शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
मैं तो उन्हें देखकर दिल थामकर बैठ गया ; नहीं तो दिल चला ही था ।
महाकवि नज़ीरने नाज़नियोंकी चुलबुलाहटका सीधी-सादी भाषामें कैसा चटकीला चित्र खींचा है । ज़रा उसकी भी वाशनी देखिये :—
ये राह चलने की चुलबुलाहट,
कि दिल कहीं है, नज़र कहीं है ।
कहँ का ऊँचा, कहँ का नीचा,
ख़याल किसको, क़दम की जाका ।
लड़ाये आँखें, वो बेहिजाबी,
कि फिर पलकसे पलक न मारे ।
नज़र जो नीचे करे तो गया,
खुला सरापा चमन हया का ।
ये चन्चलाहट ये चुलबुलाहट,
ख़बर न सरकी, न तनकी सुध-सुध ।
जो चौरा बिखरा, बलासे बिखरा,
न बन्द वँधा, कर्मु क़वाका ।
मैंने एक छोटी उम्रकी नाज़नी देखी, वह अपनी राह-राह चली जाती थी ; पर उसके चलनेमें गुज़बकी चुलबुलाहट थी । उसका दिल कहीं था और उसकी आँखें कहीं थीं । उसे ऊँचे-