भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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एकबार इतिहास-प्रसिद्ध लोक-विमोहिनी नूरजहाँ,* बचपन में, अपनी माँ के साथ, बादशाही महलों में गई। उस समय नूरजहाँ को मेहरुन्निसा कहते थे। जहाँगीर † भी लड़का हो था। उसे उन दिनों सलीम कहते थे। सलीमको कबूतर उड़ाने का शौक था। शाहज़ादे के हाथ में दो कबूतर थे। वह उन्हें किसी को पकड़ा, और कबूतर दरवे से निकालना चाहता था। पास ही मेहर खड़ी थी। शाहज़ादेने कहा—“मेहर! ज़रा हमारे कबूतरोंको तो अपने हाथोंमें पकड़े रहो।” मेहरने कहा—“बहुत अच्छा, लाइये।” शाहज़ादेने मेहरको कबूतर थमा दिये और आप आगे दरवे की ओर चला गया। इतनेमें एक कबूतर किसी तरह मेहरुन्निसाके हाथसे उड़ गया। शाहज़ादेने आकर पूछा—“हमारा एक कबूतर कहाँ?” मेहरने कहा—“वह तो उड़ गया।” शाहज़ादेने पूछा—“कैसे उड़ गया?” मेहरने उस समय भोली-भाली, पर एक अजीब अदाके साथ हाथका दूसरा कबूतर भी छोड़ते हुए कहा—“शाहज़ादे! ऐसे उड़ गया!” शाहज़ादेका दिल आजके पहले मेहरुन्निसा पर नहीं था; पर इस वक्तकी एक अदाने शाहज़ादेको मेहरुन्निसा का गुलाम बना दिया। आज पीछे वह मेहरको जन्म-भर न भुला। उसने मेहरुन्निसाको अपनी बीवी बनानेके लिये

‡ नूरजहाँ—संसारको प्रकाशित करने वाली ज्योति। सुगल-सम्राट जहाँगीरकी मथहूर वेगमका नाम है।

† जहाँगीर=विश्वविजयी; भारतका एक, सम्राट।