भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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यद्यप्यए गुणाधिको निगदितः कामोऽङ्गानां सदा । नो याति द्रवतां तथापि ऋटिति व्यायामिनां संगमे ॥ प्रागेव पुंसः सुरते न याववारी द्रवेदभोगफलं न तावत् । अतो दुष्टैः कामकलाप्रवीणैः कार्यः प्रयत्नो वनित्ताद्रवत्वे ॥

अर्थात्—यद्यपि स्त्रीमें पुरुषकी अपेक्षा सदा अठ गुणा काम कहा गया है, तोभी वह पुरुषसङ्गमसे जल्दी स्वखलित नहीं होती। संभोग करनेसे अगर स्त्री पहले स्वखलित न हो, तो संभोग करना बेकार हुआ, उसका कोई फल न हुआ। इसलिए, कामकला जाननेवाले चतुर पुरुषको स्त्रीके द्रवित * करनेकी चेष्टामें कोई उपाय उठा न रखना चाहिये।

ॐ द्रवित और स्वखलित शब्द ऐसे हैं, जिनके कहने और लिखनेमें, श्राज-कलः संस्कृतका शब्दिक प्रचार न होनेसे, लज्जा नहीं मालूम होती, अश्लीलताका उतना दोष नहीं आता। यद्यपि एटीकेट ( Etiquette ) यानी शब्द, आदाब या सौजन्य-शिष्टाचार हमें इतनेसे भी रोक्ता है, पर हमने अपने अल्प शिक्षित भाइयोंकी खातिरसे २६, २६, २७ और २६ वें श्लोकोंकी टीका-टिप्पणियोंमें एटीकेटका उतना ध्यान नहीं रखा है। जहाँ तक हमसे बना है वहाँतक हरेक बात खोलकर लिखी है और अपने तर्क कानूनी पेचोंसे भी बचाया है। हम जानबूझकर कोई भी काम ऐसा नहीं करना चाहते, जिससे कानून भंग हो और सरकार नाराज हो। राजाको खुश रखनेमें ही उल्लंघान्त है।

दूक कामशास्त्रका विषय बहुत बड़ा है। उस पर बड़े-बड़े ग्रन्थ अंगरेज़ी और संस्कृत प्रभृति भाषाओंमें लिखे हुए हैं। हमने भी कामशास्त्रको जानने बोरय सभी बातें अपनी बनाई “स्वास्थ्यरक्षा” अथम संस्करण और