शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२६ )
दोहा ।
नारि समागम कामफल, दुहुनहि चित इक होय ।
जो कहँ होय विभिन्ता, शव-संगम-सम जोय ॥२६॥
सार—सम्भोग-कालमें, स्त्री-पुरुषके एक-दिल होनेमें ही आनन्द है ।
“चिकित्साचन्द्रोदय” जीथे और पाँचवें भागोंमें लिखी है। हमने काम-शास्त्र पढ़नेकी जरूरत यहाँ समझा दी है। जो लोग कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र नहीं पढ़ते, उनका इस दुनियामें ध्यान और मनुष्य-बोला धारण करना बुधा है। कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्रमें कुछ फ़र्क नहीं। सच पढ़ो तो कामशास्त्र वैद्यकशास्त्रका ही एक अंग है। लोग पहले शिकायत किया करते थे कि कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र सरल खोद्य हिन्दीमें नहीं—इस लिये पढ़ें तो क्या पढ़ें। उन्हींकी शिकायत रफा करनेके लिये हमने समस्त व्यायुर्वेद ग्रन्थोंका नवनीत एक ग्रन्थमें इकट्ठा किया है और उस ग्रन्थका नाम रखा है, “चिकित्साचन्द्रोदय”। इस ग्रन्थके सात भाग हैं। हमारी रायमें वे सातों ही भाग हर मनुष्यको आद्योपास्त पढ़ लेने चाहियें। जिस दिन भारतका प्रत्येक स्त्री-पुरुष उन सातों भागोंको पढ़-पढ़ कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करेगा, उस दिनका भारत—और ही भारत होगा।
हमारी दयामय न्यायशीला ब्रिटिश सरकार किसीको कामशास्त्र पढ़नेसे मना नहीं करती। अगर ऐसा होता, तो Sexual Intercourse विषय पर अंगरेजोंमें अनेकों ग्रन्थ न निकल जाते और उन्हें अंगरेज नरनारी न पढ़ते। सरकार चाहती है, उसकी प्रजा अश्लील और गन्दी पुस्तकें, जिनमें नंगी तस्वीरें हों, पास न रखे। पर बफ़सोस है कि, आजकलके नासमक नौजवान उन्हींकी खोज में पागलकी तरह अपना धन और समय