भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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बड़ी कोशिशें कीं, पर उसे कामयाबी न हुई ; क्योंकि बादशाह एक मामूली सरदारकी लड़कीसे हिन्दुस्तानके शाहजहादीकी शादी करना उचित न समझते थे । उन्होंने भगड़ा मिटानेको मेहरकी शादी शेर अफ़ग़ानके साथ कर दी । सलीमका वश न चला ; पर वह मेहरको भूला नहीं । जब वह तख़्तेशाही पर बैठा, उसने मेहरको बंगालसे मँगवा कर, उसके कोमल क़दमोंमें अपना अपना ताज़शाही रख दिया और सदाको उसका गुलाम होना क़बूल किया । देखा पाठक ! खीके एक नज़रने क्या काम किया ?

हम स्त्रियोंके हाव-भाव और नाज़ो-अदाओं पर भर मिटने वालों के चन्द नमूने नीचे देते हैं । एक साहब फरमाते हैं :—

मैं तो उसी भिक्क पै फिदा हूँ, कि कानको ।

शब क्या हटा लिया, मेरे लाकर दहनके पास ॥जौँक॥

मुझे उनका वह हाव कितना अच्छा मालूम हुआ कि, उन्होंने अपने कानको मेरे मुँह के पास लाकर हटा लिया । इस अदा पर मैं फिदा हो गया ।

और भो :—

ऐ जौँक, मैं तो बैठ गया, दिलको थाम कर ।

इस नाज़से खड़े थे वह, रक्खे कमर पै हाथ ॥जौँक॥

जिस अन्दाज़से वंद कमर पर हाथ रक्खे खड़े थे—जौँक !