श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरन्यास
ॐ विधात्रे नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ महादेवाय तर्जनीभ्यां नमः। ॐ भक्तानामभयप्रदाय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ सर्वदेवप्रीतिकराय अनामिकाभ्यां नमः। ॐ भगवत्प्रियाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ ईश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
फिर इन्हीं मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—
देवं विधातारमनन्तवीर्यं भक्ताभयं श्रीपरमादिदेवम्।
सर्वामरप्रीतिकरं प्रशान्तं वन्दे सदा भूतपतिं सुभूतिम्॥
फिर—
विधातारं महादेवं भक्तानामभयप्रदम्।
सर्वदेवप्रीतिकरं भगवत्प्रियमिश्वरम्॥
इस मन्त्रसे पञ्चोपचारद्वारा पूजाकर चाहे तो इसी मन्त्रसे सम्पुटित पाठ करे। इससे शत्रुपर विजय प्राप्त होती है एवं अप्रतिष्ठा नष्ट होती है।
पुनर्वसुसे प्रारम्भ कर आर्द्रातक २७ दिनोंमें भी पूर्ण रामायण-पाठकी विधि है। ४० दिनोंका भी एक पारायण होता है। नवरात्रमें भी इसके नवाह्नपाठका नियम है।
१. चैत्रे माघे कार्तिके च सिते पक्षे च वाचयेत्। नवाहं सुमहापुण्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः॥
पञ्चम्या दिनमारभ्य रामायणकथामृतम्। नवाह्नश्रवणेनैव सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
(रामसेवाग्रन्थ)
२. श्रोतॄभ्यश्च तथा वक्तुर्व्यासाद् ग्रन्थस्य चोच्चता।
(रामसेवाग्रन्थ)
३. हृदयादिन्यासकी विधि यह है कि ‘अङ्गुष्ठाभ्यां नमः’ के स्थानपर ‘हृदयाय नमः’ कहकर पाँचों अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श किया जाय। ‘तर्जनीभ्यां नमः’ के स्थानपर ‘शिरसे स्वाहा’ कहकर सिरका अग्रभाग छुआ जाय। ‘मध्यमाभ्यां नमः’ के स्थानपर ‘शिखायै वौषट्’ कहकर शिखाका स्पर्श किया जाय। ‘अनामिकाभ्यां नमः’ के बदले ‘कवचाय हुम्’ कहकर दाहिने हाथसे बायें कंधे तथा बायें हाथसे दाहिने कंधेका स्पर्श करे। ‘कनिष्ठिकाभ्यां नमः’ के बदले ‘नेत्रत्रयाय वौषट्’ कहकर नेत्रोंका स्पर्श करे तथा ‘करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः’ के बदले ‘अस्त्राय फट्’ कहकर तीन बार ताली बजाये।