शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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इनके चञ्चल नेत्र ही नेत्र दिखाई देते हैं ; अर्थात् उनका मन इनके नीलकमलवत् सुन्दर नेत्रोंमें ही जा बसता है । जिसमें जिसका दिल जा बसता है, उसे वही-वह दीखता है । वृ॒क्ति कामियोंकी आँखोंमें कमसिन अल्पवयस्का नवविवाहिता कामिनियाँ समा जाती हैं ; अतः उन्हें हर ओर, जहाँ तक उनकी दृष्टि जाती है, वही-वह दिखाई देती हैं ।
किसी ऐसी ही उठती जवानीकी कम-उम्र परीकी लुब-सुरती का चित्र महाकवि नज़ीरने क्या ही कारीगरीसे खींचा है :—
पलकों की रूपक, पुतली की फिरत, सुरमे की लगावट वैसी ही । ऐयार नजर, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही ॥१॥ वह अँखियाँ मस्त नशीली सौं, कुछ काली सौं, कुछ पीली सौं । चितवन की दगा, नज़रोंकी कपट, सीनोंकी लड़ावट वैसी ही ॥२॥ वह रात अँधेरी बालों सी, वह मँग चमकती बिजली सी । ज़ूलकों की खुलत, पड़ी की जमत, चोटी की गुँवावट वैसी ही ॥३॥ वह छोटी-छोटी सख्त कुँचै, वह कच्चे-कच्चे सेव गजब । अँगिया की भड़क, गोठोंकी चमक, बन्दों की कसावट वैसी ही ॥४॥ वह चन्द्रचल चाल जवानी की, ऊँची ऐड़ी नीचे पन्ने । कफ़शों की खटक, दामनकी भटक, ठोकरकी लगावट वैसी ही ॥५॥ कुछ हाथ हिलें, कुछ पाँव हिलें, फड़कें बाजू थिरकै सब तन । गाली वो बला, ताली वो सिद्धाम, उँगली की नचावट वैसी ही ॥६॥
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