सहित समस्त लोक इच्छानुसार जीवन-निर्वाह करते हैं। भला, ऐसा कौन समझदार होगा जो उनकी पवित्र कीर्ति सुनना न चाहेगा। अतः अभी आप मुझे उनके कुछ और भी पवित्र चरित्र सुनाइये ॥१०॥

ebook converter DEMO Watermarks*

मैत्रेय उवाच

गंगायमुनयोर्नद्योरन्तराक्षेत्रमावसन् ।
आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया ॥११

सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक् ।
अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः ॥१२

एकदाऽसीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम् ।
समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम ॥१३

तस्मिन्नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः ।
उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव ॥१४

प्रांशुः पीनायतभुजो गौरः कञ्जारुणेक्षणः ।
सुनासः सुमुखः सौम्यः पीनांसः सुद्विजस्मितः ॥१५

व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः ।
आवर्तनाभिरोजस्वी कांचनोरुरुदग्रपात् ॥१६

सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धजः कम्बुकन्धरः ।
महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च ॥१७

व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीर्नियमे न्यस्तभूषणः ।
कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिः कृतोचितः ॥१८

शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः ।
ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्निव ॥१९

चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम् ।
सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्निव ॥२०

श्रीमैत्रेयजीने कहा—साधुश्रेष्ठ विदुरजी! महाराज पृथु गंगा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें निवास कर अपने पुण्यकर्मोंके क्षयकी इच्छासे प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंको ही भोगते थे ॥११॥ ब्राह्मणवंश और भगवान्के सम्बन्धी विष्णुभक्तोंको छोड़कर उनका सातों द्वीपोंके

******ebook converter DEMO Watermarks*******

सभी पुरुषोंपर अखण्ड एवं अबाध शासन था ।।१२।। एक बार उन्होंने एक महासत्रकी दीक्षा ली; उस समय वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंका बहुत बड़ा समाज एकत्र हुआ ।।१३।। उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये ।।१४।। उनका शरीर ऊँचा, भुजाएँ भरी और विशाल, रंग गोरा, नेत्र कमलके समान सुन्दर और अरुणवर्ण, नासिका सुघड़, मुख मनोहर, स्वरूप सौम्य, कंधे ऊँचे और मुसकानसे युक्त दन्तपंक्ति सुन्दर थी ।।१५।। उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे ।।१६।। उनके बाल बारीक, घुँघराले, काले और चिकने थे; गरदन शंखके समान उतार-चढ़ाववाली तथा रेखाओंसे युक्त थी और वे उत्तम बहुमूल्य धोती पहने और वैसी ही चादर ओढ़े थे ।।१७।। दीक्षाके नियमानुसार उन्होंने समस्त आभूषण उतार दिये थे; इसीसे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंगकी शोभा अपने स्वाभाविक रूपमें स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीरपर कृष्णमृगका चर्म और हाथोंमें कुशा धारण किये हुए थे। इससे उनके शरीरकी कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्न कर चुके थे ।।१८।। राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया ।।१९।। उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निःशंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों ।।२०।।

राजोवाच

सभ्याः शृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः । सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम् ।।२१

अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ।।२२

तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः । लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक् ।।२३

य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् । प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः ।।२४

तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः ।

ebook converter DEMO Watermarks*

कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः ॥२५

यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः । कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम् ॥२६

अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः । इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्विभुवः ॥२७

मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः । प्रियव्रतस्य राजर्षेरंगस्यास्मत्पितुः पितुः ॥२८

ईदृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च । प्रह्लादस्य बलेश्रापि कृत्यमस्ति गदाभृता ॥२९

दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् । वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना ॥३०

