भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ८१ )

जिस पुरुष पर इन सुन्दरियों को निगाहका तेज़ तीर चल जाता है, वह लोट-पोट हो जाता है और उसके होश-हवास ख़ता हो जाते हैं। अगर वह तीर मारने वाली, उस पर दया-भाव नहीं दिखाती, तो बेचारेका करम-कल्याण ही हो जाता है—जीवनके लाले पड़ जाते हैं। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

इधर उसकी निगहका, नाजसे प्राकर पलट जाना ।

इधर सुड़ना तड़पना, ग़शमें आना, दम उलट जाना ॥

इस पदमें कविने प्रेम-दृष्टि की चोटका जो करुणापूर्ण चित्र खींचा है, सो बिल्कुल ठीक है। भुक्तभोगी जानते हैं; हमारे तशरीह करने की ज़रूरत नहीं।

स्त्रियाँ जैसी कोमलाङ्गी होती हैं, वैसी ही वज्रहृदया भी होती हैं। इन्हें अपने शिकारको तड़पते देखनेमें बड़ा मज़ा आता है। जब इनका शिकार इनके कटाक्ष-वाण की मारसे सन्निपात रोगी की तरह मोहित या बेहोश हो जाता है, उसे किसी तरहका ज्ञान नहीं रहता, शराबी की तरह मतवाला होकर प्रलाप करता है, तब ये बड़ी प्रसन्न होती हैं। उस समय ये दयासे काम न लेकर, उसे अपने हाव-भाव और नाज़ों अदा दिखाकर और भी तरसार्ती तथा अथमरा कर देती हैं। जब तक ये अपने आशिक्षसे नहीं मिलतीं, तब तक वह बेचारा रात-दिन गुम खाता, घबराता, सिसकता और आहँ भरता है। मनमें पछताता है कि, हाय मैंने क्यों दिल देकर आफ़त मोल ली। पर मुहब्बतमें तो यह दशा होती ही है। किसी कविने कहा है :—