भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जाने अथवा शैलोंकी तरह लटक जाने पर भी स्त्रियोंका जिन्दा रहना और काम-चेष्टा करना—दोनोंही विदम्बनामात्र हैं । जवानी जाते ही पुरुषकी और स्तन गिरते ही स्त्रीकी काम-चेष्टा रसिकों के मनमें खटकती है ।

जब तक स्त्रीके कुछ छोटी-छोटी नारदियों, अथवा अनारों या कच्चे-कच्चे सेबोंकी तरह रहते हैं, तभी तक स्त्री-भोगमें आनन्द है ; स्तन गिर जाने पर मजा नहीं । किसीने इन कई बातोंके लिये ब्रह्माको दोषी उद्घाटया है । कहा है :—

शशनि खलुकलंकः कण्टकं पद्मनाले ।

युवतिकुचनिपातः पकता केशजाले ॥

जलधिजलमपेयं पण्डिते निर्धनन्तं ।

वयसि धनविवेको निर्विवेको विधाता ॥

चन्द्रमामें कलंक, पद्मनालमें काँटे, युवतियोंके स्तनोंका गिरना, बालोंका पकना, समुद्रके जलका खारी होना, पण्डितोंका निर्धन होना और बुढ़ापेमें धन की चिन्ता—ये सब ब्रह्माकी मति-हीनताके परिचायक हैं ।

दोहा ।

विधिना द्वै श्रयुचित् करी, वृद्ध नरन तन काम ।

कुच ढरकतहू जगतमें, जीवित राखी वाम ॥२८॥

सार—स्त्री-सम्भोगका आनन्द पुरुषकी