राजा पृथुने कहा—सज्जनो! आपका कल्याण हो। आप महानुभाव, जो यहाँ पधारे हैं, मेरी प्रार्थना सुनें—जिज्ञासु पुरुषोंको चाहिये कि संत-समाजमें अपने निश्चयका निवेदन करें ॥२१॥ इस लोकमें मुझे प्रजाजनोंका शासन, उनकी रक्षा, उनकी आजीविकाका प्रबन्ध तथा उन्हें अलग-अलग अपनी मर्यादामें रखनेके लिये राजा बनाया गया है ॥२२॥ अतः इनका यथावत् पालन करनेसे मुझे उन्हीं मनोरथ पूर्ण करनेवाले लोकोंकी प्राप्ति होनी चाहिये, जो वेदवादी मुनियोंके मतानुसार सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी श्रीहरिके प्रसन्न होनेपर मिलते हैं ॥२३॥ जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है ॥२४॥ अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्‌को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा ॥२५॥ विशुद्धचित्त देवता, पितर और महर्षिगण! आप भी मेरी इस प्रार्थनाका अनुमोदन कीजिये; क्योंकि कोई भी कर्म हो, मरनेके अनन्तर उसके कर्ता, उपदेष्टा और समर्थकको उसका समान फल मिलता है ॥२६॥ माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं ॥२७॥ मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और

अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता ।।२८-३०।।

यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः । सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदांगुष्ठविनिःसृता सरित् ।।३१

विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमा- नसंगविज्ञानविशेषवीर्यवान् । यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुन- र्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ।।३२

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि- र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः । अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ।।३३

असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः । सम्पद्यतेऽर्थाशयलिंगनामभि- र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः ।।३४

प्रधानकालाशयधर्मसंग्रहे शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम् । क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते यथानलो दारुषु तद्गुणात्मकः ।।३५

अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्वरम् । स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः ।।३६

मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि- स्तितिक्षया तपसा विद्यया च । देदीप्यमानेऽजितदेवतानां कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम् ।।३७

जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे

निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा ।।३१-३३।।

भगवान् स्वरूपतः विशुद्ध विज्ञानघन और समस्त विशेषणोंसे रहित हैं; किन्तु इस कर्ममार्गमें जौ-चावल आदि विविध द्रव्य, शुक्लादि गुण, अवघात (कूटना) आदि क्रिया एवं मन्त्रोंके द्वारा और अर्थ, आशय (संकल्प), लिंग (पदार्थ-शक्ति) तथा ज्योतिष्टोम आदि नामोंसे सम्पन्न होनेवाले, अनेक विशेषणयुक्त यज्ञके रूपमें प्रकाशित होते हैं ।।३४।। जिस प्रकार एक ही अग्नि भिन्न-भिन्न काष्ठोंमें उन्हींके आकारादिके अनुरूप भासती है, उसी प्रकार वे सर्वव्यापक प्रभु परमानन्दस्वरूप होते हुए भी प्रकृति, काल, वासना और अदृष्टसे उत्पन्न हुए शरीरमें विषयाकार बनी हुई बुद्धिमें स्थित होकर उन यज्ञ-यागादि क्रियाओंके फलस्वरूपसे अनेक प्रकारके जान पड़ते हैं ।।३५।।

अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं ।।३६।। सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान इन विशिष्ट विभूतियोंके कारण वैष्णव और ब्राह्मणोंके वंश स्वभावतः ही उज्ज्वल होते हैं। उनपर राजकुलका तेज, धन, ऐश्वर्य आदि समृद्धियोंके कारण अपना प्रभाव न डाले ।।३७।।

ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो नित्यं हरैर्यच्चरणाभिवन्दनात् । अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ।।३८

यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड् विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्वरः । तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम् ।।३९

पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् । यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ।।४०

अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः

ebook converter DEMO Watermarks*

श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः । न वै तथा चेतनया बहिष्कृते हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः ॥४१ यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं श्रद्धातपोमंगलमौनसंयमैः । समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये यत्रेदमादर्श इवावभासते ॥४२ तेषामहं पादसरोजरेणु- मार्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः । यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥४३ गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः । प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च जनार्दनः सानुचरश्च मह्यम् ॥४४

