भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

( १८ )

चञ्चल अचपल, मटके चटके, सर खोले टैंके हँस-हँस के । क्रुह क्रुह की हँसावट और गुज्रव, ठठों की उड़ावट बेसी ही ॥७॥ हर वक्त फुन हर आन सजै, दम-दम में बदलै लाख सजै । बाहों की रूपक, घुँघट की अदा, जोबनकी दिखावट बेसी ही ॥८॥

पाठक ! मनचले पाठक ! आप ही बिचारिये, इस आनवान और खूबसूरती वालीकी कौन भूल सकता है ? जो इन स्त्री- रत्नों की कद्र जानने वाले हैं, उनकी नज़रोंसे इनके नीलकमल को आभा रखने वाले नीलमसे नेत्र कभी उतर ही नहीं सकते । उन्हें तो हर ओर नीलम या नील-कमल ही नील-कमल फूले दीखते हैं और वे मन-ही-मन उनकी अनुपम छटा को याद कर- करके प्रसन्न होते हैं ।

छप्पय ।

कबहुँ भौहको भंग, कबहुँ लज्जायुत दरसत ।

कबहुँक ससकत संकि, कबहुँ लीलारस बरषत ।

कबहुँक मुख मृदुहास, कबहुँ हित बचन उषारत ।

कबहुँक लोचन फेर, चपल चहुँ ओर निहारत ।

छिन-छिन सुचरित्र विचित्र करि, भरे कमल जिमि दशहुँदिशि ।

ऐसी अनूप नारी निरख, हरषत रहिये दिवस-निशि ॥४॥

सार—जिस तरह ब्रह्मज्ञानियोंको हर ओर ब्रह्म ही ब्रह्म दीखता है ; उसी तरह कामियों