शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १३ )
नीचे स्थानों तकका झयाल न था। यह भी ध्यान नहीं था कि, पैर कहाँ पड़ते हैं।
वह वेहया जब आँखें लड़ाती थी, तो इस तरह लड़ाती थी कि, पलक-से-पलक न लगाती थी और अगर नज़रको नीची करती थी, तो ऐसा मालूम होता था, मानों हवा और शर्मका चमन ही खुल गया है।
उसमें ऐसी चञ्चलाहट और चुलचुलाहट थी, कि न उसे अपने सर को खबर थी और न शरीरको सुध-बुध थी। सिर से ओढ़नी उतर गई है तो उतर गई, परवा नहीं। कुरती का बन्द खुला पड़ा है, तो खुला ही पड़ा है। *
दोहा।
रसमें ल्यौही रोषमें, दरशत सहज अनूप।
बोलिन चलनि चितौनियें, बनिता बन्धन रूप ॥२॥
सार—स्त्री हर हालतमें मददको प्यारी
ॐ यों तो चञ्चलता और चुलचुलाहट उठती जवानोंको सभी खियोंमें होती है ; पर ऐसी चुलचुलाहट, जिसका मज़ेदार चित्र मियों नज़रिने खींचा है, कुल-बुछ्रोंमें नहीं देखी जाती और वह भी राहमें। हाँ, ऐसी चुल-चुलाहट कुल-बुछ्रोंमें भी देखी जाती है, पर शोढ़ी हो जानेके दो-चार बरस बाद और अपने घरमें—अपने पतिके सामने ; जब कि उनकी लज्जा-शर्ममें और हंकोच-भय प्रभुति दूर हो जाते हैं। हमारी समझमें, यह चित्र किसी कमलिन वारङ्गनाका है।