ब्रह्मादि समस्त महापुरुषोंमें अग्रगण्य, ब्राह्मणभक्त, पुराणपुरुष श्रीहरिने भी निरन्तर इन्हींके चरणोंकी वन्दना करके अविचल लक्ष्मी और संसारको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त की है ।।३८।। आपलोग भगवान्के लोकसंग्रहरूप धर्मका पालन करनेवाले हैं तथा सर्वान्तर्यामी स्वयंप्रकाश ब्राह्मणप्रिय श्रीहरि विप्रवंशकी सेवा करनेसे ही परम सन्तुष्ट होते हैं, अतः आप सभीको सब प्रकारसे विनयपूर्वक ब्राह्मणकुलकी सेवा करनी चाहिये ।।३९।। इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके? ।।४०।। उपनिषदोंके ज्ञान-परक वचन एकमात्र जिनमें ही गतार्थ होते हैं, वे भगवान् अनन्त इन्द्रादि यज्ञीय देवताओंके नामसे तत्त्वज्ञानियोंद्वारा ब्राह्मणोंके मुखमें श्रद्धापूर्वक हवन किये हुए पदार्थको जैसे चावसे ग्रहण करते हैं, वैसे चेतनाशून्य अग्निमें होमे हुए द्रव्यको नहीं ग्रहण करते ।।४१।। सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं ।।४२-४३।। उस गुणवान्, शीलसम्पन्न, कृतज्ञ और गुरुजनोंकी

ebook converter DEMO Watermarks*

सेवा करनेवाले पुरुषके पास सारी सम्पदाएँ अपने-आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तोंके सहित श्रीभगवान् मुझपर सदा प्रसन्न रहें ।।४४।।

मैत्रेय उवाच

इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः ।
तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः ।।४५

पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुतिः ।
ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः ।।४६

हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।
विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ।।४७

वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः संजीव शाश्वतीः ।
यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि ।।४८

अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते
त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः ।
य उत्तमश्लोकत Corinth? -> य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? -> य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य उत्तमश्लोकत Corinth? य

यथार्थ है; पापी वेन ब्राह्मणोंके शापसे मारा गया था; फिर भी इनके पुण्यबलसे उसका नरकसे निस्तार हो गया ।।४६।।

इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया ।।४७।। वीरवर पृथुजी! आप तो पृथ्वीके पिता ही हैं और सब लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरिमें भी आपकी ऐसी अविचल भक्ति है, इसलिये आप अनन्त वर्षोंतक जीवित रहें ।।४८।।

आपका सुयश बड़ा पवित्र है; आप उदारकीर्ति ब्रह्मण्यदेव श्रीहरिकी कथाओंका प्रचार करते हैं। हमारा बड़ा सौभाग्य है; आज आपको अपने स्वामीके रूपमें पाकर हम अपनेको भगवान्‌के ही राज्यमें समझते हैं ।।४९।।

स्वामिन्‌! अपने आश्रितोंको इस प्रकारका श्रेष्ठ उपदेश देना आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि अपनी प्रजाके ऊपर प्रेम रखना तो करुणामय महापुरुषोंका स्वभाव ही होता है ।।५०।।

हमलोग प्रारब्धवश विवेकहीन होकर संसारारण्यमें भटक रहे थे; सो प्रभो! आज आपने हमें इस अज्ञानान्धकारके पार पहुँचा दिया ।।५१।।

आप शुद्ध सत्त्वमय परमपुरुष हैं, जो ब्राह्मणजातिमें प्रविष्ट होकर क्षत्रियोंकी और क्षत्रियजातिमें प्रविष्ट होकर ब्राह्मणोंकी तथा दोनों जातियोंमें प्रतिष्ठित होकर सारे जगत्‌की रक्षा करते हैं। हमारा आपको नमस्कार है ।।५२।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः ।।२१।।


