शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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कहते हैं जिसको जबत, वह इक भलक है तेरी ।
सब बाइजोंकी बाकी, रंगी बयानियाँ हैं ॥—हाली ।
जिसे खर्ग कहते हैं, वह तो मेरी प्यारीकी एक भलकमें है, बाकी सब तो उपदेशकजीकी रड़ीन बातें हैं ।
चुपचुपाते उसे दे आये दिल, एक बात पै हम ।
माल मँहँगा नज़र आता, तो चुकाया जाता ॥—हाली ।
हमने तो न किसीसे कहा न सुना, उसकी एक बात पर चुप- चाप दिल दे आये । अगर माल मँहँगा नज़र आता, तो मोल- तोल करते । दिल देकर खरीदनेमें हमें तो सौदा सस्ता ही जँचा ।
ऐ जौक ! आज सामने, उस चश्म मस्तके ।
बातिल सब अपने, दाव-ये दानिशवरी हुए ॥—जौक ।
ऐ जौक ! उस काम-मदसे मतवाली आँखके सामने, आज हमारी बुद्धिमत्ता और योग्यता भूटी हो गई ।
मस्जिदमें उसने हमको, आँखें दिखाके मारा ।
काफिरकी देखो शोखी, घरमें खुदाके मारा ॥—जौक ।
उसने मन्दिरमें ही हमें अपने कटाक्ष-वाणसे मारा । उस काफिरकी शोखी देखिये, कि उसने हमें ईश्वरके घरमें ही मारा ।
भालूम जो होता हमें, अज्जामे मुहब्बत ।
लेते न कभी भूलके, हम नामे मुहब्बत ॥—जौक ।