भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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मैं तो उन्हें देखकर दिल थामकर बैठ गया ; नहीं तो दिल चला ही था ।

महाकवि नज़ीरने नाज़नियोंकी चुलबुलाहटका सीधी-सादी भाषामें कैसा चटकीला चित्र खींचा है । ज़रा उसकी भी वाशनी देखिये :—

ये राह चलने की चुलबुलाहट,

कि दिल कहीं है, नज़र कहीं है ।

कहँ का ऊँचा, कहँ का नीचा,

ख़याल किसको, क़दम की जाका ।

लड़ाये आँखें, वो बेहिजाबी,

कि फिर पलकसे पलक न मारे ।

नज़र जो नीचे करे तो गया,

खुला सरापा चमन हया का ।

ये चन्चलाहट ये चुलबुलाहट,

ख़बर न सरकी, न तनकी सुध-सुध ।

जो चौरा बिखरा, बलासे बिखरा,

न बन्द वँधा, कर्मु क़वाका ।

मैंने एक छोटी उम्रकी नाज़नी देखी, वह अपनी राह-राह चली जाती थी ; पर उसके चलनेमें गुज़बकी चुलबुलाहट थी । उसका दिल कहीं था और उसकी आँखें कहीं थीं । उसे ऊँचे-