भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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न था मालूम उलझतमें, कि ग़म खाना भी होता है । जिगरकी बेकली, और दिलका घबराना भी होता है । सिसकना आह भी करना, अश्क़ लाना भी होता है । तड़पना लोटना, बेताब हो जाना भी होता है । कफ़े अफ़सोसको मल-मलके, पछताना भी होता है । किये पर अपने फिर आप ही, दुख पाना भी होता है ॥

प्रेमी या आशिक़ हज़ारों तरहके दुःख और आफ़तें उठाता है, पर अन्तमें यों कहकर सन्न करता है :—

हम तो हैं आशिक़ तेरे, नाज़ उठाने वाले । तुमसे कम देखे हैं महबूब, सताने वाले ॥

शेषमें ; जब ये सुन्दरियाँ सब तरहसे अपने चाहने वालेका इमतिहान ले लेती हैं, तब कहीं इनका पत्थर-हृदय पसीजता है । उस वक्त यह उसे अपनी सेवामें कुबूल करतीं और उसके दिलको ठण्डा करती हैं । इस समय इनका शिकार पूरे तौरसे इनके क़ाबूमँ हो जाता है । जब ये उसे अपने अधीन पातीं और उसे हर तरहसे मुती और फरमाईदार देखती हैं, तब उसे ज़रा-ज़रा सी चूकों या गुलतियों पर धमकाती और घुड़कती हैं । संशयों-का घर होने की वजहसे, इनमें से बाज़-बाज़ तो उसे, ज़रा देखसे घर आने पर ही, खूब डाँटती-डपटती हैं । कोई-कोई अपने शिकार को नितान्त अब्रानावस्थामें देखकर निपट निरकुश हो जाती है और उससे ठीक गुलाम की तरह काम लेती है ।