१. प्रा० पा०—तदाधिरा०। २. प्रा० पा०—उपयन्ति।

अथ द्वाविंशोऽध्यायः महाराज पृथुको सनकादिका उपदेश

मैत्रेय उवाच

जनेषु प्रगृणत्स्वेवं पृथुं पृथुलविक्रमम् । तत्रोपजग्मुर्मुनयश्चत्वारः सूर्यवर्चसः ॥१

तांस्तु सिद्धेश्वरान् राजा व्योम्नोऽवतरतोऽर्चिषा । लोकानपापान् कुर्वत्या सानुगोऽचष्ट लक्षितान् ॥२

तद्दर्शनोद्गतान् प्राणान् प्रत्यादित्सुरिवोत्थितः । ससदस्यानुगो वैन्य इन्द्रियेशो गुणानिव ॥३

गौरवाद्यन्त्रितः सभ्यः प्रश्रयानतकन्धरः । विधिवत्पूजयांचक्रे गृहीतार्घ्यर्हणासनान् ॥४

तत्पादशौचसलिलैर्मार्जितालकबन्धनः । तत्र शीलवतां वृत्तमाचरन्मानयन्निव ॥५

हाटकासन आसीनान् स्वधिष्ण्येष्विव पावकान् । श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान् ॥६

पृथुरुवाच

अहो आचरितं किं मे मंगलं मंगलायनाः । यस्य वो दर्शनं ह्यासीद्दुर्दर्शनां च योगिभिः ॥७

किं तस्य दुर्लभतरमिह लोके परत्र च । यस्य विप्राः प्रसीदन्ति शिवो विष्णुश्च सानुगः ॥८

नैव लक्ष्यते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥९

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—जिस समय प्रजाजन परमपराक्रमी पृथ्वीपाल पृथुकी इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय वहाँ सूर्यके समान तेजस्वी चार मुनीश्वर आये ॥१॥ राजा और उनके अनुचरोंने देखा तथा पहचान लिया कि वे सिद्धेश्वर अपनी दिव्य कान्तिसे सम्पूर्ण लोकोंको पापनिर्मुक्त करते हुए आकाशसे उतरकर आ रहे हैं ॥२॥ राजाके प्राण सनकादिकोंका दर्शन करते ही, जैसे विषयी जीव विषयोंकी ओर दौड़ता है, उनकी ओर चल पड़े—मानो उन्हें रोकनेके लिये ही वे अपने सदस्यों और अनुयायियोंके साथ एकाएक उठकर खड़े हो गये ॥३॥ जब वे मुनिगण अर्घ्य स्वीकारकर आसनपर विराज गये, तब शिष्टाग्रणी पृथुने उनके गौरवसे प्रभावित हो विनयवश गरदन झुकाये हुए उनकी विधिवत् पूजा की ॥४॥ फिर उनके चरणोदकको अपने सिरके बालोंपर छिड़का। इस प्रकार शिष्टजनोचित आचारका आदर तथा पालन करके उन्होंने यही दिखाया कि सभी सत्पुरुषोंको ऐसा व्यवहार करना चाहिये ॥५॥ सनकादि मुनीश्वर भगवान् शंकरके भी अग्रज हैं। सोनेके सिंहासनपर वे ऐसे सुशोभित हुए, जैसे अपने-अपने स्थानोंपर अग्नि देवता। महाराज पृथुने बड़ी श्रद्धा और संयमके साथ प्रेमपूर्वक उनसे कहा ॥६॥

पृथुजीने कहा—मंगलमूर्ति मुनीश्वरो! आपके दर्शन तो योगियोंको भी दुर्लभ हैं; मुझसे ऐसा क्या पुण्य बना है जिससे स्वतः आपका दर्शन प्राप्त हुआ ॥७॥ जिसपर ब्राह्मण अथवा अनुचरोंके सहित श्रीशंकर या विष्णुभगवान् प्रसन्न हों, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ है ॥८॥ इस दृश्य-प्रपंचके कारण महत्तत्त्वादि यद्यपि सर्वगत हैं, तो भी वे सर्वसाक्षी आत्माको नहीं देख सकते; इसी प्रकार यद्यपि आप समस्त लोकोंमें विचरते रहते हैं, तो भी अनधिकारीलोग आपको देख नहीं पाते ॥९॥

