शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११५ )
जाने अथवा शैलोंकी तरह लटक जाने पर भी स्त्रियोंका जिन्दा रहना और काम-चेष्टा करना—दोनोंही विदम्बनामात्र हैं । जवानी जाते ही पुरुषकी और स्तन गिरते ही स्त्रीकी काम-चेष्टा रसिकों के मनमें खटकती है ।
जब तक स्त्रीके कुछ छोटी-छोटी नारदियों, अथवा अनारों या कच्चे-कच्चे सेबोंकी तरह रहते हैं, तभी तक स्त्री-भोगमें आनन्द है ; स्तन गिर जाने पर मजा नहीं । किसीने इन कई बातोंके लिये ब्रह्माको दोषी उद्घाटया है । कहा है :—
शशनि खलुकलंकः कण्टकं पद्मनाले ।
युवतिकुचनिपातः पकता केशजाले ॥
जलधिजलमपेयं पण्डिते निर्धनन्तं ।
वयसि धनविवेको निर्विवेको विधाता ॥
चन्द्रमामें कलंक, पद्मनालमें काँटे, युवतियोंके स्तनोंका गिरना, बालोंका पकना, समुद्रके जलका खारी होना, पण्डितोंका निर्धन होना और बुढ़ापेमें धन की चिन्ता—ये सब ब्रह्माकी मति-हीनताके परिचायक हैं ।
दोहा ।
विधिना द्वै श्रयुचित् करी, वृद्ध नरन तन काम ।
कुच ढरकतहू जगतमें, जीवित राखी वाम ॥२८॥
सार—स्त्री-सम्भोगका आनन्द पुरुषकी