अधना१ अपि ते धन्याः साधवो गृहमेधिनः । यद्गृहा ह्यर्हवर्याम्बुतृणभूमीश्वरावराः२ ॥१०

व्यालालयद्रुमा वै३ तेऽप्यरिक्ताखिलसम्पदः । यद्गृहास्तीर्थपादीयपादतीर्थविवर्जिताः ॥११

स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः । चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च४ ॥१२

कच्चिन्नः कुशलं नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम् । व्यसनावाप एतस्मिन् पतितानां स्वकर्मभिः ॥१३

भवत्सु कुशलप्रश्न आत्मारामेषु नेष्यते । कुशलाकुशला यत्र न सन्ति मतिवृत्तयः ॥१४

ebook converter DEMO Watermarks*

तदहं कृतविश्रम्भः सुहृदो वस्तपस्विनाम् । संपृच्छे भव एतस्मिन् क्षेमः केनाञ्जसा भवेत् ॥१५

व्यक्तमात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥१६

मैत्रेय उवाच

पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु । स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह ॥१७

सनत्कुमार उवाच

साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना । भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीदृशी ॥१८

जिनके घरोंमें आप-जैसे पूज्य पुरुष उनके जल, तृण, पृथ्वी, गृहस्वामी अथवा सेवकादि किसी अन्य पदार्थको स्वीकार कर लेते हैं, वे गृहस्थ धनहीन होनेपर भी धन्य हैं ॥१०॥ जिन घरोंमें कभी भगवद्भक्तोंके परमपवित्र चरणोदकके छींटे नहीं पड़े, वे सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियोंसे भरे होनेपर भी ऐसे वृक्षोंके समान हैं कि जिनपर साँप रहते हैं ॥११॥ मुनीश्वरो! आपका स्वागत है। आपलोग तो बाल्यावस्थासे ही मुमुक्षुओंके मार्गका अनुसरण करते हुए एकाग्रचित्तसे ब्रह्मचर्यादि महान् व्रतोंका बड़ी श्रद्धापूर्वक आचरण कर रहे हैं ॥१२॥ स्वामियो! हमलोग अपने कर्मोंके वशीभूत होकर विपत्तियोंके क्षेत्ररूप इस संसारमें पड़े हुए केवल इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंको ही परम पुरुषार्थ मान रहे हैं; सो क्या हमारे निस्तारका भी कोई उपाय है ॥१३॥ आपलोगोंसे कुशलप्रश्न करना उचित नहीं है, क्योंकि आप निरन्तर आत्मामें ही रमण करते हैं। आपमें यह कुशल है और यह अकुशल है—इस प्रकारकी वृत्तियाँ कभी होती ही नहीं ॥१४॥ आप संसारानलसे सन्तप्त जीवोंके परम सुहृद् हैं, इसलिये आपमें विश्वास करके मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस संसारमें मनुष्यका किस प्रकार सुगमतासे कल्याण हो सकता है? ॥१५॥ यह निश्चय है कि जो आत्मवान् (धीर) पुरुषोंमें 'आत्मा' रूपसे प्रकाशित होते हैं और उपासकोंके हृदयमें अपने स्वरूपको प्रकट करनेवाले हैं, वे अजन्मा भगवान् नारायण ही अपने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आप-जैसे सिद्ध पुरुषोंके रूपमें इस पृथ्वीपर विचरा करते हैं ॥१६॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—राजा पृथुके ये युक्तियुक्त, गम्भीर, परिमित और मधुर वचन सुनकर श्रीसनत्कुमारजी बड़े प्रसन्न हुए और कुछ मुसकराते हुए कहने लगे ॥१७॥

श्रीसनत्कुमारजीने कहा—महाराज! आपने सब कुछ जानते हुए भी समस्त प्राणियोंके

ebook converter DEMO Watermarks*